योगी सरकार का पहला टेस्ट आ गया है. यूपी में लोकल बॉडी इलेक्शन होने वाले हैं.पक्की तारीख अभी नहीं आई. मगर कौन सी सीट किसके लिए रिजर्व है, ये नोटिफिकेशन आ गयाहै. चुनाव की डेट अक्टूबर के आखिरी हफ्ते में आ जाएगी. और नवंबर आखिरी तक नतीजे भी.क्या है इसके लिए तैयारी. क्या होगा इसका असर. आइए समझें एक-एक करके.योगी आदित्यनाथ सरकार के काम पर मुहरयोगी सरकार को यूपी में राज करते 6 महीने से ज्यादा बीत गए हैं. सरकार के बड़ेनिर्णयों पर नजर डालें तो उसने किसानों की कर्ज माफी की, मगर ये रूरल सेक्टर कामामला है. शहरी इलाकों में कोई नई बड़ी स्कीम लॉन्च नहीं हुई है. मगर 100 दिन और छहमहीने वाले प्रचार में कई चीजें गिनाई जा रही हैं. बात स्मार्ट सिटी की हो रही है.स्वच्छ भारत का हवाला देकर सफाई पर बात की जा रही है. और यहीं पर सारी शहरी निकायोंकी गरारी फंस जाती है. सबसे ज्यादा गंदे शहर तो यूपी में ही हैं. इसको सुधारने केलिए सरकारी प्रयास नाकाफी ही दिखते हैं. और जैसे ही प्राइवेटाइजेशन की बात तो सफाईकर्मचारी हड़ताल पर चले जाते हैं.नवंबर में होने वाला नगर निगम चुनाव यूपी बीजेपी के लिए महत्वपूर्ण है.बीजेपी क्या अपना स्ट्रॉन्ग बेस बचा पाएगीपिछले निकाय चुनावों में बीजेपी ने 12 नगर निगमों में से 10 पर कब्जा किया था.इलाहाबाद और बरेली में हार मिली थी. 2017 में विधानसभा चुनाव के पहले इलाहाबाद कीमेयर और नंद गोपाल नंदी की पत्नी अभिलाषा गुप्ता बीजेपी में शामिल हो गईं. यानीबीजेपी के पास 11 सीटें हैं. ऐसे में सबसे बड़ी चुनौती भी बीजेपी के लिए ही है.क्योंकि उसके पास पाने को कुछ नहीं, खोने को सब कुछ है. इस बार समाजवादी पार्टी औरबहुजन समाज पार्टी ने भी नगर निगम चुनाव में इंट्रेस्ट दिखाकर बीजेपी के लिएमुश्किलें बढ़ा दी हैं. आमतौर पर कांग्रेस ही इन चुनावों में उतरती थी. केंद्र औरराज्य दोनों जगह बीजेपी सरकार है, ऐसे में खराब नतीजें आते हैं तो उन पर भी सवालखड़े होंगे. इस बात का दबाव भी उस पर होगा.मोदी-योगी यूफोरिया बचा कि नहींदेश भर में बीजेपी चाहे पंचायत चुनाव जीते या विधानसभा. क्रेडिट मोदी लहर को हीदिया जाता है. यूपी में भी 2014 के बाद 2017 के विधानसभा चुनाव में इसका असर दिखा.ऐसे में निकाय चुनाव में मोदी लहर का एक बार फिर टेस्ट होगा. मोदी-योगी फैक्टर काकितना असर है, इसका भी लिटमस टेस्ट हो जाएगा. योगी को केरल और गुजरात बुलाकर बीजेपीके नेशनल फोरम में पहले ही प्रमोट किया जा रहा है. यूपी के विधानसभा चुनावों में भीमोदी के बाद योगी की सबसे ज्यादा डिमांड थी. ऐसे में निकाय चुनाव हर हाल में जीतकरयोगी अपने आप को और बड़े ब्रांड के तौर पर पेश करना चाहेंगे.मोदी के बाद योगी की ही सबसे ज्यादा डिमांड थी यूपी विधानसभा चुनाव में.परंपरागत वोटर्स को बचाना चैलेंजव्यापारी, ट्रेडर्स, बनिया बीजेपी का परंपरागत वोट रहा है. मगर जिस तरह से पहलेनोटबंदी और फिर जीएसटी ने झटका दिया है, उससे ये वर्ग नाराज माना जा रहा है. पिछलेदिनों कई ट्रेड यूनियनों ने लखनऊ समेत कई जिलों में प्रदर्शन भी किया था. अबक्योंकि निकाय चुनाव शहरों का चुनाव है तो इनके वोट काफी अहम हो जाते हैं. फिर बाकीके वोटर भी शहरी आबादी वाले हैं. उन्हें भी नोटबंदी के बाद लंबी-लंबी लाइनों मेंलगना रह-रह के याद आता रहता है. विधानसभा चुनाव में तो इन मुद्दों को असर नहींदिखा. देखने वाला होगा कि निकाय चुनाव में बीजेपी इन्हें अपने खेमे में रखने मेंकितना कामयाब हो पाती है.दिल्ली फॉर्मूले का खौफ है मौजूदा पार्षदों मेंदिल्ली में अप्रैल 2017 में हुए नगर निगम चुनाव में बीजेपी ने ज्यादातर पार्षदों काटिकट काटकर नए लोगों को मौका दिया था. इसका नतीजा भी पॉजिटिव आया था. 272 में सेबीजेपी के हाथ 181 सीटें आईं थीं. अब यूपी में पार्षदों को ये डर सता रहा है किकहीं यूपी में भी दिल्ली फैक्टर ना चल जाए. इसके लिए तमाम पार्षदों ने पार्टी केबड़े नेताओं के चक्कर लगाना शुरू कर दिया है. 50 से ज्यादा पार्षदों का एक दल कुछदिन पहले गृहमंत्री राजनाथ सिंह से भी मिला था. पिछले 5 साल का अपना रेकॉर्ड भीदिया था. टिकट ना कटने का आश्वासन तो मिल गया था मगर पार्टी की रणनीति क्या है, इसपर अभी कोई ऑफिशियल स्टेटमेंट नहीं आया है.बीजेपी के तमाम कार्यकर्ताओं को अपनी बारी का इंतजार है.तमाम लोग अब भी एडजस्ट होने के इंतजार मेंयोगी सरकार बने 6 महीने हो गए हैं. 327 विधायकों में शुरुआत में जो मंत्री बन गए वोबन गए. बाकियों को अब भी कैबिनेट एक्सपेंशन का इंतजार है. वहीं विधानसभा चुनाव मेंहर सीट से बीजेपी के कई दावेदार थे. कई बाहरी लाए गए थे. पुराने कार्यकर्ताओं को लगरहा था कि किसी को एमएलसी तो किसी कहीं चेयरमैनी मिल जाएगी. पर वो भी अब तक नहींहुआ है. फिलहाल सबकी नजर मेयर और अध्यक्ष पद पर होगी. आरक्षण आने के बाद हर सीट परकई-कई दावेदार भी सामने आने लगे हैं. ऐसे में बीजेपी के सामने नए-पुराने सभीकार्यकर्ताओं को खुश करने का भी चैलेंज होगा. देखने वाला होगा कि बीजेपी कैसे किसकोमैनेज करती है. क्योंकि इन कार्यकर्ताओं की नाराजगी निकाय चुनावों में भारी पड़सकती है.इस बार चुनावी मुद्दा सड़क, सीवर और पानी होगा.मोदी सरकार की अधूरी योजनाओं के भरोसे चुनावस्मार्ट सिटी योजना, स्वच्छ भारत अभियान, प्रधानमंत्री आवास योजना, मुद्रा योजना.शहरों में फिलहाल इन्हीं योजनाओं के भरोसे बीजेपी चुनाव लड़ेगी. मगर हकीकत ये है किसभी योजनाएं अभी आधी-अधूरी हैं. स्मार्ट सिटी योजना की लिस्ट में यूपी के 11 शहरोंका नाम तो है. मगर उसमें सर्वे से आगे बात ही नहीं बढ़ रही है. पीएम ने 2022 तकसबको घर देने की बात कही थी, मगर हकीकत क्या है सब जानते हैं. फिर शहरों कास्ट्रक्चर तो पहले से ही बिगड़ा हुआ है. अनियोजित बसाहट. मास्टर प्लान बार-बाररिवाइज होना. पानी को लेकर सेल्फ सस्टेनेबल मॉडल नहीं होना. टूटी सड़कें. सीवेजसिस्टम में कमियां. सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट की लचर व्यवस्था. बेतरतीब प्लॉटिंग. ऐसीकई चीजों ने पहले ही शहरों का हाल बेहाल कर रखा है. इसको लेकर प्रॉपर प्लान किसी केपास नहीं है.पीएम मोदी की कई योजनाएं यूपी में चल रही हैं पर जमीनी असर कम ही दिख रहा है.नगर निगमों का खस्ताहाल रेवेन्यू मॉडलउत्तर प्रदेश में नगर निगमों का रेवेन्यू सिस्टम काफी कमजोर है. हाउस टैक्स, वॉटरटैक्स, प्रॉपर्टी टैक्स, सफाई सेस जैसे बहुत कम सोर्स हैं जहां से निगमों के पासपैसा आता है. बाकी सब सरकारी इमदाद पर निर्भर रहता है. माने सांसद निधि, विधायकनिधि. कर्मचारियों की सैलरी का बड़ा हिस्सा तो राज्य वित्त आयोग ही देता है. इसकेअलावा राज्य से अलग-अलग निगमों को अपनी हनक के हिसाब से पैसा मिलता है. मसलनकानपुर, लखनऊ, वाराणसी, आगरा बड़े निगम माने जाते हैं तो इन्हें ज्यादा पैसा मिलताहै. ज्यादातर पैसा तो केंद्र की योजनाओं के लिए आता है. मगर ये सब नाकाफी साबितहोता है. जरूरत है निगमों के अपने रेवेन्यू कलेक्शन को बढ़ाने की. इसके लिए बेहतरसिस्टम और निगमों को जरूरी अधिकार देने चाहिए. टैक्स कलेक्शन और रेवेन्यू मॉडलसुधरेगा तो ही निगम डेवलेपमेंड प्रॉजेक्ट्स को आगे बढ़ा पाएगा.बीजेपी ने वॉर्ड तक तय की जिम्मेदारियांबीजेपी ने भी इसकी तैयारी शुरू कर दी है. 11-12 अक्टूबर को कानपुर में हुई प्रदेशकार्यसमिति की बैठक में भी नगर निगम चुनाव मेन एजेंडे में रहा. 12 अक्टूबर की रातसभी सीटों के लिए आरक्षण भी जारी हो गया है. 25 अक्टूबर तक नगर निकाय चुनावों केऐलान की भी उम्मीद की जा रही है. इसी के मद्देनजर बीजेपी ने सभी सीटों पर पार्टीनेताओं को तैनात कर दिया है. हर नगर निगम सीट पर दो प्रदेश स्तर के नेताओं कोजिम्मेदारी दी गई है. ये नेता भी किसी दूसरे जिले के हैं. इसी तरह सभी पालिकाओं परजिले के हिसाब से प्रभारी और समन्वयक बनाए गए हैं.बीजेपी ने एक बार फिर वोटरों को अपने पक्ष में करने की रणनीति बनाना शुरू कर दियाहै.- 653 सीटें होंगी दांव पर - 16 नगर निगम की. - 199 नगर पालिका परिषद की - 438 नगरपंचायतों की - 25 अक्टूबर तक निकाय चुनावों के ऐलान की उम्मीद16 नगर निगमों में ये रहेगा आरक्षण16 निगमों का आरक्षण हो गया है जारी.--------------------------------------------------------------------------------लल्लनटॉप शो में सीएम योगी आदित्यनाथ के सेशन का वीडियो-ये भी पढ़ें:आप 15 लाख के चक्कर में पड़े हैं, यहां मोदीजी ने 50 लाख का इंतजाम कर दियाकबाड़ी का काम करते हैं नरेंद्र मोदी के भाई, भाभी मांजती हैं बर्तनअगर अभी चुनाव हुए, तो नरेंद्र मोदी को कितनी सीटें मिलेंगीनरेंद्र मोदी ने तो कह दिया, लेकिन क्या गांधीजी के दिखाए रास्ते पर चल पाएंगे‘गो-रक्षक’