मुंबई हमला, आरुषि, मक्का मस्जिद... श्रद्धा मामले से पहले इन बड़े मामलों में हुआ था नारको टेस्ट
कोर्ट और व्यक्ति की मंजूरी के बाद ही ये टेस्ट हो सकता है.

श्रद्धा वालकर हत्याकांड (Shraddha Walker) के आरोपी आफताब पूनावाला (Aftab Poonawala) का नारको टेस्ट (Narco Test) टाल दिया गया है. आजतक की रिपोर्ट के मुताबिक, आफताब का नारको से पहले पॉलीग्राफ टेस्ट होगा. पुलिस को अब पॉलीग्राफ टेस्ट के लिए कोर्ट और आरोपी दोनों की इजाजत लेनी होगी.
वैसे तो इस घटना को लेकर मीडिया में कई सारे साक्ष्यों का दावा किया जा रहा है. हालांकि, मीडिया रिपोर्ट्स में बताया गया है कि मामले के प्रमुख सबूत जैसे कि हत्या में शामिल हथियार, मृतक के अवशेष, खून के धब्बों वाले कपड़े और श्रद्धा का फोन अभी तक पुलिस के हाथ नहीं लगा है.
दिल्ली पुलिस का दावा है कि नारको और पॉलिग्राफ टेस्ट के जरिए वो इन सबूतों तक पहुंच पाएंगे. हालांकि, इन टेस्ट्स की विश्वसनीयता हमेशा से सवालों के घेरे में रही है. हम आपको बताएंगे कि इससे पहले किन बड़े मामलों ने इस तरह का टेस्ट किया गया था. उससे पहले जान लेते हैं कि ये टेस्ट क्या है.
क्या है नारको टेस्ट?नारको टेस्ट के दौरान आरोपी को Sodium Pentothal नामक एक ड्रग का इंजेक्शन दिया जाता है. इस ड्रग के चलते व्यक्ति हिप्नॉटिक या अचेत अवस्था में चला जाता है. ये एक ऐसी स्थिति होती है, जब लोग कल्पना नहीं कर पाते हैं.
इसलिए, ऐसा माना जाता है कि इस स्थिति में व्यक्ति झूठ नहीं बोल पाता है और सही सूचनाएं दे सकता है. हालांकि, अभी तक यह वैज्ञानिक तरीके से सिद्ध नहीं हो पाया है और मेडिकल फील्ड में यह एक विवादास्पद विषय बना हुआ है.
Sodium Pentothal या Sodium Thiopental ड्रग को 'ट्रुथ सीरम' भी कहा जाता है. द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान सूचनाएं निकलवाने के लिए खुफिया एजेंसियों द्वारा इसका काफी इस्तेमाल हुआ था.
क्या है पॉलीग्राफ टेस्ट?पॉलीग्राफ टेस्ट नारको-एनालिसिस से अलग होता है. इसका इस्तेमाल किसी व्यक्ति के बयान की सत्यतता का पता लगाने के लिए किया जाता है. यह टेस्ट इस अनुमान पर आधारित है कि झूठ बोलते वक्त व्यक्ति की 'शारीरिक प्रतिक्रियाएं' सच बोलने की तुलना में भिन्न होती हैं.
इस टेस्ट में ये जरूरी नहीं है कि आरोपी को किसी ड्रग्स का इंजेक्शन दिया जाए. इसमें व्यक्ति के शरीर पर इलेक्ट्रोड्स लगाकर उसके बल्ड प्रेशर, पल्स रेट, सांस लेने की गति, पसीना, ब्लड फ्लो इत्यादि के जरिये सच और झूठ का पता लगाया जा सकता है.
कितने कारगर हैं ये टेस्ट?जांच एजेंसियों ने केस सॉल्व करने के लिए कई बार नारको और पॉलिग्राफ टेस्ट का सहारा लिया है. हालांकि, इनकी सत्यतता पर गंभीर सवाल उठते रहे हैं.
यही वजह है कि सुप्रीम कोर्ट ने साल 2010 में अपने एक फैसले में कहा था कि इस तरह का टेस्ट (नारको-एनालिसिस, पॉलीग्राफ एग्जामिनेशन और ब्रेन इलेक्ट्रिकल एक्टिवेशन प्रोफाइल) करने के लिए किसी भी व्यक्ति पर दबाव नहीं बनाया जा सकता है. यदि ऐसा किया जाता है तो यह व्यक्तिगत स्वतंत्रता का हनन होगा. व्यक्ति और कोर्ट की मंजूरी के बाद ही ये टेस्ट किए जा सकते हैं.
खास बात ये है कि इन टेस्ट के जरिए आरोपी के जो भी बयान दर्ज किए जाते हैं, उन्हें साक्ष्य नहीं माना जाता है. सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि क्योंकि ऐसे टेस्ट के दौरान व्यक्ति सचेत अवस्था में नहीं होता है, इसलिए उसके बयान को प्रमाण नहीं माना जा सकता है.
हालांकि, इस टेस्ट के जरिए अगर कोई सामान बरामद किया जाता है, तो उसे साक्ष्य के रूप में स्वीकार किया जा सकता है.
किन बड़े मामलों में हुआ ये टेस्ट?- साल 2008 के आरुषि तलवार हत्याकांड में आरोपी डॉ. राजेश तलवार और डॉ. नुपूर तलवार का पॉलीग्राफ टेस्ट कराया गया था. ये दोनों आरुषी के माता-पिता हैं. इनके कम्पाउण्डर कृष्णा थदाराई का नारको टेस्ट कराया गया था, जो कि मीडिया में लीक हो गया था.
- 11 जुलाई 2006 को मुंबई में सिलसिलेवार ढंग से हुए ट्रेन धमाकों के आरोपियों पर नारको टेस्ट किया गया था. इस केस में बरी हुए अब्दुल वाहिद शेख ने आरोप लगाया था कि नारको टेस्ट के दौरान झूठा बयान देने के लिए उन्हें टॉर्चर किया गया था.
- साल 2007 के हैदराबाद मक्का मस्जिद धमाके में कई आरोपियों का नारको टेस्ट किया गया था.
- साल 2008 के मुंबई हमले के दोषी आतंकवादी अजमल कसाब का भी नारको टेस्ट कराया गया था. इस टेस्ट में कसाब ने कई जानकारियां दी थीं.
- शीना बोरा हत्याकांड की आरोपी इंद्राणी मुखर्जी ने मई 2017 में लाई डिटेक्टर टेस्ट करने की मंजूरी दी थी. हालांकि, सीबीआई ने इससे इनकार कर दिया था और कहा था कि इंद्राणी के खिलाफ उनके पास पर्याप्त सबूत हैं.
- सीबीआई ने जुलाई 2019 में उत्तर प्रदेश में उन्नाव रेप पीड़िता को ले जा रहे वाहन को टक्कर मारने वाले ट्रक के ड्राइवर और हेल्पर पर ये टेस्ट करने की मांग की थी.
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