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सहारनपुर की ये मुस्लिम औरत जो काम कर रही है उसपर उसे फख्र है, जाना आर्मी में चाहती थी

मेहरुन्निसा का कहना है, 'मैं जानती हूं जो कर रही हूं, कुछ गलत नहीं कर रही हूं.'

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14 जुलाई 2017 (अपडेटेड: 14 जुलाई 2017, 01:49 PM IST)
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औरत अपने हक़ को लेकर संघर्ष कर रही है. समाज में उसपर इतनी पाबंदियां लगी हैं, ये न करो, वो न करो. तुम ये नहीं कर सकती, तुम वो नहीं सकती. क्योंकि तुम औरत हो. औरत मतलब कमज़ोर हो. मतलब तुम मर्द नहीं हो. ये बातें ऐसी गढ़ी जाती हैं जैसे मर्द ही ताकतवर होते हैं, मर्द ही समझदार होते हैं. हां मर्द ताकतवर होते हैं, क्योंकि वो औरतों को दबाकर रखने की बहुत सी कलाएं जानते हैं. लेकिन इस मुस्लिम महिला ने किसी का दबाव नहीं माना. स्टीरियोटाइप को तोड़ा. और उसने उस काम को अपना करियर बना लिया, जिसके बारे में शायद ही कोई औरत सोचे. बाउंसर बन गई ये मुस्लिम महिला. जी हां बाउंसर. यानी ये औरत दूसरों को सुरक्षा दे रही है.
नाम है मेहरुन्निसा शौकत अली.
भारी भरकम बॉडी वाले मर्द देखे होंगे. जो किसी सेलेब्रिटी को प्रोटेक्ट कर रहे होते हैं. कहीं स्टेज पर खड़े होते हैं. ऐसी ही ये मुस्लिम महिला दिल्ली के एक क्लब में लोगों की हिफाज़त के लिए तैनात खड़ी रहती है. मेहरुन्निसा की निगाहें रात के वक़्त लॉन्‍ज में मस्‍ती करने वाले मर्दों पर पैनी नजर रखती हैं. मेहरुन्निसा शौकत अली कहना है कि महिलाओं को अपनी सुरक्षा के लिए खुद से आगे आना होगा. जिससे वो हमेशा अपने घर सुरक्षित पहुंचेंगी.
Mehrunnisha
मेहरुन्निसा शौकत अली का ख्वाब आर्मी जॉइन करना था.

मेहरुन्निसा शौकत अली तकरीबन एक दशक से बाउंसर के तौर पर काम कर रही हैं. फ़िलहाल वो 'सोशल' में काम कर रही हैं. सोशल एक रेस्टोरेंट है, जो रात को एक क्लब में बदल जाता है. ये रेस्टोरेंट दिल्ली के हौजखास में है.
रायटर्स के मुताबिक मेहरुन्निसा अब बार के झगड़ों, ड्रग्स लाने वालों से निपटने में माहिर हो गई हैं. सोशल के मालिक रियाज़ अमलानी बताते हैं,
'हम एक औरत को इसलिए ये काम सौंपना चाहते थे, ताकि यहां आने वाली महिलाएं खुद को सेफ महसूस कर सकें. और हमें मेहरुन्निसा के रूप में एक परफेक्ट मैच मिल गया. वो बहुत दृढ़ हैं.'
मेहरुन्निसा दिल्ली से 200 किलोमीटर दूर यूपी के सहारनपुर से ताल्लुक रखती हैं. उनका ख्वाब आर्मी में जाना या फिर पुलिस अफसर बनना था. लेकिन उनके कट्टरपंथी पिता को उनका ये आइडिया बिलकुल पसंद नहीं था. उनके पिता शौकत अली इसके सख्त खिलाफ थे. बस उनकी मां उन्हें पढ़ाना चाहती थीं. प्राइमरी स्कूल भेजने में उनकी मां ने ही उन्हें भेजा. इसके बाद उनकी फैमिली को दिल्ली में शिफ्ट होना पड़ा. और फिर मेहरुन्निसा कॉलेज टाइम से ही पार्ट टाइम जॉब करने लगीं और घर के खर्च उठाने लगीं.
मेहरुन्निसा की बहन तरन्नुम भी बाउंसर हैं.
मेहरुन्निसा की बहन तरन्नुम भी बाउंसर हैं.

मेहरुन्निसा कहती हैं,
'कई बार मेरे भाई ने पूछा, ये क्या जॉब है. अब मुझे कोई बात नहीं डराती, क्योंकि मेरे मां-बाप मेरे साथ हैं. उन्हें मुझपर पूरा विश्वास है. क्योंकि मैं जानती हूं कि मैं कुछ गलत नहीं कर रही हूं.'
मेहरुन्निसा की छोटी बहन तरन्नुम 27 साल की हैं. और वो भी बाउंसर हैं. मेहरुन्निसा जहां काम करती हैं. वहां से तरन्नुम पांच मिनट की पैदल की दूरी पर ही एक बार में बाउंसर हैं. दोनों मिलकर 30 हज़ार रुपए महीना कमाती हैं.
दोनों जिम में पसीना बहाती हैं ताकि अपने आप को और मज़बूत बना सकें. खुद को फिट रख सकें. मेहरुन्निसा कहती हैं,
'मुझे अपने काम पर प्राउड है. ये आसान जॉब नहीं है. लोगों की देखभाल करना, उसमें भी एक क्लब में औरतों की. ये एक बड़ी ज़िम्मेदारी है.'
मेहरुन्निसा का काम इसलिए ध्यान खींचता है. क्योंकि ये उस समाज से आती हैं. जहां थोड़ी दूर के लिए भी लड़की के साथ उसके छोटे से भाई को साथ कर दिया जाता है, जाओ बहन के साथ चले जाओ. अब बाहर जाने में कुछ अनहोनी हो जाए तो बहन को खुद को तो छोड़िए, अपने भाई को भी बचाना पड़ जाए. ये मानसिकता होती है औरत के लिए. जिसका सीधा सा मतलब होता है कि वो औरत है वो अपनी सुरक्षा नहीं कर सकती.
मेहरुन्निसा के पिता शौकत अली का कहना है,
'वो जहां रहते थे वहां का माहौल ही ऐसा था कि औरतों बहुत निगरानी में रखा जाता है. पर्दे की बात की जाती है. लड़कियों को पढ़ाने के मामले में और भी कट्टरपंथी होते है. ये सोचके नहीं भेजते कि लड़की है. उसे घर के काम करने चाहिए. और तो और लड़कियों के छज्जों (बालकनी) में खड़े होने पर भी बुरा माना जाता था. ऐसे माहौल में मैं भी वैसा ही सोचता था. लेकिन अब ऐसा नहीं है. दोनों लड़कियां अपने काम कर रही हैं. मुझे उनपर फख्र है.'



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