संजय गांधी और इंदिरा पर मधुर भंडारकर फिल्म बना रहे है: कांग्रेस इसे कैसे रोकेगी?
पावर में जो भी पार्टी होती है वो अपने नेताओं की आलोचना वाली फिल्में बैन करती रही है. इस फिल्म को ये डर नहीं होगा.
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1977 में होली खेलते संजय गांधी, साथ में हैं मां और प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी.
चांदनी बार, पेज 3 और ट्रैफिक सिग्नल जैसी सोशल फिल्मों के बाद डायरेक्टर मधुर भंडारकर अब एक पोलिटिकल फिल्म लाने जा रहे हैं. जब कांग्रेस की सरकार थी तब वे इसे बना नहीं सकते थे क्योंकि रिलीज नहीं होने दिया जाता. अब मोदी की सरकार है तो उन्हें कोई दिक्कत नहीं क्योंकि वे वैसे भी उनके खेमे के हैं. सरकार के विरोध में साहित्यकारों-कलाकारों ने अवॉर्ड वापस किए तो उसकी तोड़ करने के लिए अनुपम खेर भी दिल्ली में इनके खिलाफ प्रोटेस्ट करने गए थे जिसमें लोग तो नहीं आए लेकिन टोटका हुआ. उनके और अशोक पंडित के साथ मधुर भी खुले तौर पर थे.
तो सही समय देखकर मधुर ने अपनी फिल्म इंदू सरकार की घोषणा कर दी है. दिसंबर के पहले हफ्ते से वे इसकी शूटिंग शुरू कर रहे हैं. दिल्ली, मुंबई, पुणे की लोकेशंस पर. फिल्म के नाम से ही जाहिर है कि ये इंदिरा गांधी की सरकार और 1975-77 में लगाई 21 महीने की इमरजेंसी के बारे में होने वाली है. उन्होंने बहुत चतुराई से नामकरण किया है. फिल्म की स्क्रिप्ट के लिए पत्रकार विनोद मेहता की किताब 'द संजय स्टोरी' (2012) का सहारा लिया गया है.
इसके अलावा वे बीजेपी नेता सुब्रमण्यन स्वामी से भी मिले हैं और उनसे फिल्म के कंटेंट के लिए मदद ली है.
अब तक इसमें तीन एक्टर्स को तय किया जा चुका है. नील नितिन मुकेश इसमें संजय गांधी का रोल करेंगे. वे मधुर की 2008 में रिलीज हुई फिल्म जेल में काम कर चुके हैं. कीर्ति कुलहरी को भी लीड रोल में लिया गया है. वे हाल ही में 'पिंक' फिल्म में बहुत सराही गई थीं. बंगाली एक्टर टोटा रॉय चौधरी भी कास्ट हो चुके हैं. उन्होंने चोखेर बाली (2003), कहानी-2 (2016) और तीन (2016) जैसी फिल्में की हैं. अनु मलिक और बप्पी लाहिरी फिल्म का म्यूजिक कंपोज करेंगे.
अगले साल के मध्य में इसे रिलीज कर दिया जाएगा.
अमेरिका जैसे देशों में सत्तासीन राष्ट्रपति पर ऐसी फिल्म बनाना संभव है जहां उसे मरा दिखाया हो. या जहां उसे करप्ट दिखाया गया हो. जहां सिटीज़नफोर (2014) जैसी डॉक्यूमेंट्री प्रदर्शित करना और उसे ऑस्कर से सम्मानित किया जाना संभव है जो ऐसे आदमी पर आधारित है जो मुल्क का भगौड़ा है और जिसने विश्व सभ्यता के सबसे बड़े सूचना खुलासों में से एक अंजाम दिया.
इंडिया में अभी ऐसा नहीं है.
यहां कई विमर्श जारी हैं. सबसे अस्पृश्य है पोलिटिकल लोगों पर फिल्में. अप्रत्यक्ष रेफरेंस और मिलते-जुलते किरदारों वाली फिल्मों को हम इनमें नहीं गिन रहे. यहां तो उड़ता पंजाब जैसी फिल्मों पर दर्जनों कट सेंसर बोर्ड लगा देता है क्योंकि उसमें आलोचना के घेरे में संबंधित राज्य की मौजूदा सरकार की नीतियां भी आती हैं.
हालांकि मधुर भी बीजेपी समर्थक फिल्ममेकर हैं लेकिन वे आपातकाल और संजय गांधी जैसे नेताओं पर फिल्म बना रहे हैं तो ये अच्छी बात है. अगर इसी बहाने मुंबई का सिनेमा पोलिटिकल हस्तियों के कृत्यों को फिल्मों में ज्यादा स्पष्ट रूप से रख सके तो ये व्यवस्था अच्छी है कि जब जिस पार्टी की सरकार उतर जाए तो उसके नेताओं पर फिल्म बना दी जाए. फिर सत्तारूढ़ दल की सरकार न रहे तो कोई और डायरेक्टर उसके नेताओं पर फिल्में बना दें.

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