संगम दो बार आना चाहिए, एक बार अकेले एक बार किसी के साथ!
मसान. 2015 की सबसे चर्चित फिल्म. नीरज घैवान डायरेक्टर. नीरज को नैशनल अवार्ड मिला है अभी अभी. फ़िल्म की डायलागबाजी के लिए आयें.
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फोटो - thelallantop
बनारस में गंगा घाट के किनारे, ठण्ड में अलाव की गर्मी में लड़का अपने दोस्तों के साथ बैठा है. वो लड़की जिसपर कल तक वो जान छिड़कता था, उसकी लाश को खुद के हाथों से जलाकर वो दोस्तों के साथ बैठा शराब पी रहा है. उसके दोस्त उससे कुछ बोलने को कह रहे हैं. वो कब से चुप बैठा है. एक दोस्त कहता है कि उसे अपना टाइम लेना चाहिए.
वो अचानक कुछ कहता है. कहता है उसे शायरी पसंद है. शायरी जो उसकी महबूबा को पसंद थी. जो उसे फ़ोन पर शेर पढ़के सुनाया करती थी. जो अब जा चुकी है. सिर्फ लकड़ियों के आग में चटखने की आवाजें आ रही हैं. आग में लड़के का लाल चीकट हो चुका आधी बांह का स्वेटर चमक रहा है. उसकी आंखों में उतर आये लीटर भर आंसुओं की तरह. पीछे पुल से एक ट्रेन गुज़रती है. लड़का चीखता है, "तू किसी रेल सी गुज़रती है, मैं किसी पुल सा थरथराता हूं..." आसमान में देर तक ताकता है. और फिर पूरी ताकत लगाकर एक सवाल पूछता है, "साला ये दुःख काहे ख़तम नहीं होता है बे?"
लड़का दहाड़ें मार के रोने लगता है. वो चीख रहा होता है. उसके दोस्त उसके पास आते हैं. चुप कराना चाहते हैं लेकिन लड़का चुप होने को तैयार नहीं है. इतने में उसका दोस्त उसे कहता है, "हम बहुतै मारेंगे. हम...समन्नई रहे हो. बहुत मारेंगे हम तुमको."
ये है बनारस. बनारस का प्यार. बनारस की दोस्ती. जहां दोस्त अपने दोस्त को चुप कराने के लिए उसे मारने की धमकी देता है. फ़िल्म का नाम है मसान. कान, फ़िल्मफ़ेयर, और अब नेशनल अवार्ड! पहली ऐसी फ़िल्म जिसके डायरेक्टर को ये तीन अवार्ड मिले हों. नीरज घैवान. गैंग्स ऑफ़ वासेपुर के असिस्टेंट डायरेक्टर घैवान ने डायरेक्शन में पांव रक्खा तो एकदम सूपड़ा ही साफ़ कर दिया. 2015 की वो फ़िल्म जिसके बारे में सबसे ज़्यादा बातचीत की गयी.
फ़िल्म बनारस को दिखाती है. और ख़ास बात ये कि बनारस को सबसे ईमानदारी से दिखाती है. वो चाहे फ़िल्म के शॉट्स हों या वहां की बोली. बनारस को बनारस सा दिखाया है मसान में. फिल्म लिखी है वरुण ग्रोवर ने. वरुण बनारस के उतने ही हैं जितना बनारस वरुण का है.
नेशनल अवार्ड सोमवार को डिक्लेयर हुए हैं और इसी क्रम में हम लायें हैं मसान, लल्लन अंदाज़ में.
1.
"मरवाओगे यार!"
"अरे तुम दूर खड़े रहना ना बे."
**********
"और उसमें मकई का ज़्यादा डाल दीजियेगा. और हरी मिर्च भी डाल दीजियेगा."
"पूजा. पूजा... हैप्पी बड्डे टू यू. हैप्पी बड्डे टू यू. हैप्पी बड्डे डियर पूजा. हैप्पी बड्डे टू यू. प्लीज़..."
"थैंक यू."
"अच्छा लगा? तो फिर ट्रीट कब दे रही हो?"
"और ये घर पे क्या कहेंगी?"
"घर पे मतलब?"
"नहीं मतलब घर पे क्या कहेंगी कि इतना बड़ा...गिफ्ट कहां से आया?"
"अरे कुछ भी बोल दीजियेगा. हमें कोई दिक्कत नहीं है."
"अच्छा. एक सेकण्ड दो. ये लीजिये..."
"अरे नहीं नहीं. देने के लिए लाये हैं. ऐसे थोड़े...गिफ्ट वापस नहीं लिया जाता है. आप भी क्या बात करती हैं."
"अरे पर वो बोलेंगी क्या? भइय्या ये मूंगफली डाली आपने?"
"क्या बोलेगी बे?"
"कह देंगी आपने दिया है."
"ये बोलेंगी और घरवाले मान जायेंगे? भइय्या बस बस बस और मत भूनो उसे. और चटनी डाल दीजियेगा और ये वाली साबुत मिर्च भी. और कल की चटनी में लहसुन कम था. आज ठीक है ना?... कोई लड़की किसी लड़की को टेडी देती है क्या?"
"अब पांच रूपये के भूंजा के लिए कोई लड़की इतना उत्पात भी तो नहीं मचाती."
2.
"कितना महीना और कालेज?"
"कालेज के दू महिना और हउ बाऊ. फिर परीक्षा और साथ में प्लेसमेंट सुरु होगा."
"का सुरु होई?"
"मतलब नौकरी सुरु होगा बाऊ."
"नौकरी के लिए तो रुपइय्या भी चाही न?"
"अब अईसा नहीं होइला अम्मा. रेलवे में बिजली बोर्ड में पैसा नहीं मांगते हैं. इंटरव्यू लेता है इज्जत से."
**********
"हुआं राखी धुल रहा है औ तुम हियां बैठ के पगुराय रहा है? चाहे हुआं लौंडा सब पेल जायें चांदी?"
"शंभू चाचा है न उधर."
"शम्भुआ गंजेड़ी हउ."
"तो का करें? खाना न खाएं?"
**********
"पैसवा कितना दीहें सब?"
"अब ऊ इंटरव्यू के बाद बताइल."
"निकल जाओ अच्छा है. जित्ता जल्दी निकल जाओ अच्छा है. नहीं तो तोहरौ जिंदगी मुर्दा फूंकत फूंकत यहीं खतम हो जाई."
3.
"साला अपना टेडी बियर कितना बढ़िया लग रहा है बे? चौचक एकदम न?"
"उसका नाम नहीं पूछ सकते तुम? पूजा से?"
"का पूछेंगे? कहेंगे पूजा जी वो क्या है न कि जो आपकी वो कविता पाठ वाली सहेली है न उसपे हमारे दोस्त का दिल आ गया है और वो उसको लाइन मारना चाहते हैं. तो क्या आप उसका नाम बताने का कष्ट करेंगे प्लीज़? एक काम करते हैं एक अप्लिकेशन लिख देते हैं बढ़िया सा."
"दीपकवा साला सेंटिया गया है बे."
"अबे वो कहते हैं न. हिला-हिला के थक गया. अमवा गिरा समझो पाक गया."
"अच्छा सुनो, शकल याद है?"
"हां."
"हैं? हैं? पक्का?"
"हां हां याद है."
"अच्छा देखो ये जो है न, ये बी.एन. राय महिला महाविद्यालय का ग्रुप है."
"पूजा का एल्बम नहीं देख रहे थे तुम?"
"हां."
"उसमें नहीं होगा उसका फोटू?"
"हां बे उसके फ्रेंड लिस्ट में होगा ना. एक मिनट."
"ये...ये...
"शालू गुप्ता! भइय्या, गुप्ता जी हैं! ओह्हो...!!!"
"क्या बात है."
"अब एक काम करो. अपना फेसबुक अकाउंट बनाओ. और आज ही श्री गणेश कर दो. सुनो...मतलब फ्रेंड रिक्वेस्ट भेज दो. बना दें? हैं?"
4.
"एक और बनाइये डोम राजा. एक चुक्कढ़ अऊर."
"हम काहे के राजा?"
"अरे! बनारस में दुए तो राजा हैं. एक कासी नरेस. एक डोम राजा. एक ऊ पार. एक ई पार."
"देखा ऊ संभू चौधरी का. साल में कतना पारी आवेला? ए संभू चाचा!"
"जी साहब! दस साल में एक दिना!"
"दस साल में एक दिन पारी आत है. मतलब पूरे दिन पूरे एक दिन घाट का कमाई इनका. संभू के बाप का साल में एक पारी आता था. इहे ठसक में दस ठो बच्चा पैदा कर लिए. पारी बंट गयी. संभू के बाप रहलन एक, औ संभू एक बटा दस. अब संभू के दस साल में एक पारी आत है. अगली पारी आऊ संभू चाचा?"
"अब ना ह पारी. बेच देली लाला चौधरी के हाथ. एक लाख रुपिया मिलल रहा. बाकी उमर भिखारी."
"हमऊ बेच दे पारी. तो दस लाख मिली. का हो लाला?"
"हम कह देहली अ तू बेच देहला."
"बेच देई का?"
"बाबू..."
"अरे ई लड़बकवा का जाने? इके घाट से का लेवे देवे के? पढ़े-लिखे वाला बाबू हौ."
"लड़का का गाली देहला? अब तौ कब्भौ न बेचब पारी!"
5.
"तू किसी रेल सी गुज़रती है, मैं किसी पुल सा थरथराता हूं.
तू भले रत्ती भर न सुनती है, मैं तेरा नाम बुदबुदाता हूं.
किसी लम्बे सफ़र की रातों में, तुझे अलाव सा जलाता हूं...."
6.
"आपकी हॉबीज़?"
"म्यूज़िक."
"आप गाती हैं?"
"नहीं नहीं सुनते हैं. एफ़एम सुनते हैं. अ...सीडी लाके घर पे सुनते हैं."
"बस, म्यूज़िक?"
"और शायरी बहुत पसंद है."
"शायरी?"
"जी. बशीर बद्र, अकबर इलाहाबादी, मिर्ज़ा ग़ालिब. मिर्ज़ा ग़ालिब का नाम तो सुना होगा आपने?"
"अ...हां...वो...
ये लीजिये न...
अच्छा भइय्या, वो चटनी मिलेगी?
वो शेज़ वान सॉस?"
"हां...हां..."
"मिलेगी? एक लाइए.
शुरू कीजिये."
"आप लीजिये."
"नहीं लीजिये न.
.
.
.
तो... अब तो हम फ्रेंड हो गए हैं न?"
"हां..."
7.
"जायें?"
"घर दूर तो नहीं है तुम्हारा?"
"बस यहीं से आगे जाके. दायें जाके बायें पे कॉलोनी है. तुम कहां जा रहे हो? भेलूपुर के पास...शिवाला. ओह्ह! कमच्छा? अच्छा हम समझ गए. दुर्गाकुंड न?"
"काहे? क्या करना है? एक बार बोले न हम भेलूपुर के पास रहते हैं. तबसे लेकिन यही लगा हुआ है. और कोई बात नहीं है तुम्हारे पास?"
"हम तो सिर्फ मज़ाक कर रहे थे..."
"क्या मजाक? मजाक क्या है इसमें? जानना है कहां रहते हैं? आओ चलो बैठो तुमको लेके चलें. बैठो न तुमको लेके चलें एक बार दिखाएं तो तुम्हारी जिज्ञासा खतम हो. आओ बैठो. जानना चाहती थी न तुम? हम हरिश्चंद्र घाट पे रहते हैं.पैदा भी वहीँ हुए थे. लकड़ी उठाना मुर्दा जलाना ये काम करते हैं हम. हम क्या हमारे बाप, भाई, चाचा सब यही काम करते हैं. कभी किसी को जलता हुआ देखी हो क्या तुम? हम साला रोज यही देखते हैं. रोज यही करते हैं. सुबे से लेके शाम तक यही करते हैं. पता है जब कोई जल जाता है न, साला चमड़ा निकाल के सिर्फ कंकाल बच जाता है. कंकाल में खोपड़ी को न बांस से तोड़ना पड़ता है. उसकी राख को गंगा जी में धुलाना पड़ता है. ये सब देख पाओगी क्या तुम? देखना है तुमको? क्या हुआ अभी दोस्त का बहाना करके नहीं आ सकतीं तुम? हां?"

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