मुंबई लोकल में लड़की गेट पर बस उंगलियों के बल लटकी, जनता ने मीम बना दिए
मीम बनाने वाले नहीं जानते कि वो लड़की ज़िंदगी और मौत के बीच आखिर क्यों झूल रही थी.

*वैधानिक चेतावनी - ट्रेन के दरवाज़े पर लटक कर यात्रा करना जीवन (गिरे तो) और बटुए (पकड़े गए तो) दोनों के लिए घातक है.*
इंस्टाग्राम, रेडिट, फेसबुक या X. हर जगह आज एक वीडियो चलता नज़र आया है. वीडियो में एक लड़की चप्पल पहने, एक लोकल ट्रेन के गेट पर बस उंगलियों के बल लटकी हुई है. सब अपने हिसाब से प्रतिक्रिया दे रहे हैं -
कि देखो रेलवे कितना लापरवाह है.
कि देखो लड़की कितनी लापरवाह है.
कि देखो वीडियो बनाने वाला कितना लापरवाह है (फोन गिर गया, या किसी ने छुड़ा लिया तो?).
यही क्रिएटिविटी थी, कि दुनिया के साथ-साथ हमारी नज़र भी इस वीडियो पर पड़ी. हमने इसे @mumbaimatterz नाम के X यूजर की प्रोफाइल पर देखा. वीडियो को शेयर करते हुए लिखा गया,
"मुंबई लोकल में पैर रखने के लिए रोज का स्ट्रगल.
सुरक्षित यात्रा करें. जीवन अनमोल है."
जैसा की हमने बताया वीडियो को अलग-अलग सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर शेयर किया गया है. वीडियो के लेकर रेडिट पर लिखा गया,
"मुंबई को चाहिए कि सारी लोकल्स को किफायती, पूरी तरह से बंद दरवाजे वाली और एसी वाली लोकल में बदल ले. स्पिरिट ऑफ़ मुंबई का चूरन अब बर्दाश्त नहीं किया जाना चाहिए, रोज़ के आने जाने में कुछ डिग्निटी होनी चाहिए. किसी को भी काम पर जाने जैसी ज़रा सी बात के लिए अपमानजनक तरीके और खतरे का सामना नहीं करना चाहिए."

एक रेडिट यूजर ने कहा,
“एलीट्स की जानकारी के लिए बता दें, ये ऑफिस जाते हुए हमारी पिलेट्स और कोर स्ट्रेंथ एक्सरसाईज है.”

सो रेडिट पर माहौल कुछ कथार्टिक, कुछ भावुक, कुछ डार्क ह्यूमर वाला था. लेकिन X अर्थात ट्विटर है थेथर जगह. यहां हर चीज का मजाक बनाया जा सकता है. सो इस वीडियो पर भी मीम बनाए गए,
“अरे मम्मी भरोसा करो मुंबई में एक जॉब लग गई है और लाइफ बिलकुल मजे से कट रही है इधर.”

राहुल मिश्रा नाम के X यूजर ने कहा,
"वो ऑफिस के रूड HR और मैनेजमेंट के कारण अपनी जान जोखिम में डाल रही है. वो कभी नहीं समझ पाते हैं कि लोग ऑफिस पहुंचने के लिए यात्रा कैसे करते हैं, अगर आपको ऑफिस पहुंचने में देर हो जाती है तो वो उपदेश देना और परेशान करना शुरू कर देते हैं.
कॉर्पोरेट लाइफ आसान नहीं है."

दिपांशु नाम के X यूजर ने कहा,
“हम ये काफी समय से देख रहे हैं. माने लगभग एक दशक से है. इसे अब भी प्राथमिकता क्यों नहीं बनाया गया? सरकार कुछ क्यों नहीं करती है? मुंबईकर एक आवाज बनकर ये मांग क्यों नहीं कर रहे?”

आखिर में हमारी बात. हम तो यही कहेंगे कि दफ्तर चाहे पांच मिनट (या घंटा भर भी!) लेट चले जाओ लेकिन ऐसे न जाओ. अच्छा, एक आख़िरी बात और है. ये वीडियो कहां से आया है पता नहीं चल पाया. बहुत खोजने पर भी ये नहीं मालूम हुआ कि असल वीडियो किसने बनाया है. उस व्यक्ति को क्रडिट नहीं मिल पाया, अगर हमें पता चलता है तो वो भी आपको बताएंगे.
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