ल्यो, नरोदा पाटिया केस में सातवें जज ने भी खुद को सुनवाई से अलग किया
गुजरात हाई कोर्ट में पिछले दो साल से नरोदा पाटिया केस के नाम पर ड्रामा हो रहा है!
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कब मिलेगा नरोदा पाटिया के पीड़ितों को न्याय
गुजरात हाई कोर्ट के सीनियर जस्टिस अकील कुरैशी ने शनिवार को खुद को 2002 के नरोदा पाटिया दंगे से जुड़ी याचिकाओं की सुनवाई से अलग कर लिया. ऐसा करने वाले वो सातवें जज हैं. इससे पहले इस मामले में जस्टिस एमआर शाह, जस्टिस केएस झावेरी, जस्टिस सोनिया गोकानी, जस्टिस आरएच शुक्ल, जस्टिस अनंत दावे, और जस्टिस जीबी शाह मामले की सुनवाई से खुद को अलग कर चुके हैं.
जस्टिस कुरैशी ने कहा, "यह बहुत तकलीफदेह है. हम इस पर कुछ नहीं कहेंगे, लेकिन इससे न्यायपालिका की इमेज का नुकसान होगा और जनता का न्यायपालिका पर जो भरोसा है, वो कम हो जाएगा. ऐसा नहीं होना चाहिए. मुझे कोर्ट ने यह केस दिया था. इसमें मेरा कोई व्यक्तिगत स्वार्थ नहीं है."
गुजरात हाई कोर्ट के एक सीनियर एडवोकेट ने बताया कि जस्टिस कुरैशी ने इस केस से खुद को तब अलग किया है, जब सीनियर लॉयर बीबी नायक ने ये केस ज्वाइन किया, क्योंकि नायक जस्टिस कुरैशी के करीबी माने जाते हैं. ऐसे में जस्टिस कुरैशी पर "कॉन्फ्लिक्ट ऑफ इन्ट्रेस्ट" के आरोप लग रहे थे. जस्टिस कुरैशी ने केस से हटने का फैसला सुबह कोर्ट की फंक्शनिंग शुरू होने से ठीक पहले लिया.
लॉयर बीबी नायक ने मीडिया को बताया, "वकालतनामा बहुत पहले फाइल किया गया था, जब ये मैटर दूसरे जस्टिस वाली बेंच देख रही थी. जस्टिस कुरैशी मेरे मैटर को नहीं देख रहे हैं. एक बार जब केस को उनकी बेंच देख रही थी, तब मैंने खुद को केस से अलग कर लिया था, जिसके बाद भी मैटर चलता रहा. हर बार मैं खुद को केस से अलग नहीं कर सकता हूं."
जस्टिस कुरैशी ने अपने ऑर्डर में लिखा है," इस केस से हटने की अपील कई जजों ने खुद ही की है और इसकी कई वजहें रही हैं.
वैसे इतना कुछ होने के बाद आप ये तो जरूर जानना चाहेंगे कि आखिर ये नरोदा पटिया कांड है क्या, जिससे हर जज खुद को अलग किए ले रहा है. वजह जो भी हो, लेकिन अब ये केस असाधारण तो हो ही गया है. चलते हैं इसके बैकग्राउंड में..
नरोदा पाटिया दंगे का केस अगस्त 2009 में शुरू हुआ. तब गुजरात की एक लोअर कोर्ट में 62 आरोपियों के खिलाफ आरोप दर्ज किए गए थे. सुनवाई के दौरान ही एक आरोपी शेट्टी की मौत हो गई थी. कोर्ट ने सुनवाई के दौरान 327 लोगों के बयान दर्ज किए. इनमें पत्रकारों, पीड़ितों, डॉक्टरों, पुलिस अधिकारियों और सरकारी अधिकारियों को शमिल किया गया. सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले और गुजरात दंगे से जुड़े दूसरे मामलों की जांच के लिए 2009 में एक SIT बनाई. इन दंगों में 1,000 लोग मारे गए थे, जिनमें ज्यादातर मुस्लिम थे. इस मामले में कुल 327 गवाह और 2,500 दस्तावेजी सबूत कोर्ट में पेश किए गए.
माया कोडनानी और बाबू बजरंगी
29 अगस्त, 2012 को नरोदा पाटिया दंगे के मामले के चार मुख्य आरोपियों को गुजरात की एक लोअर कोर्ट ने उम्रकैद की सजा सुनाई थी. इसमें गुजरात की पूर्व मंत्री माया कोडनानी, बजरंग दल नेता बाबू बजरंगी, कोडनानी का सहयोगी किशन कोरनानी और नरोदा का कारोबारी मनोज कुकरानी का नाम है. इसके अलावा 32 और लोगों को कोर्ट ने दोषी माना था. कोर्ट ने मामले में आरोपी बनाए गए 29 लोगों को बरी कर दिया था. कोडनानी सहित दोषी ठहराए गए सभी लोगों को आईपीसी की धारा 302 (हत्या) और धारा 120बी (साजिश) सहित अलग-अलग धाराओं के तहत आरोपी बनाया गया था.
ये पहला मौका था, जब गुजरात दंगों के किसी मामले में किसी पूर्व मंत्री को दोषी ठहराया गया था. गवाहों ने कोर्ट में बयान दिया था कि कोडनानी ने भीड़ को दंगे के लिए उकसाया था. कोडनानी उस समय वहां की विधायक थीं और 2007 में विधानसभा चुनाव जीतने के बाद गुजरात सरकार में 'महिला और बाल विकास मंत्री' भी बनीं.
बाबू बजरंगी पर नरोदा पाटिया के मुस्लिमों पर हमला करने वाली भीड़ को लीड करने का आरोप था. तहलका के स्टिंग ऑपरेशन में उसने इस जेनोसाइड में अपने शामिल होने की बात स्वीकारी थी. दोषी ठहराए गए लोगों ने लोअर कोर्ट के फैसले के खिलाफ गुजरात हाई कोर्ट में याचिका दायर की थी, जबकि दंगे में बचे लोगों और मामले की जांच करने वाली SIT ने सजा बढ़ाने की मांग को लेकर याचिकाएं दायर की हैं.
नरोदा पाटिया की एक सरवाइवर
गुजरात में 2002 में हुए दंगों के दौरान अहमदाबाद में स्थित नरोदा पाटिया इलाके में 97 लोगों की हत्या कर दी गई थी. 28 फरवरी, 2002 को हुए दंगे में 33 लोग घायल भी हुए थे. ये घटना 27 फरवरी, 2002 को गोधरा में साबरमती एक्सप्रेस ट्रेन जलाए जाने के एक दिन बाद हुई थी. विश्व हिन्दू परिषद ने 28 फरवरी, 2002 को बंद का ऐलान किया था. इसी दौरान नरोदा पटिया इलाके में दंगाइयों ने अल्पसंख्यक समुदाय पर हमला कर दिया था.
मरने वालों में ज्यादातर मुस्लिम थे. दरअसल, नरोदा पटिया में दंगे गोधरा कांड के अगले दिन ही शुरू हो गए थे. रिपोर्ट्स के मुताबिक कुछ VHP नेताओं ने अफवाह उड़ा दी थी कि मुस्लिमों ने तीन हिन्दू लड़कियों को किडनैप कर रखा है. उसी शाम से नरोदा पाटिया में रहने वाले मुसलमानों पर दंगाइयों ने हमले करने शुरू कर दिए. वहां अल्पसंख्यकों के साथ नरसंहार किया गया था.
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जस्टिस कुरैशी ने कहा, "यह बहुत तकलीफदेह है. हम इस पर कुछ नहीं कहेंगे, लेकिन इससे न्यायपालिका की इमेज का नुकसान होगा और जनता का न्यायपालिका पर जो भरोसा है, वो कम हो जाएगा. ऐसा नहीं होना चाहिए. मुझे कोर्ट ने यह केस दिया था. इसमें मेरा कोई व्यक्तिगत स्वार्थ नहीं है."
गुजरात हाई कोर्ट के एक सीनियर एडवोकेट ने बताया कि जस्टिस कुरैशी ने इस केस से खुद को तब अलग किया है, जब सीनियर लॉयर बीबी नायक ने ये केस ज्वाइन किया, क्योंकि नायक जस्टिस कुरैशी के करीबी माने जाते हैं. ऐसे में जस्टिस कुरैशी पर "कॉन्फ्लिक्ट ऑफ इन्ट्रेस्ट" के आरोप लग रहे थे. जस्टिस कुरैशी ने केस से हटने का फैसला सुबह कोर्ट की फंक्शनिंग शुरू होने से ठीक पहले लिया.
लॉयर बीबी नायक ने मीडिया को बताया, "वकालतनामा बहुत पहले फाइल किया गया था, जब ये मैटर दूसरे जस्टिस वाली बेंच देख रही थी. जस्टिस कुरैशी मेरे मैटर को नहीं देख रहे हैं. एक बार जब केस को उनकी बेंच देख रही थी, तब मैंने खुद को केस से अलग कर लिया था, जिसके बाद भी मैटर चलता रहा. हर बार मैं खुद को केस से अलग नहीं कर सकता हूं."
जस्टिस कुरैशी ने अपने ऑर्डर में लिखा है," इस केस से हटने की अपील कई जजों ने खुद ही की है और इसकी कई वजहें रही हैं.
वैसे इतना कुछ होने के बाद आप ये तो जरूर जानना चाहेंगे कि आखिर ये नरोदा पटिया कांड है क्या, जिससे हर जज खुद को अलग किए ले रहा है. वजह जो भी हो, लेकिन अब ये केस असाधारण तो हो ही गया है. चलते हैं इसके बैकग्राउंड में..
अगस्त 2009 में शुरू हुआ था नरोदा पाटिया का केस
नरोदा पाटिया दंगे का केस अगस्त 2009 में शुरू हुआ. तब गुजरात की एक लोअर कोर्ट में 62 आरोपियों के खिलाफ आरोप दर्ज किए गए थे. सुनवाई के दौरान ही एक आरोपी शेट्टी की मौत हो गई थी. कोर्ट ने सुनवाई के दौरान 327 लोगों के बयान दर्ज किए. इनमें पत्रकारों, पीड़ितों, डॉक्टरों, पुलिस अधिकारियों और सरकारी अधिकारियों को शमिल किया गया. सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले और गुजरात दंगे से जुड़े दूसरे मामलों की जांच के लिए 2009 में एक SIT बनाई. इन दंगों में 1,000 लोग मारे गए थे, जिनमें ज्यादातर मुस्लिम थे. इस मामले में कुल 327 गवाह और 2,500 दस्तावेजी सबूत कोर्ट में पेश किए गए.
29 अगस्त, 2012 को आया था फैसला
माया कोडनानी और बाबू बजरंगी
29 अगस्त, 2012 को नरोदा पाटिया दंगे के मामले के चार मुख्य आरोपियों को गुजरात की एक लोअर कोर्ट ने उम्रकैद की सजा सुनाई थी. इसमें गुजरात की पूर्व मंत्री माया कोडनानी, बजरंग दल नेता बाबू बजरंगी, कोडनानी का सहयोगी किशन कोरनानी और नरोदा का कारोबारी मनोज कुकरानी का नाम है. इसके अलावा 32 और लोगों को कोर्ट ने दोषी माना था. कोर्ट ने मामले में आरोपी बनाए गए 29 लोगों को बरी कर दिया था. कोडनानी सहित दोषी ठहराए गए सभी लोगों को आईपीसी की धारा 302 (हत्या) और धारा 120बी (साजिश) सहित अलग-अलग धाराओं के तहत आरोपी बनाया गया था.
ये पहला मौका था, जब गुजरात दंगों के किसी मामले में किसी पूर्व मंत्री को दोषी ठहराया गया था. गवाहों ने कोर्ट में बयान दिया था कि कोडनानी ने भीड़ को दंगे के लिए उकसाया था. कोडनानी उस समय वहां की विधायक थीं और 2007 में विधानसभा चुनाव जीतने के बाद गुजरात सरकार में 'महिला और बाल विकास मंत्री' भी बनीं.
बाबू बजरंगी पर नरोदा पाटिया के मुस्लिमों पर हमला करने वाली भीड़ को लीड करने का आरोप था. तहलका के स्टिंग ऑपरेशन में उसने इस जेनोसाइड में अपने शामिल होने की बात स्वीकारी थी. दोषी ठहराए गए लोगों ने लोअर कोर्ट के फैसले के खिलाफ गुजरात हाई कोर्ट में याचिका दायर की थी, जबकि दंगे में बचे लोगों और मामले की जांच करने वाली SIT ने सजा बढ़ाने की मांग को लेकर याचिकाएं दायर की हैं.
नरोदा पाटिया का दंगा
नरोदा पाटिया की एक सरवाइवर
गुजरात में 2002 में हुए दंगों के दौरान अहमदाबाद में स्थित नरोदा पाटिया इलाके में 97 लोगों की हत्या कर दी गई थी. 28 फरवरी, 2002 को हुए दंगे में 33 लोग घायल भी हुए थे. ये घटना 27 फरवरी, 2002 को गोधरा में साबरमती एक्सप्रेस ट्रेन जलाए जाने के एक दिन बाद हुई थी. विश्व हिन्दू परिषद ने 28 फरवरी, 2002 को बंद का ऐलान किया था. इसी दौरान नरोदा पटिया इलाके में दंगाइयों ने अल्पसंख्यक समुदाय पर हमला कर दिया था.
मरने वालों में ज्यादातर मुस्लिम थे. दरअसल, नरोदा पटिया में दंगे गोधरा कांड के अगले दिन ही शुरू हो गए थे. रिपोर्ट्स के मुताबिक कुछ VHP नेताओं ने अफवाह उड़ा दी थी कि मुस्लिमों ने तीन हिन्दू लड़कियों को किडनैप कर रखा है. उसी शाम से नरोदा पाटिया में रहने वाले मुसलमानों पर दंगाइयों ने हमले करने शुरू कर दिए. वहां अल्पसंख्यकों के साथ नरसंहार किया गया था.

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