इन्हें औरतों के आरक्षण से दिक्कत है, सरकार को धमकी दी है
वजह पढ़ेंगे, तो माथा पीट लेंगे.
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पिक्चर: नागालैंड ऑनलाइन से साभार
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भारत एक चुनाव पसंद देश है. हमारे यहां चुनाव को त्योहार की तरह मनाया जाता है. लेकिन नागालैंड में एक चुनाव ऐसा हो रहा है, जिसमें नामांकन शुरू होने के बावजूद लोगों की फॉर्म भरने की हिम्मत नहीं हो रही. 1 फरवरी से नागालैंड में शहरी निकायों (म्युनिसिपल काउंसिल्स) के चुनाव होने वाले हैं. लेकिन नामांकन शुरू होने के 2 दिन बीत जाने पर भी इक्का-दुक्का फॉर्म ही भरे गए हैं. क्योंकि 'नागा होहो' ने इन चुनावों के बॉयकॉट का ऐलान कर दिया है. 'नागा होहो' सभी 18 नागा जनजातियों के समूहों की सर्वोच्च संस्था है. एक तरह से सभी नागा जनजातियों का नुमाइंदा.

पिक्चर: Reuters
इंडियन एक्सप्रेस के हवाले से खबर है कि चुनावों के खिलाफ आवाज़ उठाने वाले संगठनों ने सरकार को बाकायदा 'आगाह' किया है (धमकाया है, ये कहना गलत नहीं होगा) कि अगर मौजूदा कोटे के साथ चुनाव होते हैं, और 'आगे कुछ होता है', तो वो ज़िम्मेदार नहीं होंगे. नागा होहो ने कहा है कि 33 फ़ीसदी आरक्षण का कानून 'नागाओं के पारंपरिक नियमों' के खिलाफ जाता है. वो अपनी मांग के लिए संविधान के आर्टिकल 371 A का हवाला दे रहे हैं, जिसके तहत नागा परंपराओं के पालन करने की छूट मिलती है.
आरक्षण के खिलाफ बवाल पुराना है
नागालैंड में महिलाओं के आरक्षण के खिलाफ आवाज़ पहली बार नहीं उठी है. होहो और बाकी गुटों के दबाव में वहां की विधानसभा में 2012 में शहरी निकायों के चुनावों में महिलाओं के लिए आरक्षण के खिलाफ एक रेज़ोल्यूशन (संकल्प) पारित हो चुका है. लेकिन 2016 में गलती सुधारी गई. नागालैंड म्यूनिसिपल बिल पास कर के 2012 वाला रेज़ोल्यूशन वापस लिया गया और महिलाओं के आरक्षण का रास्ता एक बार फिर खुला.

पिक्चर: Reuters
जो वजह बताई है, वो सुन कर आप अपना माथा पकड़ लेंगे.
ये लोग इस बात से खफा हैं कि इन चुनावों में महिलाओं को 33 फीसदी आरक्षण दिया गया है! जी हां. आपने बिलकुल ठीक पढ़ा है.

पिक्चर: Reuters
इंडियन एक्सप्रेस के हवाले से खबर है कि चुनावों के खिलाफ आवाज़ उठाने वाले संगठनों ने सरकार को बाकायदा 'आगाह' किया है (धमकाया है, ये कहना गलत नहीं होगा) कि अगर मौजूदा कोटे के साथ चुनाव होते हैं, और 'आगे कुछ होता है', तो वो ज़िम्मेदार नहीं होंगे. नागा होहो ने कहा है कि 33 फ़ीसदी आरक्षण का कानून 'नागाओं के पारंपरिक नियमों' के खिलाफ जाता है. वो अपनी मांग के लिए संविधान के आर्टिकल 371 A का हवाला दे रहे हैं, जिसके तहत नागा परंपराओं के पालन करने की छूट मिलती है.
क्या है आर्टिकल 371 A ये आर्टिकल भारत के संविधान में तब जोड़ा गया, जब 1963 में नागालैंड को असम से अलग कर के भारत का 16वां राज्य बनाया गया. इसमें ये छूट दी गई कि भारत की संसद का कोई ऐसा कानून जो 'नागा परंपराओं' के खिलाफ जाता हो, बिना नागालैंड की विधानसभा की मर्ज़ी (बिना संकल्प पारित हुए) के नागालैंड में लागू नहीं होता. ये नियम सिविल और क्रिमिनल दोनों तरह के मसलों से जुड़े हो सकते हैं. ये याद रहे कि 'नागा परंपराओं' को लेकर पूरे नागालैंड में एक राय नहीं है. 'नागा परंपराओं' की अलग-अलग व्याख्या मौजूद हैं.नागालैंड सरकार ने कह दिया है कि महिलाओं को आरक्षण देना नागा परंपराओं का उल्लंघन नहीं है क्योंकि म्यूनिसिपल काउंसिल की अवधारणा (कंसेप्ट) ही नई है. ऐसे में परम्पराओं के उल्लंघन का सवाल नहीं उठता.नागालैंड विधानसभा में एक भी महिला विधायक नहीं है.
आरक्षण के खिलाफ बवाल पुराना है
नागालैंड में महिलाओं के आरक्षण के खिलाफ आवाज़ पहली बार नहीं उठी है. होहो और बाकी गुटों के दबाव में वहां की विधानसभा में 2012 में शहरी निकायों के चुनावों में महिलाओं के लिए आरक्षण के खिलाफ एक रेज़ोल्यूशन (संकल्प) पारित हो चुका है. लेकिन 2016 में गलती सुधारी गई. नागालैंड म्यूनिसिपल बिल पास कर के 2012 वाला रेज़ोल्यूशन वापस लिया गया और महिलाओं के आरक्षण का रास्ता एक बार फिर खुला.

पिक्चर: Reuters
नागालैंड में पिछले 10 सालों से विलेज डेवलपमेंट बोर्ड्स में महिलाओं को 25 फ़ीसदी आरक्षण मिला हुआ है. इसलिए टी आर ज़ीलियांग की सरकार शहरी संस्थाओं में आरक्षण देने के फैसले का बचाव कर रही है.महिलाओं के लिए आरक्षण के समर्थन में भी लोग और समूह हैं, जो लम्बे समय से इसके लिए लड़ भी रहे हैं. 'द नागा मदर्स असोसिएशन' (NMA) इनमें से सबसे प्रमुख है. नागा होहो की राय से उलट NMA का मानना है कि महिलाओं को आरक्षण देने से ही नागा परंपराओं का सही मायने में पालन हो पाएगा.

