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नए संसद भवन के उद्घाटन पर विवाद रुक क्यों नहीं रहा है?

28 मई 2023. देश के नए संसद भवन का उद्घाटन होना है. और उद्घाटन से पहले ही ये नई इमारत विवादों में है. गोलबंदी हो रही है. 21 दल एक पाले में खड़े हैं और 16 दल दूसरे पाले में.

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New Parliament Inauguration
नए संसद के उद्घाटन पर विवाद.
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25 मई 2023 (अपडेटेड: 25 मई 2023, 10:11 PM IST)
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28 मई 2023. देश के नए संसद भवन का उद्घाटन होना है. और उद्घाटन से पहले ही ये नई इमारत विवादों में है. गोलबंदी हो रही है. 21 दल एक पाले में खड़े हैं और 16 दल दूसरे पाले में. दोनों तरफ से वार-पलटवार हो रहा है. जेडीयू के अध्यक्ष ललन सिंह ने तो यहां तक कह दिया कि अगर उनकी सरकार आई तो नए संसद भवन में दूसरे काम होंगे. इधर मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गया है. 

विवाद क्यों है और क्या है?

18 मई 2023 को लोकसभा स्पीकर ओम बिड़ला ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को नई संसद भवन का उद्घाटन करने का निमंत्रण दिया. उद्घाटन की तारीख 28 मई 2023. और जबसे इस तारीख का ऐलान हुआ है विवाद तभी से शुरू हुआ. पहले विवाद हुआ तारीख को लेकर. 28 मई को विनायक दामोदर सावरकर का जन्म दिवस होता है. मोदी सरकार सावरकर को स्वातंत्र्यवीर बताती है. जबकि विपक्षी पार्टियां आजादी की लड़ाई में उनके योगदान पर सवाल उठाती हैं. विपक्ष हमेशा से बीजेपी पर सावरकर को लेकर हमलावर भी रहा है. ऐसे में नई संसद का उद्घाटन, सावरकर के जन्म दिवस पर करने के फैसला भी विपक्षी दलों के निशाने पर रहा. लेकिन इस पर बड़ा विवाद तब शुरू हुआ जब पूर्व कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने एक ट्वीट किया और कहा,

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राहुल गांधी का ये ट्वीट 21 मई को आया. इसके अगले दिन 22 मई को कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने एक ट्वीट कर कहा कि बीजेपी ने दलित और आदिवासी समुदाय से राष्ट्रपति का चुनाव केवल चुनावी लाभ के लिए किया है. खड़गे ने सवाल उठाया कि 2020 में जब नई संसद की बिल्डिंग का शिलान्यास होना था तब तत्कालीन राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद को नहीं बुलाया गया. और अब उद्घाटन में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को नहीं बुलाया जा रहा. खड़गे ने कहा,

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इसके बाद AIMIM चीफ असदुद्दीन ओवैसी, समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव, आम आदमी पार्टी सांसद संजय सिंह, तृणमूल कांग्रेस सांसद डेरेक ओ ब्रायन समेत कई विपक्षी दलों ने नई संसद का उद्घाटन राष्ट्रपति से न कराए जाने पर सवाल उठाए. सवाल उठे तो सरकार की ओर से जवाब भी आया.

केंद्रीय मंत्री हरदीप पुरी ने विपक्षी दलों पर बेवजह विवाद खड़ा करने का आरोप लगाया और ट्वीट किया,

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हरदीप पुरी के सवालों पर कांग्रेस की ओर से जवाब भी आया. कांग्रेस सांसद मनीष तिवारी ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 79 के मुताबिक, संघ के लिए एक संसद होगी जो राष्ट्रपति और दो सदनों से मिलकर बनेगी. इन सदनों के नाम लोकसभा और राज्यसभा होंगे. तिवारी ने आगे कहा कि केंद्रीय मंत्रियों को भारत का संविधान बहुत ध्यान से पढ़ना चाहिए. 

कांग्रेस का जवाब

ये दोनों पार्टियों के अपने-अपने तर्क हैं. अपने-अपने दावे हैं. लेकिन संसद में राष्ट्रपति की भूमिका के बारे में संविधान क्या कहता है ये समझने के लिए हमने बात की संविधान के जानकारों से. सत्तापक्ष और विपक्ष के बीच उद्घाटन कार्यक्रम को लेकर जो बहस चल रही है उसे संविधान के जानकार किस नजरिए से देखते हैं?   वापस लौटते हैं. कांग्रेस के दावों पर केंद्रीय मंत्री हरदीप पुरी ने फिर से पलटवार किया. पुरी ने कहा कि 1975 में इंदिरा गांधी ने संसद एनेक्सी और 1987 में राजीव गांधी ने संसद लाइब्रेरी का उद्घाटन बतौर प्रधानमंत्री किया. पुरी ने पूछा कि अगर कांग्रेस सरकार के मुखिया संसद का उद्घाटन कर सकते हैं तो हमारी सरकार के प्रमुख ऐसा

क्यों नहीं कर सकते?

इस पर भी कांग्रेस की ओर से जवाब आया. छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने कहा कि संसद के किसी पोर्शन का उद्घाटन करना और नई संसद का उद्घाटन करना दोनों बहुत अलग-अलग चीजें हैं.

ये तो दोनों पार्टियों के अपने-अपने तर्क हो गए. लेकिन अब यहां ये भी जान लेते हैं कि उस समय हुआ क्या था? लोकसभा सचिवालय द्वारा प्रकाशित 'पार्लियामेंट हाउस स्टेट' नाम का एक दस्तावेज बताता है कि आजादी के बाद जैसे-जैसे संसद की गतिविधियां बढ़ीं, अधिक जगह की जरूरत पड़ी.   इस जरूरत को पूरा करने के लिए संसद भवन एनेक्सी बनाया गया.  3 अगस्त, 1970 को तत्कालीन राष्ट्रपति वी वी गिरी ने इसकी आधारशिला रखी. और उद्घाटन हुआ 24 अक्टूबर 1975 को. तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी द्वारा. यानी शिलान्यास राष्ट्रपति ने किया और उद्घाटन प्रधानमंत्री ने. 

इसी तरह पार्लियामेंट लाइब्रेरी की आधारशिला 15 अगस्त, 1987 को तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने रखी थी. भूमि पूजन तत्कालीन लोकसभा अध्यक्ष शिवराज वी पाटिल द्वारा 17 अप्रैल, 1994 को किया गया था. और इसका उद्घाटन मई 2002 में तत्कालीन राष्ट्रपति के आर नारायणन ने किया था.

एक्सपर्ट क्या कहते हैं?

हमने आपको अतीत की कहानी बताई. अब जानकारों से समझ लेते हैं कि क्या संविधान में इस तरह की स्थिति जो अभी है, (नए संसद का उद्घाटन) इसके बारे में कोई प्रावधान है, कि कौन उद्घाटन करेगा या इसकी अध्यक्षता कौन करेगा, अब तक का क्या ट्रेडिशन रहा है, किस तरह से होता आया है?

वापस वर्तमान पर आते हैं. बीजेपी-कांग्रेस के बीच सोशल मीडिया पर चल रही नोक-झोक में 24 मई को केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह की एंट्री हुई. शाह ने प्रेस कॉन्फ्रेंस की और कहा कि सभी पार्टियों को न्यौता दिया गया है. नई संसद का उद्घाटन राजनीति का विषय नहीं है. ये सत्ता-विपक्ष सबके लिए है. 

आगे अमित शाह ने अगस्त 1947 में लार्ड माउंटबेटन और पंडित हेनरू के बीच सत्ता हस्तांतरण की कहानी सुनाई. और सेंगोल का जिक्र किया. सेंगोल तमिल भाषा का शब्द है, जिसका अर्थ "संपदा से संपन्न" होता है. पुराने समय में ये राजा की शक्ति और सत्ता का प्रतीक माना जाता था. सेंगोल एक तरीके का राजदंड होता है. जिसे राजपुरोहित राजा को देता था. इसके उपयोग का प्रमाण सबसे पहले मौर्य साम्राज्य (322-185 ईसापूर्व) और गुप्त साम्राज्य (320-550 ई.), चोल साम्राज्य (907-1310 ई.) और विजयनगर साम्राज्य (1336-1946 ई.) में मिलता है. 

आजादी के बाद सेंगोल को इलाहाबाद के संग्रहालय में रख दिया गया था. अब अमित शाह ने कहा है कि इसे किसी म्यूजियम में रखना अनुचित है. पीएम मोदी ने गहन चर्चा-विमर्श के बाद सेंगोल को संसद में स्थापित करने का फैसला लिया है. इसे स्पीकर की कुर्सी के पास रखा जाएगा.

बात नई संसद की हो रही है तो फिर इसकी खास बातों और इसकी जरूरत को भी समझ लेते हैं.

पुराने संसद की बिल्डिंग बरतानियों के समय की है. 97 साल पुरानी. सन् 1921 में ब्रिटिश आर्किटेक्ट सर एडविन लुटियंस और हर्बर्ट बेकर ने इसे बनाना शुरू किया था और तैयार करने में छह साल लगे थे. 18 जनवरी, 1927 को तत्कालीन वायसराय लॉर्ड इरविन ने इसका उद्घाटन किया था. और जब ये बनी थी, तब अपने आप में आर्किटेक्चर का बेहतरीन नमूना मानी गई थी.

लेकिन हमारे देश में तो लोग सौ-दो सौ साल पुरानी हवेलियों में रहते हैं. फिर सांसद क्यों नहीं रह सकते? इसी लहजे का सवाल राज्यसभा में कांग्रेस सांसद आनंद शर्मा ने पूछा था. इस पर केंद्रीय आवास और शहरी मामलों के मंत्री हरदीप सिंह पुरी ने जवाब दिया था, कि

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बताई गई इन्हीं बदलती ज़रूरतों को ध्यान में रखते हुए, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 10 दिसंबर, 2020 को नए संसद भवन की आधारशिला रखी. जनवरी 2021 में बनना शुरू हुई और 28 महीने के रिकॉर्ड टाइम में नई इमारत बन कर तैयार है. ये तो एक कारण है, जो सरकार ने बताया. और भी कारण हैं, जो अधिकारियों के बकौल इधर-उधर छपी हैं. सेंट्रल विस्टा की आधीकारिक वेबसाइट पर क्या कारण लिखे हैं, हम बस वही बताएंगे.

> कारण नंबर 1. सेंट्रल हॉल में मैक्सिमम 436 लोगों और लोकसभा में अधिकतम 552 व्यक्ति बैठ सकते हैं. संयुक्त सत्रों के दौरान कम से कम 200 एड-हॉक या अस्थायी सीटें गलियारों में जोड़नी पड़ती हैं. जो असुरक्षित है.

2. मंत्रियों के लिए जो कार्यालय और बैठक कक्ष, प्रेस कक्ष, भोजन सुविधा आदि मौजूद हैं, वो काफ़ी नहीं है. मेक-शिफ़्ट के आधार पर काम चलता है.

3. पिछले कुछ सालों में तक़नीकी प्रगति के साथ बने रहने के लिए पुराने भवन में कई बदलाव किए गए थे. और, इसकी वजह से भवन की संरचना पर असर पड़ा है. मसलन, 1956 में इमारत के बाहरी हिस्से में दो नई मंजिलें जोड़ी गईं. इससे सेंट्रल हॉल का गुंबद ही छिप गया. फिर एक बार खिड़कियों को ढकने के लिए जाली लगाई, तो दोनों सदनों के हॉल में रोशनी ही कम हो गई.

4. कहा गया कि पुरानी बिल्डिंग में mechanical, electrical, lighting, public address system, air-conditioning and security infrastructure बिल्कुल पुराना हो चुका है.

5. एक और ज़रूरी बात. पुरानी इमारत earthquake safe नहीं है. इसके सर्टिफ़िकेशन के लिए सदन की संरचनात्मक ताक़त को टेस्ट करना पड़ेगा और ऐसे टेस्ट से संसद के कामकाज बाधित करेंगे. ये इसलिए भी बड़ी चिंता है क्योंकि नई बिल्डिंग के बनने के दौरान दिल्ली-NCR में भूकंप का जोख़िम बढ़ गया है. NCR को सेस्मिक ज़ोन-2 की कैटगरी से निकालकर सेस्मिक ज़ोन-4 में डाल दिया गया है.

6. भूकंप के साथ, आग का भी जोख़िम है. पुराना सदन, आग को टैकल करने के मॉर्डर्न तरीक़ों से लैस नहीं है.

अब ये तो भई कि ज़रूरत क्यों है. नए की ज़रूरत है, बना ली. क्या बनाई? और ये पिछले वाले से अलग कैसे है, वो भी जान लीजिए -

> सदन की क्षमता बढ़ाई गई है. लोक सभा में 888 सांसद बैठ पाएंगे और राज्यसभा में 300.

> पुराने वाले की तरह नई बिल्डिंग सेंट्रल हॉल नहीं है. इसके बजाय संयुक्त सत्र के लिए लोकसभा कक्ष का ही इस्तेमाल किया जाएगा.

> नया संसद भवन लगभग 64,500 वर्ग मीटर के क्षेत्र में फैला हुआ है. पुराना वाला 24,281 वर्ग मीटर का था.

> आग के संकट से निपटने का इंतज़ाम हो गया है. आग के ख़तरे को देखते हुए कई नए विद्युत केबल जोड़े गए हैं.

> इसके अलावा पानी की सप्लाई लाइनों, सीवर लाइनों, एयर कंडीशनिंग और सीसीटीवी की वजह से बिल्डिंग की एस्थेटिक्स ख़राब हो गया था. तो इस बार एस्थेटिक्स का ख़ास ख़याल रखा गया है.  

> नए भवन में अत्याधुनिक तकनीके हैं. वोटिंग में आसानी के लिए बायोमेट्रिक्स है. डिजिटल भाषा व्याख्या या अनुवाद प्रणाली है. बताया तो ये भी गया है कि हॉल के अंदरूनी हिस्सों में virtual sound simulations फिट किया है. ताकि साउंड का सही लेवल तय हो और आवाज़ गूंजे न.

इतना ताम-झाम तो आपने सुन लिया? अब सवाल है कि इसमें जनता का पैसा कितना लग गया है? देखिए पूरे प्रोजेक्ट का बजट है 20 हज़ार करोड़. इसमें सभी नियोजित विकास/पुनर्विकास कार्यों का अनुमान है. ख़ाली बिल्डिंग बिल्डिंग का अनुमान पहले 862 करोड़ रुपये था. लेकिन जनवरी 2022 में CPWD ने अतिरिक्त बदलाव और कंस्ट्रक्शन में बदलाव के नाम पर बजट को 24% बढ़ाने की अर्ज़ी दी. यानी अब इसकी लागत हो गई है क़रीब 12 सौ करोड़.

हमने आपको विवाद बता दिया. नई संसद भवन की खास बातों को बता दिया, अब वापस राजनीति पर आते हैं. संसद भवन के उद्घाटन को लेकर चल रहे विवाद की कहानी जो हमने आपको ऊपर बताई वो केवल इतनी भर नहीं है. राजनीति के जानकार इसे 2024 के लोकसभा चुनाव से पहले की राजनीतिक गोलबंदी के तौर पर भी देख रहे हैं. विपक्षी दलों को एक मंच पर लाने की एक और कोशिश बता रहे हैं. कैसे?

दरअसल कांग्रेस समेत 21 विपक्षी दलों ने नई संसद भवन के उद्घाटन कार्यक्रम में शामिल न होने का फैसला किया है. पहले कांग्रेस पार्टी ने एक प्रेस रिलीज जारी कर कहा कि 19 दल इस कार्यक्रम में शामिल नहीं होंगे. इसमें कांग्रेस, DMK, आम आदमी पार्टी, शिवसेना (उद्धव गुट), समाजवादी पार्टी, भाकपा, झामुमो, जेडीयू, एनसीपी, राजद नेशनल कॉन्फ्रेंस समेत 19 दल शामिल थे. इस प्रेस रिलीज में कहा गया है,

नया संसद भवन महामारी के दौरान बड़े खर्चे पर बनाया गया है. जिसमें भारत के लोगों या सांसदों से कोई परामर्श नहीं किया गया. जिनके लिए स्पष्ट रूप से ये बनाया जा रहा है... राष्ट्रपति न केवल भारत में राज्य का प्रमुख होता है बल्कि संसद का अभिन्न अंग होता है. राष्ट्रपति के बिना संसद कार्य नहीं कर सकती. प्रधानमंत्री ने उनके बिना संसद भवन का उद्घाटन करने का निर्णय लिया है. यह अशोभनीय कृत्य राष्ट्रपति के उच्च पद का अपमान करता है और संविधान के पाठ और भावनाओं का उल्लंघन करता है...जब लोकतंत्र की आत्मा को संसद से निष्कासित कर दिया गया है तो हमें नई इमारत में कोई मूल्य नहीं दिखता. हम नए संसद भवन के उद्घाटन का बहिष्कार करने के अपने सामूहिक निर्णय की घोषणा करते हैं.

कांग्रेस के साथ आए 19 दलों के अलावा 2 और दलों AIMIM और ऑल इंडिया यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट ने भी कार्यक्रम के बहिष्कार का फैसला किया है. यानी कुल 21 दलों ने कार्यक्रम के बहिष्कार का फैसला किया है. इंडिया टुडे की खबर के मुताबिक जिन राजनीतिक दलों ने कार्यक्रम का बहिष्कार करने का फैसला किया है लोकसभा में उनकी कुल संख्या 147 है और राज्यसभा में 96. यानी लोकसभा में 26.97 प्रतिशत और राज्यसभा में 40.33 फीसद.

ये हो गए कार्यक्रम का बायकॉट करने वाले. अब चलते हैं लाइन के उस पार. जो जा रहे हैं उनकी संख्या क्या है और क्या तर्क है. पहले बात बीजेपी के नेतृत्व वाले NDA की. बीजेपी ने प्रेस रिलीज जारी कर कहा,

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बीजेपी की ओर से जारी इस प्रेस रिलीज में NDA के 14 दलों- बीजेपी, शिवसेना (शिंदे गुट), नेशनल पीपल्स पार्टी, नेशनल डेमोक्रेटिक प्रोग्रेसिव पार्टी, सिक्किम क्रांतिकारी मोर्चा, जननायक जनता पार्टी, राषट्रीय लोक जनशक्ति पार्टी, अपना दल सोनेलाल, रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया, AIADMK, IMKMK, आजसू, मिजो नेशनल फ्रंट का नाम शामिल है.

NDA दलों के अलावा दो और दलों ने कार्यक्रम में जाने का फैसला किया है. इसमें ओडिसा और आंध्र प्रदेश में सत्ताधारी बीजेडी और YSR कांग्रेस शामिल हैं. यानी कुल 16 दलों ने कार्यक्रम में जाने का फैसला किया है. संसद में इनकी ताकत देखें तो लोकसभा में 366 और राज्यसभा में 120 सदस्य हैं. प्रतिशत के हिसाब से देखें तो इनकी संख्या लोकसभा में 67.15 प्रतिशत और राज्यसभा में 50. 42 प्रतिशत है.

लोकसभा चुनाव में अब एक साल से भी कम समय रह गया है. और इससे पहले विपक्ष की ये गोलबंदी क्या असर डालेगी ये भी समझ लेते हैं.

इधर मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गया है. एक जनहित याचिका दायर कर भारत के राष्ट्रपति द्वारा नई संसद के उद्घाटन कराने के लिए लोकसभा सचिवालय और भारत सरकार को निर्देश देने की मांग की गई है. सुप्रीम कोर्ट के वकील सीआर जया सुकिन ने याचिका में कहा है कि उद्घाटन समारोह में राष्ट्रपति को शामिल न करके भारतीय संविधान का उल्लंघन किया गया है.

तो ये थी नए संसद भवन के उद्घाटन को लेकर हो रहे विवाद की अब तक की कहानी. इस मसले पर आगे जो भी अपडेट होंगे. लल्लनटॉप आप तक पहुंचाता रहेगा.

वीडियो: नए संसद भवन का नाम क्यों बदल रही है सरकार? नया नाम क्या होगा?

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