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वीके सक्सेना को कायर कहने पर मेधा पाटकर को मिली थी सजा, अब कोर्ट ने रोक लगा दी

Medha Patkar एक सामाजिक कार्यकर्ता हैं. साल 2000 में उन्होंने VK Saxena को 'कायर' कहा था. वीके सक्सेना तब नेशनल काउंसिल फॉर सिविल लिबर्टीज के अध्यक्ष थे. 2001 में सक्सेना ने पाटकर के खिलाफ मानहानि का मुकदमा दायर किया था.

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VK Saxena, Medha Patkar
मेधा पाटकर की सजा पर रोक लगा दी गई है. (फाइल फोटो: इंडिया टुडे)
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रवि सुमन
29 जुलाई 2024 (पब्लिश्ड: 04:19 PM IST)
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सामाजिक कार्यकर्ता और नर्मदा बचाओ आंदोलन की प्रमुख मेधा पाटकर (Medha Patkar) की सजा पर एक महीने की रोक लगा दी गई है. दिल्ली के साकेत कोर्ट ने मानहानि केस में दिल्ली के LG वीके सक्सेना (Delhi LG VK Saxena) को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है. अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश विशाल सिंह ने पाटकर जमानत भी दे दी है. कोर्ट ने उनसे 25 हजार रुपये का बेल बॉन्ड भरने को कहा है.

मेधा पाटकर ने 1 जुलाई को ट्रायल कोर्ट के आदेश को चुनौती दी थी. ट्रायल कोर्ट ने उन्हें मानहानि का दोषी पाया था. 24 मई को उन्हें 5 महीने की सजा सुनाई गई थी. साथ ही मुआवजे के रूप में LG सक्सेना को 10 लाख रुपये देने का निर्देश दिया था. 

क्या है पूरा मामला?

इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट के मुताबिक, साल 2000 में सक्सेना ने पाटकर के नर्मदा बचाओ आंदोलन के खिलाफ एक विज्ञापन प्रकाशित किया था. इसके बाद 25 नवंबर 2000 को मेधा पाटकर ने अपने एक बयान में वीके सक्सेना को ‘कायर’ कहा था. और उनपर हवाला के जरिए पैसों के लेन-देन का आरोप लगाया था. इसके बाद 2001 में वीके सक्सेना ने उनके खिलाफ मानहानि का मुकदमा किया था. सक्सेना तब नेशनल काउंसिल फॉर सिविल लिबर्टीज के अध्यक्ष थे. मुकदमा गुजरात के अहमदाबाद की एक अदालत में दर्ज कराया गया था. 2003 में सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले को दिल्ली के साकेत कोर्ट में ट्रांसफर कर दिया.

ये भी पढ़ें: चंदे का पैसा देश के खिलाफ इस्तेमाल करने का आरोप, मेधा पाटकर पर FIR

पाटकर ने कोर्ट में अपने बचाव में कहा कि वीके सक्सेना ने उन पर झूठे आरोप लगाए हैं. उन्होंने कहा कि सक्सेना ने 2002 में उन पर हमला भी किया था. पाटकर ने अहमदाबाद में उनके खिलाफ FIR भी दर्ज कराई थी. उन्होंने कोर्ट से कहा कि सक्सेना कॉर्पोरेट हितों के लिए काम रहे थे. 

इससे पहले, 24 मई को सजा सुनाते हुए ट्रायल कोर्ट ने कहा था कि पाटकर का बयान वीके सक्सेना के चरित्र और देश के प्रति उनकी वफादारी पर सीधा हमला था. सार्वजनिक रूप से ऐसे आरोप लगाना बहुत गंभीर है. कोर्ट ने कहा कि किसी के साहस और राष्ट्रीय निष्ठा पर सवाल उठाने से उसकी सार्वजनिक छवि और सामाजिक प्रतिष्ठा को अपूरणीय क्षति हो सकती है.

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