ऑस्ट्रेलिया से न्यूजीलैंड आकर मस्जिदों पर हमला करने का मकसद क्या है?
दो मस्जिदों में हुए हमले में कई लोगों की मौत.
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न्यूज़ीलैण्ड में ऐसे हमले होना आम बात नहीं है.
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शुक्रवार दोपहर के बाद का वक्त था. न्यूजीलैंड के सेंट्रल क्राइस्टचर्च में लोग जुमे की नमाज के लिए मस्जिदों में इकट्ठा हुए थे. दिन के 1 बजकर 45 मिनट के आसपास का वक्त था. ठीक इसी वक्त मस्जिद अल नूर में गोलीबारी होने लगती है. एक शख्स दनादन गोलियां दागता है और कई लोग मारे जाते हैं. कितने इसकी पुष्टि अभी नहीं हुई है. न्यूजीलैंड की पुलिस थोड़ा रुककर बोलती है. थोड़ा जांच परख के बाद. लेकिन दो मस्जिदों में हुई फायरिंग के बाद पूरे न्यूजीलैंड में सन्नाटा है. न्यूजीलैंड पुलिस ने लोगों को घर के अंदर ही रहने की सलाह दी है. हिदायत दी है कि आज घर के अंदर ही रहें. खासकर मस्जिदों में नमाज पढ़ने के लिए न जाएं. खतरा हो सकता है.
इंटरनेशनल न्यूज एजेंसी एपी के मुताबिक पुलिस ने एक शख्स को हिरासत में भी ले लिया है. लेकिन पुलिस कह रही है कि हो सकता है कुछ और लोग हों जो इस हमले में शामिल हों. हिरासत में लिए गए शख्स के बारे में अभी साफ-साफ पता नहीं चल पाया है. लेकिन जो पता चला है वो ये कि जिस शख्स ने इस गोलीबारी की जिम्मेदारी है वो 74 पेज का एक दस्तावेज छोड़ गया है. इन 74 पन्नों में उसने हमले की वजह बताई है. इस दस्तावेज में वो बार-बार मुस्लिम, खासकर बाहर से आए मुस्लिमों की बात करता है. वो बाहर से आकर यूरोप के देशों में रह रहे मुसलमानों को अपना दुश्मन बताता है. खुद का परिचय वो एक आम व्हाइट शख्स के तौर पर देता है. व्हाइट जिसे आसान भाषा में गोरे लोग कह दिया जाता है.

हमले के बाद पूरा न्यूज़ीलैण्ड थम गया है.
हमले के बाद न्यूजीलैंड की पीएम जैसिन्डा आर्डम मीडिया के सामने आईं. और उन्होंने इस हमले को न्यूजीलैंड के इतिहास का काला दिन बताया. आर्डम ने साफ-साफ कहा कि बाहर से आकर जिन लोगों ने न्यूजीलैंड को चुना है ये उनका अपना घर है. वो लोग भी हमारे ही हैं. वो हमारा नहीं है जिसने हमारे ही लोगों के खिलाफ हिंसा की है. न्यूज एजेंसी एपी जब इस खबर को कवर कर रही थी तो उन्हें लेन पेनेहा नाम के एक शख्स मिले. वो उस वक्त उसी मस्जिद के पास थे. एपी से बातचीत में उन्होंने बताया कि

घायलों को अस्पताल पहुंचाते लोग.
जिस शख्स ने हमले करने का दावा किया है वो अपनी उम्र 28 साल बताता है. कहता है कि मैं व्हाइट ऑस्ट्रेलियन हूं. न्यूजीलैंड इसीलिए आया था ताकि इस हमले की प्लानिंग कर सकूं. मेरा किसी संगठन से लेनादेना नहीं लेकिन मैंने कई नेशनलिस्ट यानी राष्ट्रवादी ग्रुप्स को डोनेशन दिया है. उसने दावा किया कि उसने हमला करने का फैसला खुद लिया. किसी संगठन ने उसे ऐसा करने को नहीं कहा.
इरादा ऐशबर्टन नाम की मस्जिद पर भी हमले का था. उसने न्यूजीलैंड में हमले की वजह भी बताई. बताया कि ऐसा इसीलिए किया गया है ताकि पता लग सके कि न्यूजीलैंड जैसे दुनिया के कोने में बसे देश में भी मास इमीग्रेशन हो रहा है. मतलब साफ है कि हमलावर के निशाने पर वो लोग थे जो दूसरे देशों से आकर यूरोपीय देशों में रहते हैं. खासकर मुस्लिम. 74 पेज के जिस दस्तावेज की बात हो रही है उसमें भी वो बार-बार मुस्लिम शब्द का जिक्र करता है.
लेकिन ये बेहद डरावना है वो इसीलिए क्योंकि न्यूजीलैंड जैसा शांत देश भी ऐसी खतरनाक गोलीबारी की जद में आ गया है. जो कि यहां आमतौर पर नहीं होता है. डरावना इसीलिए ज्यादा है क्योंकि इस गोलीबारी का मकसद घृणा जान पड़ता है. ऐसी घृणा जो धर्म पर आधारित है. ऐसी घृणा जो मनुष्य की खाल के रंग पर आधारित है. ऐसी घृणा जो जीवन बसर के लिए एक देश से दूसरे देश में राजी खुशी से रह रहे लोगों के खिलाफ है.
इंटरनेशनल न्यूज एजेंसी एपी के मुताबिक पुलिस ने एक शख्स को हिरासत में भी ले लिया है. लेकिन पुलिस कह रही है कि हो सकता है कुछ और लोग हों जो इस हमले में शामिल हों. हिरासत में लिए गए शख्स के बारे में अभी साफ-साफ पता नहीं चल पाया है. लेकिन जो पता चला है वो ये कि जिस शख्स ने इस गोलीबारी की जिम्मेदारी है वो 74 पेज का एक दस्तावेज छोड़ गया है. इन 74 पन्नों में उसने हमले की वजह बताई है. इस दस्तावेज में वो बार-बार मुस्लिम, खासकर बाहर से आए मुस्लिमों की बात करता है. वो बाहर से आकर यूरोप के देशों में रह रहे मुसलमानों को अपना दुश्मन बताता है. खुद का परिचय वो एक आम व्हाइट शख्स के तौर पर देता है. व्हाइट जिसे आसान भाषा में गोरे लोग कह दिया जाता है.

हमले के बाद पूरा न्यूज़ीलैण्ड थम गया है.
हमले के बाद न्यूजीलैंड की पीएम जैसिन्डा आर्डम मीडिया के सामने आईं. और उन्होंने इस हमले को न्यूजीलैंड के इतिहास का काला दिन बताया. आर्डम ने साफ-साफ कहा कि बाहर से आकर जिन लोगों ने न्यूजीलैंड को चुना है ये उनका अपना घर है. वो लोग भी हमारे ही हैं. वो हमारा नहीं है जिसने हमारे ही लोगों के खिलाफ हिंसा की है. न्यूज एजेंसी एपी जब इस खबर को कवर कर रही थी तो उन्हें लेन पेनेहा नाम के एक शख्स मिले. वो उस वक्त उसी मस्जिद के पास थे. एपी से बातचीत में उन्होंने बताया कि
मैंने काले कपड़े पहने एक शख्स को मस्जिद में जाते देखा. उसके घुसते ही दनादन फायरिंग शुरू हो गई. उसके बाद मस्जिद से लोग बाहर की तरफ भागने लगे.लेन पेनेहा मस्जिद के बगल में ही रहते हैं. वो कहते हैं कुछ पल बाद ही बंदूकधारी वहां से भागता दिखा. उसने हथियार रास्ते में ही छोड़ दिए. इसके बाद पेनेहा मदद के लिए मस्जिद के अंदर गए. वहां उन्होंने देखा कि हर जगह डेड बॉडीज पड़ी हैं. उन्होंने 5 लोगों से वहां से निकालकर अपने घर में जगह भी दी. सेंट्रल क्राइस्टचर्च की मस्जिद अल नूर की इस वारदात के बाद लिनवुड मस्जिद से भी इसी तरह की फायरिंग की रिपोर्ट आई.

घायलों को अस्पताल पहुंचाते लोग.
जिस शख्स ने हमले करने का दावा किया है वो अपनी उम्र 28 साल बताता है. कहता है कि मैं व्हाइट ऑस्ट्रेलियन हूं. न्यूजीलैंड इसीलिए आया था ताकि इस हमले की प्लानिंग कर सकूं. मेरा किसी संगठन से लेनादेना नहीं लेकिन मैंने कई नेशनलिस्ट यानी राष्ट्रवादी ग्रुप्स को डोनेशन दिया है. उसने दावा किया कि उसने हमला करने का फैसला खुद लिया. किसी संगठन ने उसे ऐसा करने को नहीं कहा.
इरादा ऐशबर्टन नाम की मस्जिद पर भी हमले का था. उसने न्यूजीलैंड में हमले की वजह भी बताई. बताया कि ऐसा इसीलिए किया गया है ताकि पता लग सके कि न्यूजीलैंड जैसे दुनिया के कोने में बसे देश में भी मास इमीग्रेशन हो रहा है. मतलब साफ है कि हमलावर के निशाने पर वो लोग थे जो दूसरे देशों से आकर यूरोपीय देशों में रहते हैं. खासकर मुस्लिम. 74 पेज के जिस दस्तावेज की बात हो रही है उसमें भी वो बार-बार मुस्लिम शब्द का जिक्र करता है.
लेकिन ये बेहद डरावना है वो इसीलिए क्योंकि न्यूजीलैंड जैसा शांत देश भी ऐसी खतरनाक गोलीबारी की जद में आ गया है. जो कि यहां आमतौर पर नहीं होता है. डरावना इसीलिए ज्यादा है क्योंकि इस गोलीबारी का मकसद घृणा जान पड़ता है. ऐसी घृणा जो धर्म पर आधारित है. ऐसी घृणा जो मनुष्य की खाल के रंग पर आधारित है. ऐसी घृणा जो जीवन बसर के लिए एक देश से दूसरे देश में राजी खुशी से रह रहे लोगों के खिलाफ है.

