पढ़ाई के साथ चवन्नी जोड़ने के चक्कर में नौकरी कर ली थी. दिन में सिर्फ 12 दिन कामकिया और नाइट शिफ्ट में डेढ़ साल. नाइट लगवाने के दो महीने बाद हमारे साथ नया लड़काआया. नाम था आरिफ. शक्लो सूरत से बहुत खूबसूरत नहीं था लेकिन इतना बुरा भी नहीं किमुंह बिचकाया जाए. नाइट में आने के दो तीन दिन तो बाकी साथियों से कुछ कटा कटा रहा.रात में 12 बजते तो सब लड़के टिफिन लेकर एक जगह जमा हो जाते. जितने ज्यादा लोग उतनेतरह का खाना. आरिफ सबसे अलग बैठता अपना बड़ा सा पांच खाने वाला टिफिन लेकर. उसेअकेले बैठे देख मुझे बड़ी उलझन होती. एक दिन वो बैठा ठूंस रहा था कि हम पहुंचे उसकेपास. उसके खुले हुए डिब्बे बटोर कर लाया अपने गैंग में सजा दिया. तब उसने हम लोगोंका साथ स्वीकार किया और ये रहस्य खोला. कि खाना बहुत अच्छा बनाता है. लो लो.. लौकीका कोफ्ता लाया हूं आज. सब लोग खाओ.लेकिन फिर पता चला कि उसके अलग बैठने की वजह भी अलग थी. उसका हंसना, बोलना, चलना सबअलग था. फिर एक दिन एक लड़का और आया संदीप नाम का. वह दोनों डे शिफ्ट से पक्केदोस्त थे. एक दूसरे के साथ चिपके रहने वाले. हमारे बॉस थे परवेज सिद्दीकी. उन दोनोंको साथ देख कर खीस निपोर देते थे. कभी कभी हद से ज्यादा चुटकी लेते तो दोनों कामुंह लाल हो जाता शर्म से. बॉस को ये गुमान था कि दुनिया देख रखी है. वह आरिफ औरसंदीप के रिश्ते को जान गए थे. लेकिन बुजुर्गी एक्सपीरिएंस के साथ संवेदना भी लाएये जरूरी नहीं. दूसरी बात उससे ज्यादा जड़ थी. परवेज मियां हंस भले देते थे लेकिनअंदर भरे बैठे थे.दोनों लड़कों ने प्लान किया कि नाइट शिफ्ट में चलते हैं. बॉस ने आरिफ को नाइट मेंभेजा लेकिन संदीप को टरका दिया. उसके काम में ऐसी कमी आई कि बॉस को खलने लगा.बुलाया और समझाया. जाओ बेट्टा नाइट शिफ्ट में लेकिन खयाल रहे. आरिफ से दूर रहना.उसकी मुराद पूरी हुई. याद रहे. उसे पता नहीं था कि वो संदीप से जो जुड़ाव महसूस कररहा है. वो कुछ अलग किस्म का है. वो उसे किसी और लड़के से नहीं महसूस होता. किसीलड़की से भी नहीं. लड़कियां तो बड़ी जल्दी दोस्त बन जाती हैं उसकी. क्यों, ये भीनहीं पता.संदीप के नाइट शिफ्ट में आने के बाद आरिफ का कलर बदल गया एकदम से. उसके काम औरबातों में उत्साह आ गया. हंसी लिटिल शाई वाली हो गई. कमर लचका कर चलता था. शरमानेकी कोशिश करता था. कंप्यूटर से बड़ा सा स्कैनर चिपका रहता था. रात भर. स्कैनर सेअसिस्टेंट आरिफ और आरिफ से संदीप चिपका रहता था. हम सब साथ काम करने वाले लगभग एकही उम्र के थे. जस्ट कॉलेज गोइंग. जबरदस्ती की कूलनेस से भरे हुए. एक दो रातों केबाद लौंडों ने उनका मजाक बनाना शुरू कर दिया.Source: Reutersछींटाकशी करते, मुंह फाड़ कर हंसते लड़कों को देख कर उन दोनों का मुंह लाल हो जाताथा. लेकिन ज्यादा दिन ये चलना नहीं था. आरिफ ने बम फोड़ दिया. वाटर कूलर के पास गयाथा पानी लेने. वहां लवकेश पहले से टोंटी में बॉटल घुसाए था. इसके पहुंचते ही कहनेलगा "क्यों बे, संदीप के साथ सोना चाहता है क्या. उस टाइप से?" आखिरी शब्द जिस तरहहवा में हाथ नचा कर कहे उसने. आरिफ एकदम भन्ना गया. हाथ पकड़ के मरोड़ा तो बच्चाबिलबिला गए. गुस्से में बोला "हां साले. सोना चाहता हूं. सोऊंगा. तुझे प्रॉब्लम?मैं लव करता है उसको." फिर लवकेश हाथ छुड़ा कर वहां से भागा.इस लव से लवकेश का भोंपू खुल गया. उसने अपने झगड़े को सनसनाती खबर बना कर फैलानाचाहा. लेकिन उसके गुब्बारे में से हवा लीक हो गई. जब उसे पता चला सबको इस बात काअंदाजा था. उम्मीद थी. बस सब उन दोनों के मुंह से सुनने को उतावले थे. आरिफ केस्वीकार कर लेने भर से मुश्किल आसान हो गई. मुश्किल कुछ नहीं थी. लेकिन न जानेक्यों आरिफ को अपने इमोशंस के लिए लड़ता देख अच्छा लगा. मुझे यकीन था उसे भी अच्छालगा होगा. जब उसे सब सवालिया नजरें अपने आप झुकती दिखी होंगी. फिर जब वो हमारे साथआया तो साथियों को धौल जमाते हुए बोला "सालों कामचोरी कल्लो खाली. मेरी तरह एक टाइमपर दो चीजें संभालनी पड़तीं तो पता चलता." सब जी खोल कर हंसे. उसके बाद हंसी ठिठोलीका ऐसा दौर चला जो कभी खत्म नहीं होने वाला था. संदीप थोड़ा नकचढ़ा था. जल्दीभिड़ने वाला. लेकिन आरिफ उसको मनाते रहता था. उस तरह जैसे कोई और नहीं कर पाता.उसके बाद करीब 14 महीने में वहां रहा. नाइट शिफ्ट में. उन दोनों के साथ. उनकेरिश्ते को समझता रहा. अपने ऑफिस में उनकी आसान होती जाती जिंदगी देखता रहा. दोनोंसाथ छुट्टी लेते थे. साथ रहते थे. साथ खाते-पीते. लोहे की रैक्स थीं बड़े से हॉलमें. उनकी लाइन के बीच में घुस जाते. वो क्या करते हैं ये देखने कोई नहीं जाता था.हम सबमें अनकहा समझौता हो गया था कि इनको डिस्टर्ब नहीं करना है. वहां जाते थेबहाने देकर आते थे थकान लेकर. हालत यहां तक आ गई थी कभी कभी आरिफ मुंह छिपाते हुएआता था. निशानों को छिपाते हुए. तब लौंडे संदीप से भिड़ जाते थे. "साले हरामी हवससंभाल के". सब जानते थे कि उनकी लाइफ यहां जितनी आसान है, बाहर उतनी ही मुश्किल.नया नया कैमरे वाला फोन लिया था मैंने. जिसमें दूसरी तस्वीर उस जोड़ी की थी. पहलीवो थी जो दुकान पर मोबाइल खरीदते वक्त कैमरा चेक करने के लिए खींची थी. वो तस्वीरमेरे पास है अब तक. फिर एक्जाम्स आ गए. मैंने जॉब छोड़ दी.फोन पर दोनों से बात होती रहती थी. एक महीने बाद पता लगा कि आरिफ सऊदी अरब चला गया.संदीप ने नंबर बदल लिया. मुझे पता नहीं फिर वो कहां गया.