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मां बाप टॉयलेट धोते हैं, उसकी बच्ची को एडमिशन नहीं देंगे स्कूल

इस बच्ची के मां बाप चाहे जो करते हों. लेकिन उन इंगलिश मीडियम स्कूल चलाने वालों के दिमाग में भरा गोबर कैसे साफ करे?

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9 जुलाई 2016 (अपडेटेड: 9 जुलाई 2016, 03:08 PM IST)
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Image: Reuters
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जातीय भेदभाव और छुआछूत खत्म हो गई है. ऐसा कहने से पहले बरफ वाले पानी की छीटें मुंह पर मार लेना. मुंबई में 8 साल की बच्ची तीसरी क्लास में एडमिशन पाने के लिए इंगलिश मीडियम स्कूलों की खाक छान रही है. दूसरा दर्जा अच्छे नंबरों से पास करने के बाद भी. क्योंकि उसके मां बाप पाखाना साफ करते हैं. ये खबर लेखक, कवि, गीतकार, और "ऐसी तैसी डेमोक्रेसी" फेम स्टैंडअप कॉमेडियन वरुण ग्रोवर की फेसबुक पोस्ट से मिली. और उनको मिली उनके दोस्त मीडिया पर्सन वैभव विशाल से. वैभव पिछले आठ महीने से जिया धुलगज को किसी अच्छे इंगलिश मीडियम स्कूल में डलाने की लड़ाई लड़ रहे हैं. हां जी लड़ाई. क्योंकि स्कूल्स में उसका एडमिशन उसके पैरेंट्स के पेशे की वजह से नहीं हो पा रहा. यहां तक कि उस बच्चे के मम्मी पापा, करमजीत और हिना को स्कूल में घुसने नहीं देते. एडमिशन और फॉर्म भरने की प्रक्रिया समझने के लिए. शांताक्रूज ईस्ट के वकोला एरिया का हर स्कूल छान मारा है. स्कूल वाले RTE (राइट टू एजूकेशन) का हवाला देने पर झिड़क देते हैं. कहते हैं वो कानून बेकार है. सिर्फ पहली क्लास में एडमिशन दिलाने के लिए है. तमाम नेताओं से मिले, लेकिन काम कुछ नहीं हुआ. बताओ साहब ये हाल स्कूलों का है. जहां बच्चे भेजे जाते हैं कि वो वहां से निकल जिम्मेदार नागरिक बनेंगे. और ये सारा गुड़ गोबर करने में लगे पड़े हैं. इनको कम कमाई वाले या तथाकथित छोटा पेशा करने वाले का बच्चे अपने स्कूल में लेने लायक नहीं लगता. भैया करमजीत, तुम और कुछ भी साफ करते हो. लेकिन इनके दिमाग में भरा पाखाना साफ नहीं हो पाएगा.

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