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नेपाल के प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली ने संसद भंग करने की सिफारिश की

पड़ोसी मुल्क में खड़ा हुआ राजनीतिक संकट.

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नेपाल के पीएम केपी शर्मा ओली  ने इमरजेंसी मीटिंग के बाद ये फैसला किया है.
(फोटो: एएफपी)
नेपाल के पीएम केपी शर्मा ओली ने इमरजेंसी मीटिंग के बाद ये फैसला किया है. (फोटो: एएफपी)
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डेविड
20 दिसंबर 2020 (Updated: 20 दिसंबर 2020, 07:43 AM IST)
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नेपाल में राजनीतिक संकट खड़ा हो गया है. प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली ने संसद भंग करने की सिफारिश की है. 20 दिसंबर, सुबह 10 बजे नेपाल के पीएम ने कैबिनेट की आपात बैठक बुलाई. इसके बाद राष्ट्रपति विद्या देवी भंडारी से संसद भंग करने की सिफ़ारिश कर दी. रॉयटर्स की खबर के मुताबिक, नेपाल की सत्ताधारी वामपंथी पार्टी की केंद्रीय समिति के सदस्य बिश्नु रिजाल ने बताया,
प्रधानमंत्री ने संसदीय दल, सेंट्रल कमिटी और पार्टी सचिवालय में अपना बहुमत खो दिया है. उन्होंने पार्टी में मौजूदा स्थिति का हल निकाले बिना आनन-फानन में संसद भंग करने का फ़ैसला लिया है.
इससे पहले, पीएम ओली पर संवैधानिक परिषद अधिनियम से संबंधित एक अध्यादेश को वापस लेने का दबाव था, जिसे उन्होंने 15 दिसंबर को जारी किया था. राष्ट्रपति बिद्या देवी भंडारी ने इसे एक घंटे के भीतर मंजूरी दे दी थी. अधिनियम उन्हें पूर्ण कोरम के बिना केवल तीन सदस्यों की उपस्थिति में बैठक बुलाने और निर्णय लेने का अधिकार देता है.

पार्टी के नेता ओली के खिलाफ

पार्टी के ज्यादातर नेता ओली के खिलाफ हो चुके हैं. वे कई दिन से उनके इस्तीफे की मांग कर रहे हैं. पिछले महीने ओली का विरोध कर रहे नौ नेताओं ने बंद कमरे में मीटिंग की थी. इनमें से छह ने प्रधानमंत्री का इस्तीफा मांगा था. मीटिंग के बाद पार्टी प्रवक्ता नारायण काजी श्रेष्ठ ने कहा था- तमाम बातों पर गंभीरता से विचार किया गया है. कुछ चीजें सामने आई हैं और इन पर बातचीत की ज़रूरत है. पुष्प कमल दहल प्रचंड की अगुआई वाले विरोधी खेमे ने ओली को 19 पेज का प्रस्ताव सौंपा था. इसमें सरकार के कामकाज और पार्टी विरोधी नीतियों पर सवाल उठाए गए थे. ओली प्रधानमंत्री के साथ पार्टी अध्यक्ष भी हैं. पुष्प कमल दहल प्रचंड ने पीएम ओली पर भ्रष्टाचार में शामिल होने और मनमाने ढंग से सरकार चलाने के आरोप लगाए थे. हिंदू राष्ट्र का मुद्दा उठा नेपाल की मुख्य विपक्षी पार्टी नेपाली कांग्रेस ने प्रधानमंत्री केपी शर्मा की सरकार पर आरोप लगाया था कि वह राजशाही की मौन हिमायत कर रहे हैं. हाल में देश के कई हिस्सों में राजशाही के समर्थन में रैलियां की गई थी, जिनमें मांग की गई थी कि संवैधानिक राजशाही को बहाल किया जाए और नेपाल को फिर से एक हिन्दू राष्ट्र घोषित किया जाए. नेपाल 2008 में धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र बना था. इससे पहले 2006 में जन आंदोलन हुआ था और राजशाही को खत्म कर दिया गया था. मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, नेपाल की राजनीति में चीन का दखल ओली की सरकार को खतरे में डाल रहा है. कई नेताओं को लगता है कि चीन, नेपाल की घरेलू राजनीति में शामिल हो रहा है. इससे पहले भी दो बार ओली सरकार पर संकट आ चुका है. BBC के मुताबिक, संविधान विशेषज्ञों का कहना है कि नेपाल के नए संविधान में सदन भंग करने को लेकर कोई स्पष्ट प्रावधान नहीं है. प्रधानमंत्री के इस फैसले को अदालत में चुनौती दी जा सकती है

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