इस देश का आदमी कितनी लाज, हया, शर्म, संवेदना बचाकर रखें और किस-किसके लिए बचाकररखे! पत्नी की लाश सिर पर ढोने के लिए? बेंगलुरु में लड़कियों पर सेक्शुअल हमलेदेखने के लिए? या अपने नवजात की लाश को झोले में रखने के लिए मजबूर बाप के लिए?बेंगलुरु की घटना के बाद भी अगर कुछ भंग होने से रह गया हो तो ये तस्वीर देखिए.सुनहरे भारत की एक और तस्वीर.छत्तीसगढ़ के बस्तर शहर का मामला है. वहां के महारानी मेडिकल कॉलेज में एक मजदूर कीपत्नी शशिकला डिलीवरी के लिए भर्ती थी. हॉस्पिटल में उसके 9 महीने के इंतजार केसाथ-साथ उसका लड़का भी खत्म हो गया. वो मरा हुआ पैदा हुआ. नर्स ने जैसे ही इसकी खबरडॉक्टर को दी, मेडिकल स्टाफ ने उन्हें तुरंत बेड खाली करने को कह दिया. एक बाप अपनी नवजात बच्चे की लाश और अपनी प्रसूता पत्नी के साथ अस्पताल में बेसहाराछोड़ दिया गया. न स्ट्रेचर दिया गया, न एंबुलेंस अवेलबल कराई गई. मजदूर लोग हैंसाहब. कलेजा कड़ा होता है. कुछ नहीं मिला तो बाप ने बेटे की लाश अपने झोले में रखकरअस्तपाल का बेड खाली कर दिया.बाप की तस्वीर देख लीजिए जरा. पैरों पर न जाने क्या-क्या जमा हुआ है. उसकी शक्ल बतारही है कि वो सब कर सकता था, लेकिन लड़ नहीं सकता था. और वो मां, जिसने 9 महीने मेंन जाने कितना-कुछ बुना होगा. सब कुछ एक नाल के साथ ही कटकर चला गया. ऐसा सलूक तोश्मशान में नहीं होता है किसी के साथ.सबसे कम उम्र की लाश, सबसे ज्यादा तकलीफ देती है. फिर भी आप देखिएगा, मन अगर खांचोंमें बंटा हो तो उसके बहुत हिस्से मत्था भारी कर देने वाली इस घटना के बाद भी खालीरहेंगे. आने वाली तकलीफों के लिए ये तबका तैयार है, सर. सिस्टम की नाकामी को अपनानसीब मानने के लिए तैयार हैं, सर.ये परिवार छत्तीगढ़ के बीजापुर के लंकापल्ली इलाके का रहने वाला है. राज्य का येइलाका नक्सल-प्रभावित है. इनके बारे में जब रेडक्रॉस सोसायटी वालों को पता चला, तोउन्होंने शशिकला के लिए दवाइओं और एंबुलेंस का बंदोबस्त किया. स्वास्थ्य विभाग कोइसका पता भी चला, लेकिन नतीजा वही. ढाक के तीन पात. आदेश दिया है, जांच की जाएगी.