ओडिशा पुलिस के पास कबूतरों का 'डिपार्टमेंट' है, वजह जानकर दिल खुश हो जाएगा
पुलिस वाले कबूतरों का दिन रात खयाल रखते हैं.
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'कबूतर जा जा जा, कबूतर जा जा जा... पहले प्यार की पहली चिट्ठी, साजन को दे आ...'
'मैंने प्यार किया' फिल्म से असद भोपाली का लिखा और राम लक्ष्मण का कम्पोज किया हुआ ये गाना आपने सुना ही होगा. 1989 में आई इस फिल्म ने कबूतरों को फेमस कर दिया. उस दौर में मोबाइल फोन, इंटरनेट, और चैट के कोई जरिए थे नहीं. तो चिट्ठियों का ही सहारा हुआ करता था. और इस काम में कबूतर को डाकिए की तरह इस्तेमाल किया जाता था. ये तो हुई मोहब्बत या दोस्ती की बात. अब जंग की जान लीजिए. पहले और दूसरे विश्व युद्ध में भी कबूतरों ने सेना तक संदेश पहुंचाने का काम किया. यानी कुल मिलाकार इन्हें सिर्फ पक्षी तो नहीं कहा जा सकता.
पर वक्त के साथ टेक्नोलॉजी बढ़ती गई, और कबूतरों की जरूरत कम होती गई. पोस्टल सर्विस शुरू होने के बाद इनकी जरूरत लगभग-लगभग ख़त्म ही हो गई. कबूतर से चिट्ठी भेजना बीते कल की बात बनकर रह गया. इससे पहले उन्हें संरक्षित किया जाता था. पर आपको ये जानकर हैरानी और दिलचस्पी दोनों होगी कि हमारे देश में एक राज्य ऐसा भी है, जहां अब तक कबूतरों को इस काम के लिए बचाया जा रहा है. ये काम ओडिशा में हो रहा है. कटक के तुलसीपुर थाने में अब भी कबूतरों का संरक्षण किया जाता है.
इंडिया टुडे की रिपोर्ट के मुताबिक, पुलिस अधिकारी एसएम रहमान बताते हैं,
इस प्रोजेक्ट से जुड़े एक और अधिकारी ने बताया,
एक दूसरे पुलिस अधिकारी ने इन कबूतरों के स्वास्थ्य के बारे में जानकारी दी. उन्होंने कहा,
एक हवलदार ने बताया कि उन्हें इस काम में बहुत खुशी मिलती है. बचपन से ही मुझे कबूतरों में दिलचस्पी थी.
एसएम रहमान ने आगे देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू से जुड़ा एक किस्सा भी बताया. उन्होंने कहा,
समाचार एजेंसी ने तुलसीपुर थाने का एक वीडियो शेयर किया है. इसमें दिख रहा है कि कैसे पुलिस वाले इन कबूतरों का खयाल रख रहे हैं. और चोट लगने पर इसका इलाज भी वही करते हैं.
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