मॉब लिंचिंग पर जो केंद्र सरकार नहीं कर पाई, मणिपुर ने कर दिखाया है
दोषी को आजीवन कारावास और पीड़ित के परिवार को 5 लाख रुपए तक सहायता देने का प्रावधान.
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मणिपुर के सीएम मुख्यमंत्री एन बीरेन सिंह.
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देश में मॉब लिंचिंग की बढ़ती घटनाओं के बावजूद केंद्र सरकार की ओर से कोई कानून नहीं बना है. लेकिन मणिपुर की एन बीरेन सिंह सरकार ने ये कर दिखाया है. 21 दिसंबर 2018 को मणिपुर विधानसभा में मॉब लिंचिंग के लिए एक कानून बनाया गया है. बिल का नाम है प्रोटेक्शन फ्रॉम मॉब वायलेंस बिल, 2018 . इसके तहत ये प्रावधान है कि अगर किसी भीड़ ने किसी की जान ली तो दोषियों को आजीवन कारावास और पीड़ित परिवार को 5 लाख रुपए तक की मदद दी जाएगी. देश में अपनी तरह का ये पहला प्रयास है.
मणिपुर में इस तरह के कानून की मांग उस वक़्त तेज़ हो गई थी जब भीड़ ने आदमी की कार चोरी के इल्जाम में एक 26 साल के लड़के की पीट-पीट कर हत्या कर दी थी. 13 सितंबर 2018 को मणिपुर के पश्चिम इंफाल ज़िले में एक दुपहिया वाहन चुराने के शक में भीड़ ने मोहम्मद फारूक़ खान की हत्या कर दी थी. इस मामले में इंडियन रिज़र्व बटालियन का एक जवान भी शामिल था. इस घटना का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल होने के बाद वर्दीधारियों पर कार्रवाई की गई. सोशल मीडिया पर आए एक वीडियो में खान मरने से पहले पानी मांग रहा है लेकिन उसे ये कहकर मना कर दिया गया कि इतनी दूर से वो चोरी करने आया है तो उसे पानी क्यों पिलाया जाए? जब ये घटना वायरल हुई तो वहां की राजनीतिक पार्टियां भी सक्रिय हो गईं.

मॉब लिंचिंग वो है जब भीड़ कानून की परवाह किए बिना ऑन द स्पॉट फैसला करती है. फिर चाहे किसी की जान ही क्यों न चली जाए.
सितंबर में हुई इस घटना के बाद सरकार और जांच कर रही टीम की मीटिंग्स का दौर चलता रहा जिसमें भीड़ द्वारा किसी की हत्या किए जाने के लिए कानून बनाए जाने की मांग उठी. इसके लिए जिरीबाम जिला मुख्यालय में मीटिंग हुई. ये मीटिंग इतनी रेयर थी कि आज तक मणिपुर में राजधानी से बाहर केवल पांच सरकारी मीटिंग्स हुई हैं. उस मीटिंग के बाद सरकारी की ओर से प्रवक्ता बिस्वजीत ने कहा था-

पिछले कुछ समय से मॉब लिंचिंग की घटनाएं आम हो चली हैं.
राजस्थान में पहलू खान, उत्तर प्रदेश में अखलाक, बुलंदशहर में इंस्पेक्टर सुबोध की हत्या, गुजरात में दलितों के साथ भीड़ की मारपीट, बिहार में एक औरत को नंगा कर घुमाने की घटना, स्वामी अग्निवेश के साथ भीड़ की बदसलूकी, कर्नाटक के बीदर में व्हाट्सएप की एक अफवाह के कारण इंजीनियर की हत्या और मणिपुर में व्हीकल चोरी के इल्जाम में हुई हत्या देश में हुई मॉब लिंचिंग की कुछ मशहूर घटनाएं हैं. पिछले कुछ समय से देश भर में भीड़ द्वारा तुरंत फैसला करने की घटनाएं बड़ी आम ही चुकी हैं. और शायद इसीलिए अब ऐसे एक कानून की ज़रूरत है जो भीड़ के ऐसे बर्ताव पर नज़र रख सके और गलती पाए जाने पर सजा भी दे सके. उम्मीद है जल्द भी संसद भी इस तरह का कानून बनाकर अपनी ओर से मॉब लिंचिंग को रोकने की कोशिश करेगी. मणिपुर सरकार के इस फैसले का निश्चित तौर पर स्वागत किया जाना चाहिए.
अभी कैसे निपटाए जाते हैं मॉब लिंचिंग के मामले?
आईपीसी में मॉब लिंचिंग जैसी घटनाओं के खिलाफ कार्रवाई करने के लिए कोई स्पष्ट प्रावधान नहीं है. इसे धारा- 302 (हत्या), 307 (हत्या का प्रयास), 323 (जानबूझकर घायल करना), 147-148 (दंगा-फसाद), 149 (आज्ञा के विरूद्ध इकट्ठे होना) तथा धारा- 34 (सामान्य आशय) के तहत ही निपटाया जाता है. भीड़ द्वारा किसी की हत्या किए जाने पर आईपीसी की धारा 302 और 149 को मिलाकर पढ़ा जाता है और इसी तरह भीड़ द्वारा किसी की हत्या का प्रयास करने पर धारा 307 और 149 को मिलाकर पढ़ा जाता है तथा इसी के तहत कार्यवाही की जाती है.
मणिपुर में इस तरह के कानून की मांग उस वक़्त तेज़ हो गई थी जब भीड़ ने आदमी की कार चोरी के इल्जाम में एक 26 साल के लड़के की पीट-पीट कर हत्या कर दी थी. 13 सितंबर 2018 को मणिपुर के पश्चिम इंफाल ज़िले में एक दुपहिया वाहन चुराने के शक में भीड़ ने मोहम्मद फारूक़ खान की हत्या कर दी थी. इस मामले में इंडियन रिज़र्व बटालियन का एक जवान भी शामिल था. इस घटना का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल होने के बाद वर्दीधारियों पर कार्रवाई की गई. सोशल मीडिया पर आए एक वीडियो में खान मरने से पहले पानी मांग रहा है लेकिन उसे ये कहकर मना कर दिया गया कि इतनी दूर से वो चोरी करने आया है तो उसे पानी क्यों पिलाया जाए? जब ये घटना वायरल हुई तो वहां की राजनीतिक पार्टियां भी सक्रिय हो गईं.

मॉब लिंचिंग वो है जब भीड़ कानून की परवाह किए बिना ऑन द स्पॉट फैसला करती है. फिर चाहे किसी की जान ही क्यों न चली जाए.
सितंबर में हुई इस घटना के बाद सरकार और जांच कर रही टीम की मीटिंग्स का दौर चलता रहा जिसमें भीड़ द्वारा किसी की हत्या किए जाने के लिए कानून बनाए जाने की मांग उठी. इसके लिए जिरीबाम जिला मुख्यालय में मीटिंग हुई. ये मीटिंग इतनी रेयर थी कि आज तक मणिपुर में राजधानी से बाहर केवल पांच सरकारी मीटिंग्स हुई हैं. उस मीटिंग के बाद सरकारी की ओर से प्रवक्ता बिस्वजीत ने कहा था-
भीड़ द्वारा तुरंत सजा देने की घटनाएं बढ़ती जा रही हैं. ऐसे में फ्री ट्रायल का मौका भी नहीं दिया जाता. एक बिल लाया जाएगा जिससे इस तरह की घटनाओं को चेक किया जा सके.अब भीड़ से बचाने वाला ये कानून बनाकर सरकार ने अपना वादा पूरा किया है.

पिछले कुछ समय से मॉब लिंचिंग की घटनाएं आम हो चली हैं.
राजस्थान में पहलू खान, उत्तर प्रदेश में अखलाक, बुलंदशहर में इंस्पेक्टर सुबोध की हत्या, गुजरात में दलितों के साथ भीड़ की मारपीट, बिहार में एक औरत को नंगा कर घुमाने की घटना, स्वामी अग्निवेश के साथ भीड़ की बदसलूकी, कर्नाटक के बीदर में व्हाट्सएप की एक अफवाह के कारण इंजीनियर की हत्या और मणिपुर में व्हीकल चोरी के इल्जाम में हुई हत्या देश में हुई मॉब लिंचिंग की कुछ मशहूर घटनाएं हैं. पिछले कुछ समय से देश भर में भीड़ द्वारा तुरंत फैसला करने की घटनाएं बड़ी आम ही चुकी हैं. और शायद इसीलिए अब ऐसे एक कानून की ज़रूरत है जो भीड़ के ऐसे बर्ताव पर नज़र रख सके और गलती पाए जाने पर सजा भी दे सके. उम्मीद है जल्द भी संसद भी इस तरह का कानून बनाकर अपनी ओर से मॉब लिंचिंग को रोकने की कोशिश करेगी. मणिपुर सरकार के इस फैसले का निश्चित तौर पर स्वागत किया जाना चाहिए.
अभी कैसे निपटाए जाते हैं मॉब लिंचिंग के मामले?
आईपीसी में मॉब लिंचिंग जैसी घटनाओं के खिलाफ कार्रवाई करने के लिए कोई स्पष्ट प्रावधान नहीं है. इसे धारा- 302 (हत्या), 307 (हत्या का प्रयास), 323 (जानबूझकर घायल करना), 147-148 (दंगा-फसाद), 149 (आज्ञा के विरूद्ध इकट्ठे होना) तथा धारा- 34 (सामान्य आशय) के तहत ही निपटाया जाता है. भीड़ द्वारा किसी की हत्या किए जाने पर आईपीसी की धारा 302 और 149 को मिलाकर पढ़ा जाता है और इसी तरह भीड़ द्वारा किसी की हत्या का प्रयास करने पर धारा 307 और 149 को मिलाकर पढ़ा जाता है तथा इसी के तहत कार्यवाही की जाती है.

