आसमान के चांद-सूरज के साथ है मुंबई की परेशानी का कनेक्शन
अगस्त के आखिर में मुंबई बरसात से बेहाल हुआ था. अब फिर शहर का वही हाल है.
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ये तस्वीर 30 अगस्त, 2017 की है. लगातार हो रही बारिश और उसपर हाई टाइड के कारण मुंबई जैसे पूरी थम गई थी...
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मुंबई की बारिश सबको भारी पड़ रही है. बच्चों को खासतौर पर. उनकी दीवाली की छुट्टियां मारी जाएंगी. 19 सितंबर से रह-रहकर बारिश हो ही रही है. 20 सितंबर को दोपहर 12 बजे हाई टाइड आया. लगभग साढ़े चार मीटर ऊंचा ज्वार. स्कूल-कॉलेज बंद रखने का फरमान पहले ही आ गया था. इस छुट्टी के बदले दीवाली की छुट्टी में से एक दिन चुरा लिया गया है. बच्चे यकीनन बहुत मायूस होंगे. मायूस तो वैसे पूरा शहर ही है. अभी दो हफ्ते पहले ही तो भर-भरकर बारिश आई थी. जीना मुहाल हो गया था लोगों का. हरदम दौड़ती मुंबई गीली होकर फिसल गई थी. अब फिर बारिश लौट आई है. अपने उसी पुराने रूप में.

बारिश के मौसम में हर साल मुंबई की जो दुर्गति होती है, वो दुनियाभर के अखबारों की सुर्खी बनती है...
बरसात में आसमान से पानी बरसता है. इसी में हाई टाइड आ जाए, तो 'एक तो करेला, दूजे नीम चढ़ा' की हालत हो जाती है. समंदर खूब सारा पानी लाकर शहर में पटक देता है. हाई टाइड यानी ज्वार. मुंबई दोतरफा मोर्चे पर घिर जाती है. जगह-जगह मोटर लगाकर पानी वापस भेजने की मशक्कत शुरू होती है. लेकिन कोई उपाय राहत नहीं देता.
हम जब यहां से आसमान में देखते हैं तो 2 मुख्य चीज़ें दिखाई देती हैं. सूरज उर चांद. तारे भी दिखाई देते हैं लेकिन वो बहुत ज़्यादा दूर रहते हैं इसलिए कुछ खास उखाड़ नहीं पाते. चांद और सूरज, इन दोनों के आस पास एक एरिया होता है जिसमें इनकी ग्रेविटी काम कर रही होती है. यही वजह है कि धरती या बाकी सभी ग्रह सूरज के आस पास चक्कर लगाते रहते हैं. अगर वो ग्रेविटी का एरिया न हो तो पृथ्वी, मंगल, बुद्ध, शनि और बाकी प्लैनेट्स अंतरिक्ष में इधर उधर छितरा जायें. ज्वार-भाटा के पीछे इन्हीं चांद और सूरज की ग्रेविटी का हाथ होता है. असल में धरती, चांद और सूरज के आपसी गुरुत्वाकर्षण से ही ज्वार-भाटा आता है.
सबको पता है कि चांद, धरती का चक्कर लगाता है और धरती, सूरज की परिक्रमा करती है. जब सूरज, धरती और चंद्रमा एक सीध में होते हैं तो धरती के ऊपर चांद और सूरज यानी 2-2 ग्रहों की ग्रेविटी काम कर रही होती है. धरती की ग्रेविटी पेड़ से टूटे सेब को अपनी ओर खींच लेती है. इसी तरह सूरा और चांद की ग्रेविटी समंदर के पानी को ऊपर खींचती है. इससे ज्वार आता है. बहुत ऊंची लहरें उठती हैं.
जब ये तीनों (सूरज, धरती और चांद) 90 डिग्री का कोण (समकोण) बनाती हैं, तो सूरज, चांद की ग्रेविटी को कैंसिल कर रहा होता है. इससे औसत लहरें होती हैं. भाटा के समय पानी किनारों से खिंच जाता है. इस समय समंदर के किनारे सबसे कम पानी होता है. वहीं, हाई टाइड के समय पानी सबसे ज्यादा होता है.
12 घंटे के अंदर पृथ्वी अपनी धुरी पर 180 डिग्री घूमती है. चंद्रमा धरती का उपग्रह है और इसके फेरे लगाता है. चंद्रमा 12 घंटे के अंदर धरती के इर्द-गिर्द करीब 6 डिग्री घूमता है. मान लीजिए कि आप समंदर किनारे पर हैं. चांद आपके सिर के ठीक ऊपर है. तो आपको हाई टाइड मिलेगा. अगर चंद्रमा धरती के दूसरे छोर पर एकदम सिर की सीध में है, तब भी हाई टाइड आएगा. लेकिन किनारे की जगहों (ओर-छोर) पर भाटा आएगा.
ज्वार आने पर समुद्र में ऊंची लहरें उठती हैं और खूब सारा पानी साथ लेकर आती हैं. इसे लेकर मजेदार विशेषण और मुहावरे भी हैं, जैसे गुस्से का ज्वार आना...
ज्यादातर जगहों पर रोजाना दो ज्वार, दो भाटा आते हैं ज्यादातर तटीय इलाकों में रोजाना दो ज्वार और दो भाटा आते हैं. समुद्र की लहरें बढ़ रही हैं या घट रही हैं, इसमें चंद्रमा की भूमिका सबसे ज्यादा है. लेकिन सब कुछ इससे ही तय नहीं होता. किसी एक खास तट की आकृति से भी फर्क पड़ता है. किसी की तटरेखा लंबी हो, तो भी अंतर आ सकता है.

भाटा आने पर पानी पीछे खिंच जाता है और समंदर के किनारे सबसे कम पानी मौजूद होता है...
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बारिश के मौसम में हर साल मुंबई की जो दुर्गति होती है, वो दुनियाभर के अखबारों की सुर्खी बनती है...
The road that leads to home is going to be a tough one tonight. 😫 #MumbaiRain
— Saima (@SaimaShaikh_) September 19, 2017
#VasaiEast
pic.twitter.com/fWAS9uDWjQ
खतरनाक कॉम्बो: मुंबई की बरसात और हाई टाइड
बरसात में आसमान से पानी बरसता है. इसी में हाई टाइड आ जाए, तो 'एक तो करेला, दूजे नीम चढ़ा' की हालत हो जाती है. समंदर खूब सारा पानी लाकर शहर में पटक देता है. हाई टाइड यानी ज्वार. मुंबई दोतरफा मोर्चे पर घिर जाती है. जगह-जगह मोटर लगाकर पानी वापस भेजने की मशक्कत शुरू होती है. लेकिन कोई उपाय राहत नहीं देता.
High tide expected at 12.03 pm & a low tide at 06.04 pm today #MumabaiRains
— Mumbai Police (@MumbaiPolice) September 20, 2017
ज्वार-भाटा का गणित क्या है?
समंदर की उफनाती लहरें ज्वार कहलाती हैं. इसमें समुद्र का पानी सामान्य से ऊपर उठ जाता है. इसका रिश्ता बस समंदर से नहीं होता. सारा खेल उसका होता है जिसकी वजह से सेब न्यूटन के सर पर आ के गिरा था. ग्रेविटी. गुरुत्वाकर्षण.हम जब यहां से आसमान में देखते हैं तो 2 मुख्य चीज़ें दिखाई देती हैं. सूरज उर चांद. तारे भी दिखाई देते हैं लेकिन वो बहुत ज़्यादा दूर रहते हैं इसलिए कुछ खास उखाड़ नहीं पाते. चांद और सूरज, इन दोनों के आस पास एक एरिया होता है जिसमें इनकी ग्रेविटी काम कर रही होती है. यही वजह है कि धरती या बाकी सभी ग्रह सूरज के आस पास चक्कर लगाते रहते हैं. अगर वो ग्रेविटी का एरिया न हो तो पृथ्वी, मंगल, बुद्ध, शनि और बाकी प्लैनेट्स अंतरिक्ष में इधर उधर छितरा जायें. ज्वार-भाटा के पीछे इन्हीं चांद और सूरज की ग्रेविटी का हाथ होता है. असल में धरती, चांद और सूरज के आपसी गुरुत्वाकर्षण से ही ज्वार-भाटा आता है.
सबको पता है कि चांद, धरती का चक्कर लगाता है और धरती, सूरज की परिक्रमा करती है. जब सूरज, धरती और चंद्रमा एक सीध में होते हैं तो धरती के ऊपर चांद और सूरज यानी 2-2 ग्रहों की ग्रेविटी काम कर रही होती है. धरती की ग्रेविटी पेड़ से टूटे सेब को अपनी ओर खींच लेती है. इसी तरह सूरा और चांद की ग्रेविटी समंदर के पानी को ऊपर खींचती है. इससे ज्वार आता है. बहुत ऊंची लहरें उठती हैं.
जब ये तीनों (सूरज, धरती और चांद) 90 डिग्री का कोण (समकोण) बनाती हैं, तो सूरज, चांद की ग्रेविटी को कैंसिल कर रहा होता है. इससे औसत लहरें होती हैं. भाटा के समय पानी किनारों से खिंच जाता है. इस समय समंदर के किनारे सबसे कम पानी होता है. वहीं, हाई टाइड के समय पानी सबसे ज्यादा होता है.
#MumbaiRains
: Massive waterlogging in various parts of Mumbai: High tide expected around 12:03 pm today. pic.twitter.com/IvHT1w4fV2
— ANI (@ANI) September 20, 2017
हर 12 घंटे 25 मिनट में एक बार आता है हाई टाइड
12 घंटे के अंदर पृथ्वी अपनी धुरी पर 180 डिग्री घूमती है. चंद्रमा धरती का उपग्रह है और इसके फेरे लगाता है. चंद्रमा 12 घंटे के अंदर धरती के इर्द-गिर्द करीब 6 डिग्री घूमता है. मान लीजिए कि आप समंदर किनारे पर हैं. चांद आपके सिर के ठीक ऊपर है. तो आपको हाई टाइड मिलेगा. अगर चंद्रमा धरती के दूसरे छोर पर एकदम सिर की सीध में है, तब भी हाई टाइड आएगा. लेकिन किनारे की जगहों (ओर-छोर) पर भाटा आएगा.
Tomorrow's holiday will be compensated by reducing one holiday from Diwali vacations: Maharashtra Education Minister Vinod Tawde — ANI (@ANI) September 19, 2017
ज्यादातर जगहों पर रोजाना दो ज्वार, दो भाटा आते हैं ज्यादातर तटीय इलाकों में रोजाना दो ज्वार और दो भाटा आते हैं. समुद्र की लहरें बढ़ रही हैं या घट रही हैं, इसमें चंद्रमा की भूमिका सबसे ज्यादा है. लेकिन सब कुछ इससे ही तय नहीं होता. किसी एक खास तट की आकृति से भी फर्क पड़ता है. किसी की तटरेखा लंबी हो, तो भी अंतर आ सकता है.

भाटा आने पर पानी पीछे खिंच जाता है और समंदर के किनारे सबसे कम पानी मौजूद होता है...
मौसम नहीं बदलता, इंसानों को करना पड़ता है होमवर्क
मुंबई इकलौता शहर नहीं इस परेशानी को झेलने वाला. नियम ही कुछ ऐसा है कि सारे समंदर किनारे वाले शहर इससे दो-चार होते हैं. कई शहरों ने मौसम के साथ अजस्टमेंट कर लिया है. अपने सिस्टम को इसके मुताबिक विकसित किया है. कई शहर अभी भी ऐसा नहीं कर सके हैं. मुंबई इसी श्रेणी में आता है. उसे होमवर्क करना होगा. अच्छी तरह. मौसम तो बदलने वाला नहीं. अपने सिस्टम को मौसम के मुताबिक बदलना होगा.बाढ़ प्रभावित इस गांव की मुश्किलें बहुत हैं, समाधान नहीं
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