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सूखे फूलों से अगरबत्ती बनाता है ये लड़का

एनआईटी दुर्गापुर से पढ़ा लड़का. किसी मंदिर में गया, बीमार पड़ गया. ठान लिया कि मंदिरों की सफ़ाई करनी है. सूखे फूलों से अगरबत्ती बनाने लगा.

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Picture courtesy: Simply Mumbai
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केतन बुकरैत
25 अप्रैल 2016 (अपडेटेड: 24 अप्रैल 2016, 05:29 AM IST)
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निखिल गम्पा. 25 साल का ये लड़का उत्तरपूर्वी मुंबई में पूजा में इस्तेमाल किये गए बेकार हो चुके फूलों से अगरबत्ती बना रहा है. ऐसा वो एक साल से किये जा रहा है. इस काम के लिए उसने एक कंपनी बनाई है. ग्रीन-वेव नाम की. इससे न केवल आस पास के एरिया की सफ़ाई हो पा रही है साथ ही गरीब तबके के काफ़ी लोगों को रोज़गार भी मिल रहा है. टाटा इंस्टिट्यूट ऑफ़ सोशल साइंस से सोशल इंटरप्रेन्योरशिप में मास्टर्स करते हुए मध्य प्रदेश के एक सुदूर गांव में पहुंचने पर उन्हें इस काम को करने का आईडिया आया. वहां एक मंदिर में रात गुजरने के बाद उन्हें मलेरिया हो गया. जिसकी वजह से उन्हें एक महीने तक बुखार में तपना पड़ा. "इस घटना की वजह से मेरा रुझान वेस्ट मैनेजमेंट और सफ़ाई कार्यक्रम की ओर गया. और मैंने कई वैज्ञानिकों और रीसर्चर्स से मुलाक़ात की. मुझे इन मंदिरों को साफ़ सुथरा करना ही था." मंदिर में इस्तेमाल हुए फूलों को पवित्र समझा जाता है और उन्हें बाकी के कूड़े के साथ नहीं फेंका जाता है. उन फूलों को ज़्यादातर प्लास्टिक बैगों में बंधकर कहीं रख दिया जाता है या फिर नदियों, तालाबों में बहा दिया जाता है. फूलों के कार्बन स्ट्रक्चर की वजह से वो ढंग से विघटित नहीं हो पाते हैं. ऐसा करने में उन्हें काफी ज़्यादा वक़्त लगता है. जिससे मिट्टी प्रदूषित होती है औत्र पोल्यूशन साइकल फिर से स्टार्ट हो जाता है. ये कहना है गम्पा का जिन्होंने नेशनल इंस्टिट्यूट ऑफ़ टेक्नोलॉजी, दुर्गापुर से ग्रेजुएशन किया हुआ है. आईआईटी कानपुर में टेस्टिंग करने के बाद गम्पा मुंबई पहुंच गए. वहां तीन मंदिरों से सांठ-गांठ बना ली. हर मंदिर के पास स्पेशल डस्टबिन रखे गए हैं जिनमें फूलों को इकठ्ठा करके रखा जाता है. हर दो दिनों बाद उन्हें खाली किया जाता है. फिलहाल लगभग 15 किलो अगरबत्तियां हर हफ़्ते बनाई जा रही हैं. गम्पा इस बात की आशा करते हैं कि बहुत ही जल्द वो हर दिन अगरबत्तियों का प्रोडक्शन शुरू कर देंगे.

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