वो अप्रैल 2014 का वक्त था. बांग्लादेश के नारायणगंज की प्रमुख नदी शीतलक्ष्या मेंएक पेट कटी लाश मिली थी. अंतड़ियां निकली थी. एेसी और लाशें भी थीं. कुल सात नृशंसहत्याएं की गईं. पूरे देश में दहशत फैली थी. मरने वाले में हाई प्रोफाइल लोग भी थे.इस मामले की एक कड़ी भारत से भी जुड़ी थी.इनमें से एक लाश बांग्लादेश के प्रमुख दल आवामी लीग के नेता नजरूल इस्लाम की थी. इससमय बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना इसी पार्टी से हैं. इस सेवन मर्डर केसमें अब फैसला आ गया है.सोमवार को बांग्लादेश की एक कोर्ट ने इस मामले में 26 लोगों को मौत की सजा सुनाई.नौ अन्य लोगों को भी सजा दी गई है. जज इनायत हुसैन ने फैसला सुनाया. इन 26 दोषियोंमें आवामी लीग के ही एक और लीडर नूर हुसैन और रैपिड एक्शन बटालियन (RAB) केबर्खास्त अफसर लेफ्टिनेंट कर्नल तारेक सईद मोहम्मद, मेजर आरिफ हुसैन और लेफ्टिनेंटकमांडर एम एम राना शामिल हैं.नूर हुसैनतारेक सईद प्रधानमंत्री शेख हसीना की कैबिनेट के एक मंत्री का दामाद है.ये है मामलाः नजरूल इस्लाम नारायणगंज सिटी कॉरपोरेशन के पैनल मेयर थे. मुख्य दोषी नूर हुसैन भीयहां काउंसलर थे. दोनों आवामी लीग से जुड़े थे और दोस्त भी. 27 अप्रैल 2014 को मेयर नजरुल इस्लाम, उनके ड्राइवर और तीन साथी ढाका-नारायणगंजलिंक रोड से गायब हो गए थे. उनकी कार का पीछा कर रहे उनके वकील और ड्राइवर भी उठालिए गए. एक हफ्ते के भीतर इनकी लाशें शीतलक्ष्या नदी में तैरती मिलीं.नजरूल के परिवार ने नूर हुसैन पर मर्डर का आरोप लगाया. परिवार का कहना था कि नूरहुसैन ने बांग्लादेश की एलीट सेना रैपिड एक्शन बटालियन (RAB-11) के अफसरों को इसकाम के लिए करोड़ों रुपए दिए.स्थानीय लोगों के हवाले से कहा जाता है कि नूर हुसैन एक समय में ट्रक में हेल्पर काकाम करता था. फिर उसने अपराध के रास्ते ऊपर आना शुरू किया. वो खनन माफिया बन गया.साल 2000 में उसने आवामी लीग जॉइन की.एक साल की जांच के बाद पुलिस ने 35 लोगों के खिलाफ चार्जशीट दायर की. इस चार्जशीटमें नूर हुसैन और RAB-11 के दूसरे अफसर भी शामिल थे.इस मामले का इंडिया कनेक्शन ये था कि नूर हुसैन इन हत्याओं के बाद फरार चल रहा थावो भारत आ गया था. यहां कोलकाता में उसे अरेस्ट किया गया. 12 नवम्बर, 2015 को भारतने उसे बांग्लादेश को प्रत्यर्पित किया.नजरूल इस्लाम के परिवार ने सोमवार को आए फैसले का स्वागत किया है.#नारायणगंज का एक और भीषण हत्याकांड भी जानिएबांग्लादेश में नारायणगंज का इतिहास रक्तरंजित रहा है. ये बात 1964 की है. जबबांग्लादेश पूर्वी पाकिस्तान कहलाता था. नारायणगंज हत्याकांड अल्पसंख्यक बंगालीहिन्दुओं को यहां से खदेड़ने के लिए हुआ था.तब बड़ी मात्रा में बंगाली हिंदू सीमा पार से खदेड़े जा रहे थे. वो भारत में शरण लेरहे थे. हर दिन 5,000 से 6,000 लोग ढाका में इंडियन एम्बैसी के सामने लाइन में खड़ेरहते थे. बहुत से शरणार्थियों को मध्य प्रदेश के दंडकारण्य में जगह दी गई थी.पूर्वी पाकिस्तान में तब लगातार दंगे हो रहे थे.दंगों की एक फोटोनारायणगंज बिजनेस और जूट इंडस्ट्री के लिए जाना जाता है. यहां एक जूट मिल थी. अदमजीग्रुप के नाम से.इसके जनरल मैनेजर करीम ने 13 और 14 जनवरी को छुट्टी की घोषणा की और अफवाह उड़ा दी किउसके भाई की हत्या कर दी गई है. 13 जनवरी को अदमजी जूट मिल्स के वर्कर्स ने हिन्दूक्वार्टरों में हमला कर दिया. घरों में आग लगा दी गई. महिलाएं और बच्चे मार डालेगए.सुबह सात बजे के करीब 2,000 से 3,000 लोग जान बचाने के लिए लक्ष्मीनारायण कॉटनमिल्स के कंपाउंड की तरफ भागे. शाम तक यहां 25,000 लोग इकट्ठे हो चुके थे. उन्होंनेकंपाउंड का गेट बंद कर रखा था. अगले चार दिनों तक वो बगैर खाए-पिए रहे.नोट्रे डेम कॉलेज के प्रोफेसर फादर रिचर्ड नोवाक इस हत्याकांड की फोटो लेनेनारायणगंज आए थे, तब उनकी चाक़ू मारकर हत्या कर दी गई थी. तब नारायणगंज में 700 सेज्यादा लोगों की हत्या कर दी गई थी.--------------------------------------------------------------------------------ये स्टोरी निशांत ने की है.--------------------------------------------------------------------------------ये भी पढ़ें-'पाकिस्तान में एक और बांग्लादेश पनप रहा है'इंडियन क्रिकेटर जो खुद को ढाका का डॉन कहता थाक्या है पश्चिम बंगाल में दंगे का सच?