दुनिया ने जिसे नोबल शांति पुरस्कार दिया, चीन ने अपने इस नागरिक को श्रद्धांजलि तक नहीं दी
लू श्याबाओ की जेल में मौत हुई.

चीन ने अपना सबसे बड़ा राजनैतिक विरोधी खो दिया. थियानमेन स्क्वॉयर पर हुए छात्र आंदोलन का अहम किरदार, जो लेखक से राजनैतिक आंदोलनकारी बना. लोकतंत्र और मानवाधिकारों के लिए कई बार जेल गया. जिसने थियानमेन आंदोलन में मारे गए लोगों को इंसाफ दिलाना अपना फ़र्ज़ समझा. नाम लू श्याबाओ. 34 साल की उम्र में एक बड़े आंदोलन का हिस्सा बनने वाले इस शख्स का कोई दुश्मन नहीं है. उसे किसी से नफ़रत नहीं है. ये उसने ख़ुद कहा. उसने लोकतंत्र के लिए आवाज़ उठाई लेकिन शांतिपूर्ण ढंग से. आंदोलन और शांति दो विरोधाभासी शब्द हैं. लेकिन इन दोनों शब्दों से मिलकर ही बनी लू श्याबाओ की शख्सियत. और शायद इसीलिए इन्हें 2010 में शांति नोबेल से नवाज़ा गया. 2008 में उन्हें 11 साल के लिए जेल हुई. लेकिन उन्हें मौत ने इस कैद से रिहा कर दिया.
27 साल पहले शुरू हुई कहानी
1989 में बीजिंग के थियानमेन स्क्वॉयर (चौराहे) पर छात्रों ने लोकतंत्र के लिए आंदोलन छेड़ा. इस आंदोलन को '89 डेमोक्रेसी मूवमेंट भी कहा जाता है. ये ऐसा आंदोलन था जिसमें हजारों लोगों की जान गई. इसी आंदोलन में शामिल होने के लिए लू श्याबाओ अमेरिका छोड़कर चीन आए. जब चीनी सुरक्षाबलों ने आंदोलनकारियों पर गोली चलानी शुरू की तो श्याबाओ ने छात्रों को चौराहे से हट जाने के लिए राज़ी कर लिया. इसके बाद चीन में वो सामाजिक बदलाव के लिए लड़ते रहे. कई विषयों पर लिखते रहे जो देश की कम्युनिस्ट पार्टी के नेताओं के लिए परेशानी का सबब बनता रहा.
जब गिरफ्तार हुए
2008, चीन में लोकतांत्रिक सुधारों के लिए 'नागरिक घोषणा पत्र' तैयार किया जा रहा था. इस काम में मदद करने वाले अहम शख्स थे लू श्याबाओ. इसी काम के लिए उन्हें 25 दिसम्बर को गिरफ्तार कर लिया गया. वो इस वक़्त बीजिंग में अपने घर में थे. कहा जाता है कि उन्हें जानबूझकर क्रिसमस के दिन जेल भेजा गया क्योंकि पश्चिमी देशों में कई लोगों ने उनके लिए आवाज़ उठाई थी. कुछ लोगों का कहना था कि इस दिन बहुत कम लोग टीवी पर समाचार सुनते हैं इसलिए उन्हें इस दिन गिरफ्तार किया गया. उन पर देशद्रोह का आरोप लगा.
गिरफ्तार होने से पहले श्याबाओ ने बीबीसी से कहा था,
मुझे जेल में डाला गया...रिहा किया गया... और फिर जेल में डाल दिया गया. मेरे कोई बहुत बड़े सपने नहीं है, जैसे कि मैं इस देश को बचा लूंगा. मेरी एक साधारण सी ख़्वाहिश है कि मैं एक ईमानदार और शालीन लेखक बनूं.
सुर्खियों में आए, पुरस्कार मिला

जुलाई-2017: चीन में लोगों ने बड़ी संख्या में जुटकर उनके रिहा होने की मांग की
चीनी सरकार को लगा कि गिरफ्तारी के बाद श्याबाओ की लोकप्रियता फीकी पड़ जाएगी. लेकिन दांव उलटा पड़ गया. गिरफ्तारी के बाद ये अंतरराष्ट्रीय सुर्खियों में आए. इसी का नतीजा था कि 2010 में श्याबाओ को शांति के नोबेल पुरस्कार के लिए चुना गया, लेकिन उन्हें पता ही नहीं था कि उन्हें दुनिया का सबसे सम्मानित पुरस्कार दिया गया. क्योंकि वो जेल में थे. हालांकि इस पर चीनी सरकार ने विरोध भी दर्ज कराया.
श्याबाओ ने कहा था,
'मैं चाहता हूं कि चीन के लम्बे इतिहास में शब्दों के लिए सज़ा पाने वाला मैं आखिरी शख्स होऊं'.
कैसे हुई मौत
13 जुलाई 2017 को 61 साल की उम्र में मानवाधिकार के लिए लड़ने वाले इस शांतिप्रिय नेता ने दुनिया छोड़ दी. वो लिवर कैंसर से जूझ रहे थे. चीनी सरकार का कहना है कि श्याबाओ की बीमारी का पता चलने के बाद जून में उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया था. चीन के चांगचुन शहर में पैदा हुए श्याबाओ ने जिलिन और बीजिंग नॉर्मल विश्वविद्यालय से अपनी पढ़ाई पूरी की थी. श्याबाओ की पत्नी लिउ ज़िया ने कहा कि श्याबाओ अपना नोबेल पुरस्कार 89 के आंदोलन में मारे गए लोगों को समर्पित करना चाहते थे. उनके पुरस्कार जीतने के बाद से लिउ को घर में ही कैद कर दिया गया था. हालांकि उन्हें महीने में एक बार श्याबाओ से मिलने की इजाज़त थी. लिउ डिप्रेशन में चली गईं थीं. श्याबाओ के आखिरी दिनों में लिउ को उनके साथ रहने का मौका मिला. लिउ ख़ुद भी मानवाधिकार के लिए लड़ती रहीं. उन्हें अपने खास भाषणों के लिए कई बार पुरस्कार भी मिले.

हजारों लोग दे रहे श्रद्धांजलि
श्याबाओ हमेशा लोगों के हक़ के लिए लड़े. और आज उनके चले जाने के बाद लोगों की आंखें नम हैं. सभी उन्हें सलाम कर रहे हैं. उनके लिए कैंडल मार्च निकाले जा रहे हैं. लोग उनके काम को आगे बढ़ाना चाहते हैं. हक़ के लिए लड़ने पर श्याबाओ ने बहुत बड़ी कीमत चुकाई है. नॉर्वे की नोबेल पुरस्कार समिति का कहना है कि कोशिशें कभी नाकाम नहीं होतीं, विचारों को कैद नहीं किया जा सकता और न ही वो मरते हैं.
हम भी यही मानते हैं कि विचार कभी नहीं मरते, लू श्याबाओ को हमारा सलाम है.
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