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2000 साल पहले हुई थी मौत, अब खोपड़ी बन गई कांच की, वैज्ञानिक भी हैरान रह गए

1960 के दशक में खुदाई के दौरान इस शहर से एक शख्स का अवशेष मिला था. वैज्ञानिकों को उसकी खोपड़ी से कांच के कुछ टुकड़े मिले. उन्होंने दावा किया है कि ये टुकड़े और कुछ नहीं, बल्कि उस शख्स का मस्तिष्क ही है. जिसकी 2000 साल पहले हुए ज्वालामुखी विस्फोट से मौत हुई थी.

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28 फ़रवरी 2025 (पब्लिश्ड: 01:47 PM IST)
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शख्स की खोपड़ी से मिला कांच (फोटो: रायटर्स)
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आज से लगभग 2000 साल की पहले की बात है. इटली में एक शहर हुआ करता था-'पोम्पेई'. 79 A.D. में हुए ‘माउंट वेसुवियस ज्वालामुखी विस्फोट' से रातों-रात ये शहर वीरान हो गया. ज्वालामुखी विस्फोट की वजह से धूल, चट्टानें और गैसों का मिश्रण, 100 मील प्रति घंटे की रफ्तार से शहर की तरफ बढ़ने लगा और देखते ही देखते पूरा शहर गर्म लावे के नीचे दब गया. हजारों लोग मारे गए. इसके बाद सदियों तक इस शहर की किसी ने कोई सुध नहीं ली. पहली बार सन 1748 में कुछ युवा पर्यटक इस शहर पहुंचे और पत्थर की मूर्तियां देखकर हैरान हो गए. दरअसल, ये पत्थर की मूर्तियां नहीं, बल्कि ये वही इंसान थे जो गर्म लावा की वजह से पत्थर में तब्दील हो गए थे.

खोपड़ी से मिली ‘कांच’

पृष्ठभूमि बता दी. अब खबर पर आते हैं. 1960 के दशक में खुदाई के दौरान इस शहर से एक शख्स का अवशेष मिला था. BBC की रिपोर्ट के मुताबिक, वैज्ञानिकों को उसकी खोपड़ी से कांच के कुछ टुकड़े मिले. उन्होंने दावा किया है कि ये टुकड़े और कुछ नहीं, बल्कि उस शख्स का मस्तिष्क ही है. जिसकी 2000 साल पहले हुए ज्वालामुखी विस्फोट से मौत हुई थी. वैज्ञानिकों का मानना ​​है कि 510 डिग्री सेल्सियस तापमान वाले राख के बादल ने मस्तिष्क को घेर लिया, फिर बहुत तेजी से ठंडा हो गया. जिससे मस्तिष्क कांच में बदल गया.

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कैसे ‘मस्तिष्क’ बना कांच?

रिपोर्ट के मुताबिक, वैज्ञानिकों ने मटर की साइज के ये टुकड़े 2020 में खोजे थे. इन कांच के टुकड़ों का आकार 1-2 सेमी से लेकर कुछ मिलीमीटर तक है. वैज्ञानिकों का कहना है कि किसी पदार्थ को कांच में बदलने के लिए उस पदार्थ और उसके आसपास के वातावरण के बीच तापमान में बहुत बड़ा अंतर होना चाहिए और शायद ही यह कभी प्राकृतिक रूप से घटित होती है. वैज्ञानिकों का मानना है कि शख्स के मस्तिष्क का कांच में बदलना ‘विट्रीफिकेशन’ (किसी पदार्थ को कांच में बदलने की प्रक्रिया) द्वारा हुआ होगा. यानी पहले मस्तिष्क का कार्बनिक पदार्थ उच्च तापमान (कम से कम 510C) के संपर्क में आया, जिसके बाद वह तेजी से ठंडा हो गया.

वैज्ञानिकों का मानना है कि ये एक अनोखी खोज है. इससे पहले तक पृथ्वी पर इस तरह की कोई घटना घटित नहीं हुई.

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