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शरद पवार ने क्या सच में पोते पार्थ के लिए चुनाव लड़ने से मना किया या वजह कुछ और है?

महाराष्ट्र के सीएम इस कदम पर शरद पवार की मौज ले रहे हैं.

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12 मार्च 2019 (अपडेटेड: 12 मार्च 2019, 01:42 PM IST)
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शरद पवार ने इस लोकसभा चुनाव में नहीं उतरने का ऐलान किया है. अब उनके पोते पार्थ मैदान में होंगे.
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महाराष्ट्र में दो ही बड़ी क्षेत्रीय पार्टियां हैं. एक शरद पवार की एनसीपी. दूसरी ठाकरे परिवार की शिवसेना. लोकसभा के लिहाज से राज ठाकरे की पार्टी को फिलहाल इग्नोर करते हैं. तो शिवसेना ने घूम-फिरकर वापस बीजेपी से दोस्ती कर ली है. दूसरी ओर एनसीपी तो कांग्रेस की पक्की दोस्त बनी पहले से ही बैठी है. पर ताजा खबर ये है कि चुनाव से महीने भर पहले एनसीपी के सर्वेसर्वा शरद पवार ने चुनाव न लड़ने का ऐलान किया है. इसकी वजह बताते हुए वो बोले -
मेरे परिवार के दो सदस्य(बेटी और पोता) इस बार लोकसभा चुनाव में खड़े हो रहे हैं. इसलिए मैंने सोचा कि यही चुनाव न लड़ने का सही समय है.
पर ये वाली वजह तो कैमरे के सामने वाली वजह है. असल में इसमें दो और एंगल चल रहे हैं-
# पहला एंगल मजेदार है. दरअसल जिस माढा सीट से शरद पवार की चुनाव लड़ने की तैयारी थी. वहां से वर्तमान सांसद हैं विजयसिंह मोहिते पाटिल. यह उनका पैतृक क्षेत्र माना जाता है. उनके पिता शंकरराव मोहिते पाटिल महाराष्ट्र में सहकारिता आंदोलन के संस्थापकों में से एक रहे हैं. विजयसिंह मोहिते खुद 1981 से विधानसभा के सदस्य एवं 1983 से राज्य सरकार में मंत्री रहते आए हैं. एक बार उपमुख्यमंत्री भी रह चुके हैं. ऐसे में अगर पवार पाटिल का टिकट काटकर यहां से चुनाव लड़ते तो उनका विरोध हो सकता था. भीतरघात तो तय ही थी. इसका नमूना कुछ दिन पहले तब मिला जब एक मीटिंग के दौरान पार्टी के दो धड़े आपस में भिड़ गए. वो भी तब जब पवार अपना भाषण दे रहे थे. इससे पवार को अपना भाषण रोकना पड़ा.
इसके साथ ही पाटिल परिवार न सिर्फ माढा, बल्कि सोलापुर एवं बारामती तक के किसान परिवारों में गहरी पैठ रखता है. ऐसे में पवार माढा से चुनाव लड़ते, तो पाटिल का टिकट कटता. पाटिल परिवार शांत बैठ जाता. इसका असर पवार की जीत पर तो कम पड़ता, क्योंकि वो तो बड़े नेता हैं. मगर इससे माढा के आसपास की सीटों के रिजल्ट जरूर बिगड़ सकते थे. जिनमें एक सीट शरद की बेटी सुप्रिया सुले की बारामती भी शामिल है.
शरद पवार ने चुनाव न लड़ने का फैसला किया है.
शरद पवार ने चुनाव न लड़ने का फैसला किया है.

दूसरा एंगल ये कि पवार परिवार की पारंपरिक बारामती सीट से पवार की बेटी सुप्रिया सुले सांसद हैं. जबकि पुणे जनपद की मावल सीट से पवार के भतीजे अजीत पवार के पुत्र पार्थ को लोकसभा चुनाव लड़ाने की भूमिका तैयार हो चुकी है. पवार के माढा से लड़ने की उम्मीद जताई जा रही थी. मगर जानकारों का कहना है कि एक-दूसरे से सटी इन तीन लोकसभा सीटों पर एक ही परिवार के तीन लोग लड़ते तो विरोधी दल इसे हथियार के तौर पर इस्तेमाल कर सकते थे. इसलिए पवार ने माढा में अपने कदम पीछे खींच लिए.
एक एंगल पवार के पक्ष में
एक और एंगल जो शरद पवार के इस कदम के पक्ष में चल रहा है वो ये कि शरद के माढा से खुद न चुनाव लड़ने के दो फायदे हैं. एक तो ये कि कार्यकर्ताओं के बीच अच्छा संदेश गया कि उन्होंने अपना वादा निभाया. परिवार से दो लोगों के लड़ने का. पहले ये तय था कि शरद और उनकी बेटी चुनाव लड़ेंगी. मगर फिर पोते पार्थ को चुनाव लड़ाने का दबाव उन पर भतीजे अजीत पवार की तरफ से डाला गया. इस लिए पार्थ का नाम आगे कर वो पीछे हट गए और कार्यकर्ताओं का हक नहीं मारा.
दूसरा काम ये कि वो माढा से चुनाव नहीं लड़के अब एक लोकसभा में नहीं फंसेंगे, बल्कि पूरे प्रदेश में बैटिंग कर सकेंगे. प्रचार करके अपने पक्ष में माहौल बना सकेंगे.
बीजेपी सीएम बोले- ये हमारी पहली जीत
हालांकि इस एंगल से महाराष्ट्र बीजेपी इत्तेफाक नहीं रखती. महाराष्ट्र के सीएम देवेंद्र फडणवीस तो इसे बीजेपी की पहली जीत बता रहे हैं. उन्होंने कहा -
ये बीजेपी के लिए एक बड़ी जीत है. ये मोदी लहर का सबूत है. उन्होंने (शरद पवार) महसूस किया है कि ये लहर मोदी के पक्ष में है तभी चुनाव लड़ने से मना कर दिया.
महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फणनवीस ने शरद पवार पर निशाना साधा है.
महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फणनवीस ने शरद पवार पर निशाना साधा है.
इस पर एनसीपी नेताओं का कहना है कि शरद पवार ने लगातार 14 चुनाव जीते हैं. कभी नहीं हारे. तो किसी हवा के डर की कोई बात नहीं है.
कौन हैं पार्थ पवार
पार्थ शरद पवार के पोते हैं. शरद पवार के भतीजे अजीत पवार के सुपुत्र और पवार परिवार के युवा चेहरे. उम्र 28 साल है. लगातार एनसीपी के कार्यक्रमों में एक्टिव रहते हैं. अपने पिता अजीत पवार का सोशल मीडिया का काम देखते हैं. मावल सीट जहां से पार्थ के लड़ने की बात है, वह वहां भी लगातार जाते रहे हैं. वहां के एनसीपी नेताओं और कार्यकर्ताओं के साथ कई मीटिंगें की हैं. और ये करना बनता भी है, क्योंकि 2014 में ये सीट शिवसेना ने जीती थी. वो भी करीब 1.70 लाख वोटों के मार्जिन से.
कार्यकर्ताओं के साथ पार्थ पवार.
कार्यकर्ताओं के साथ पार्थ पवार.

पार्थ ने कुछ दिन पहले एक इंटरव्यू में कहा था कि वो खुद लोकसभा चुनाव ही लड़ना पसंद करेंगे. स्टेट की राजनीति के बजाए उनको केंद्र की राजनीति ज्यादा पसंद है. इससे उनकी राष्ट्रीय मुद्दों को लेकर समझ बढ़ेगी. तो शरद पवार के बैठने से उनका नंबर लग गया है. देखिए राजनीति में उनकी एंट्री कैसी रहती है.


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