पहले लेस्बियनिज्म को अपराध बताया, अब NMC ने मेडिकल पाठ्यक्रम वापस ले लिया
राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग (National Medical commission) ने हंगामे के बाद अंडर ग्रेजुएट मेडिकल स्टूडेंट्स के फॉरेंसिक सिलेबस में हुए संशोधन को वापस ले लिया है. इस सिलेबस में ‘सोडोमी’ और 'लेस्बियनिज्म' (Sodomy and Lesbianism) को अप्राकृतिक यौन अपराध कैटेगरी में रखा गया था.

राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग (National Medical commission) ने हंगामे के बाद अंडर ग्रेजुएट मेडिकल स्टूडेंट्स के फॉरेंसिक सिलेबस में हुए संशोधन को वापस ले लिया है. राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग की तरफ से जारी एक अधिसूचना में कहा गया कि उपर्युक्त दिशा-निर्देशों को संशोधित किया जाएगा और तय समय में फिर से अपलोड किया जाएगा. यह इस बात को ध्यान में रखते हुए महत्वपूर्ण है कि MBBS का नया सत्र अक्टूबर में शुरू होने की संभावना है.
इंडियन एक्सप्रेस से जुड़ी अनोन्ना दत्त की रिपोर्ट के मुताबिक, संशोधित फॉरेंसिक मेडिसिन सिलेबस में ‘सोडोमी’ और 'लेस्बियनिज्म' (Sodomy and Lesbianism) को अप्राकृतिक यौन अपराध कैटेगरी में रखा गया था. और हाइमन (Hymen) के महत्व, वर्जिनिटी (Virginity) की परिभाषा और Defloration के चिकित्सकीय और कानूनी महत्व जैसे विषयों को फिर से शामिल किया गया था.
संशोधित पाठ्यक्रम में सहमति से समलैंगिक व्यक्तियों और एडल्टरी के दौरान बने यौन संबंधों और रक्तसंबंधियों और पशुओं के साथ सेक्स के अपराध के बीच का फ़र्क मिटा दिया गया था. LGBTQ+ समुदाय के लिए पढ़ाई को ज्यादा सहज बनाने के लिए NMC ने 2022 में इन टॉपिक्स को मॉड्यूल में शामिल किया था. 2022 में किए गए बदलावों के तहत सोडोमी और लेस्बियनिज्म को अप्राकृतिक यौन अपराधों की श्रेणी से हटा दिया गया था. आयोग ने 2022 में साइकेट्री मॉड्यूल के सिलेबस में भी बदलाव किया था. ताकि स्टूडेंट्स को सेक्स, जेंडर आइडेंटिटी और सेक्सुअल ओरिएंटेशन के बारे में समझने में ज्यादा मदद मिले.
हालांकि, अब वापस लिए गए सिलेबस में साइकेट्री मॉड्यूल में किए गए बदलावों में सेक्स, जेंडर आईडेंटिटी और यौन झुकाव (सेक्सुअल ओरिएंटेशन) की बेहतर समझ के बारे में विस्तार से नहीं बताया गया है. इसके अलावा नया बदलाव इस बात पर भी जोर नहीं देता कि छात्रों को 'जेंडर आइडेंटिटी डिसऑर्डर' (gender identity disorders) के बारे में भी पढ़ाया जाना चाहिए. जबकि 2022 में किए गए बदलावों में ये इन विषयों के बारे में विस्तार से बताया गया था.
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इसके अलावा विकलांगता अधिकार कार्यकर्ताओं ने भी इस बदलाव पर आपत्ति जताई थी. उन्होंने बताया कि सिलेबस में स्टूडेंट्स के फाउंडेशन कोर्स में विकलांगता पर सात घंटे की ट्रेनिंग शामिल थी. लेकिन हालिया संशोधन में इसे भी समाप्त कर दिया गया है. और इसमें एथिक्स मॉड्यूल को भी टॉपिक के रूप में शामिल नहीं किया गया है. विकलांग कार्यकर्ताओं ने बताया कि यह विकलांग अधिकार अधिनियम का उल्लंघन है. विकलांग अधिकार अधिनियम यूनिवर्सिटी, कॉलेजों और स्कूलों के सिलेबस में विकलांगता को शामिल करने की मांग करता है.
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