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पाकिस्तानी लड़की भारत में लाई 91 परसेंट मार्क्स, लेकिन अब सपने टूटे

सरहदें कितनी जालिम होती हैं. मशाल माहेश्वरी की कहानी से जानिए.

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27 मई 2016 (अपडेटेड: 27 मई 2016, 11:15 AM IST)
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सरहदें कितनी जालिम होती हैं. मशाल माहेश्वरी की कहानी से जानिए. मशाल, 17 साल की एक पाकिस्तानी लड़की है. अपने वतन में उन्हें अगवा करने की कोशिश की गई तो उसका परिवार धार्मिक वीजा पर भागकर जयपुर आ गया. लगा कि मशाल का डॉक्टर बनने का सपना पूरा नहीं होगा. लेकिन उसने भारत में अपनी पढ़ाई रिज्यूम की और खूब मेहनत करके 12वीं में 91 फीसदी नंबर हासिल किए. लेकिन जब मेडिकल का फॉर्म भरना चाहा तो नागरिकता आड़े आ गई. एक पाकिस्तानी विस्थापित होने की वजह से मशाल को अपना सपना टूटता दिख रहा है. रो-रोकर उसका बुरा हाल है और वह डिप्रेशन में चली गई है. मशाल के मां-बाप पाकिस्तानी हैदराबाद में डॉक्टर थे. तीन लाख रुपये महीने की कमाई थी. लेकिन एक रोज उन्हें अगवा करने की कोशिश हुई. किसी तरह वे बच निकले और बच्ची के भविष्य के लिए धार्मिक वीजा पर जयपुर आ गए. मां-बाप पढ़े-लिखे हैं, काबिल हैं, लेकिन नागरिकता की वजह से उन्हें भी कोई ढंग की नौकरी नहीं मिल रही है. मशाल दो साल से मेडिकल एंट्रेंस की कोचिंग कर रही थी. उसे नहीं पता था कि भारत में सरकारी मेडिकल और इंजीनियरिंग कॉलेजों में केवल भारतीय ही पढ़ सकते हैं. मशाल के बायोलॉजी में 96 परसेंट नंबर हैं. अब वह दिन भर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा को चिट्ठी लिखती रहती है. जवाब में अब तक नियम-कानून का चिट्ठा ही आया है. मशाल कहती है, मैं नहीं जानती मैं किस देश की हूं, प्लीज मुझे मेरा सपना पूरा करने दो. मशाल के मां-बाप कैमरे पर सामने आने और नाम सार्वजनिक करने से डर रहे हैं. उन्हें डर है कि इससे पाकिस्तान में उनके रिश्तेदारों पर हमले हो सकते हैं. मशाल ने दसवीं तक की पढ़ाई पाकिस्तान में ही की है. बाद में एक रिश्तेदार की मदद से मशाल का एडमिशन जयपुर के रुक्मणी बिड़ला स्कूल में करवा दिया. दो साल तक उसने 'आकाश कोचिंग इंस्टीट्यूट' से तैयारी की. मशाल जब अपने परिवार के साथ भारत आई थी, तो कहीं रहने की जगह नहीं मिली. फिर माहेश्वरी समाज से उन्हें मदद मिली. मशाल के पिता एक प्राइवेट अस्पताल में काम कर रहे हैं, जहां उन्हें सैलरी कैश में मिलती है, क्योंकि वह यहां बैंक अकाउंट नहीं खुलवा सकते. उनके घर में खाना बनाने का जो चूल्हा है, वह मांगा हुआ है. दिल्ली का 'पाक हिंदू विस्थापित सीमांत संगठन' इनकी मदद की कोशिश कर रहा है. संगठन के हिंदू सिंह सोढ़ा ने बताया कि वह इस मामले को गृह मंत्रालय से लेकर आधा दर्जन मंत्रियों तक पहुंचा चुके हैं, लेकिन कोई आश्वासन नहीं मिला. वह चाहते हैं कि पाकिस्तान में हिंदुओं पर हो रहे जुल्म को ध्यान में रखते हुए भारत सरकार को एक रोडमैप कम से कम बनाना चाहिए. यहां असम चुनाव से पहले किया गया केंद्र सरकार का एक वादा रिमाइंडर के तौर पर संलग्न है. वादा, पाकिस्तान के विस्थापित हिंदुओं को नागरिकता देने का. जिसका नोटिफिकेशन अभी तक जारी नहीं हुआ. मिठाइयां बंट गई हैं. बधाइयां ले ली गई हैं. पर मशाल रोए जा रही है. अपना कसूर पूछे जा रही है.

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