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मस्जिद है दूर चलो यूं कर लें, अमरनाथ यात्रियों की जान को बचाया जाए

कश्मीर के मुसलमानों ने नमाज छोड़ी और बचाई अमरनाथ यात्रियों की जान. खून भी दिया.

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14 जुलाई 2016 (अपडेटेड: 14 जुलाई 2016, 08:38 AM IST)
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फोटो - thelallantop
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सारा कश्मीर विरोध प्रदर्शन, हिंसा और उपद्रव से जूझ रहा है. इसके चलते अमरनाथ यात्रा भी रोक दी गई थी. जब फिर से यात्रा शुरू हुई. तो सुरक्षा के चलते रात में यात्री आर्मी की देख-रेख में निकले. इसी दौरान एक मिनीबस जिसमें अमरनाथ जाने वाले 30 तीर्थयात्री थे. बालटाल से जम्मू जा रहे थे. अचानक एक ट्रक सामने आया, जिससे ये मिनीबस भिड़ गई. बिजबेहरा कस्बे के पास. तभी नमाज अदा करने बिजबेहरा के लोग मस्जिद की ओर निकले हुए थे. उन्हें रोने-चीखने की आवाजें सुनाई पड़ीं, तो वो ठिठक गए. कहा ये भी जा रहा है कि वे लोग कश्मीर घाटी में चल रहे विरोध प्रदर्शन में मारे गए पास के ही दो लड़कों के मातम में जा रहे थे. बहरहाल तुरंत ही वो लोग नमाज छोड़ उन आवाजों की ओर भागे. वहां वही मिनीबस गिरी हुई थी, जिसका एक्सीडेंट हो गया था. बस में मौजूद अमरनाथ यात्रियों को चोट लगी हुई थी. खून बह रहा था. तुरंत ही लोग उन्हें लेकर हॉस्पिटल की ओर भागे. बिजबेहरा का खुद ये हाल है कि यहां पिछले पांच दिनों में चार लड़कों की मौत विरोध-प्रदर्शन के दौरान हो चुकी है. इस एक्सीडेंट में ड्राइवर बिलाल अहमद मीर और एक तीर्थयात्री प्रमोद कुमार की मौत हो गई. लोग अपनी गाड़ियों में 22 घायलों को बिठाकर पास के अस्पताल की ओर भागे. जब वहां काम नहीं चला तो उन्हें लेकर लोग कश्मीर के श्री महाराजा सिंह हॉस्पिटल भी ले गए. घायल हुए एक तीर्थयात्री अनिल कुमार अरोड़ा ने इंडियन एक्सप्रेस को बताया -
'पहले हमें बाहर निकालने के लिए उन्होंने मिनीबस का दरवाजा तोड़ा. वो लोग बिल्कुल भगवान जैसे थे. उन्होंने हमें अपना खून भी दिया और हमारी जान बचाई. मैंने पहले वहां से गुजर रही दूसरी बसों, आर्मी की गाड़ियों को भी मदद के लिए पुकारा था, पर कश्मीर के हालात के चलते कोई रुका नहीं था.'
एक और यात्री अर्पण कौशिक जो मेरठ से हैं, कहते हैं -
'इन लोगों ने हमारी बहुत मदद की. उन्होंने रास्ते पर जा रही कारें रुकवा-रुकवा कर हमें हॉस्पिटल पहुंचाया.'
घटना के बाद चीफ मिनिस्टर महबूबा मुफ़्ती ने वहां के लोगों की, कश्मीर के लोगों के भाईचारे के रिवाज की तारीफ की. और इसे कश्मीरियों पर फख्र करने की वजह बताया. सरकार के एक प्रवक्ता ने महबूबा मुफ़्ती के हवाले से कहा -
'कश्मीर के इस रिवाज पर फख्र होता है कि बिजबेहरा के रहने वालों ने धार्मिक सौहार्द और भाईचारे को जिंदा रखा है.वो भी ऐसे वक़्त में जब वो खुद वहां हो रही मौतों और लॉ ऐंड आर्डर की खस्ता हालत से परेशान हैं. ऐसे में भी वो अपने गम और तकलीफों को भूलते हुए एक्सीडेंट वाली जगह की ओर भागे.'
कश्मीर की ये घटना इंसानियत के लिए मिसाल है. यूं इतनी हिंसा और मजहबी उपद्रव के बीच नमाज छोड़, मातम के बीच अमरनाथ तीर्थयात्रियों की मदद करना, उन्हें खून देकर उनकी जिंदगी बचाने की घटना दुनिया में इंसानियत की मिसाल के तौर पर हमेशा याद की जाएगी. इस वाकये पर उबैद सिद्दीकी साहब का ये शेर कितना सटीक बैठता है-

मुश्किल है मगर काम ये करना ही पड़ेगा

इंसान को इंसान से डरने नहीं देना


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