राबड़ी देवी के इस 'बेहूदा' बयान ने RJD-JDU की खटास खोल दी
जो राजनीति में चपल हैं, वे बोलने में कुशल हैं. यहां शब्दों को बरतना होता है. बवालों को कुतरना होता है.
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फोटो - thelallantop
राबड़ी देवी भले ही बिहार की मुख्यमंत्री रही हों, लेकिन संभलकर बोलना उन्हें कभी नहीं आया. उनके एक ताज़ा बयान ने RJD-JDU के बीच वो खटास एक्सपोज कर दी है, जिसके बारे में अब तक दबे-छिपे बात हो रही थी.जो राजनीति में चपल हैं, वे बोलने में कुशल हैं. यहां शब्दों को बरतना होता है. बवालों को कुतरना होता है.
पटना के पुराने पक्षियों ने दिल्ली में अपने जोड़ीदारों को बताया था कि नीतीश कुमार के नोटबंदी को समर्थन से RJD चिढ़ी हुई है, लेकिन हालात इतने नहीं बिगड़े हैं कि सार्वजनिक तौर पर बयानबाज़ी की जाए.लेकिन राबड़ी देवी ने काम खराब कर दिया. दिल्ली के रिपोर्टरों को मसाला दे दिया. राबड़ी से जब मंगलवार को बीजेपी नेता सुशील मोदी और नीतीश कुमार के बीच घटती दूरियों के बारे में पूछा गया तो अपनी झल्लाहट छिपा नहीं पाईं और कह गईं, 'मोदी जी नीतीश कुमार को उठाकर ले जाएं और अपनी बहन से शादी करवा लें.' राबड़ी ने ये कहकर जाहिर कर दिया कि आरजेडी में अंदरखाने एक बेचैनी है. इससे उन लोगों को एक सिरा मिल गया है जो नोटबंदी को नीतीश और बीजेपी के संबंधों में प्रस्थान बिंदु की तरह देख रहे थे. राबड़ी देवी ने ये बात बिहार विधानसभा के बाहर कही. सुशील मोदी से जब इस बारे में पूछा गया तो वो खुद से ज्यादा, नीतीश के लिए नाराज दिखे. उन्होंने कहा, 'राबड़ी देवी का बयान न सिर्फ भद्दा है, बल्कि यह मुख्यमंत्री के चरित्र हनन की कोशिश है. वो पहले भी नीतीश कुमार और मंत्री राजीव रंजन उर्फ ललन सिंह के रिश्तों पर ओछी टिप्पणी कर चुकी हैं. अब ललन सिंह को बताना चाहिए कि क्या उन्हें राबड़ी देवी के खिलाफ मानहानि का केस वापस लेना चाहिए था.' ललन सिंह वाला मामला 2009 का है. जब RJD और JDU अलग-अलग पाले में थे और नीतीश कुमार पर अटैक करते हुए राबड़ी यहां तक कह गई थीं, 'ललन सिंह कौन है? वो नीतीश कुमार का साला है. सब जानते है. मैं सबके सामने कह रही हूं. इसीलिए नीतीश कुमार चाहे मीटिंग में जाएं, चाहे रैली में, ललन सिंह का हाथ पकड़े रहते हैं.' 'इंडियन एक्सप्रेस' की खबर के मुताबिक, बहुत सारे RJD नेताओं ने राबड़ी के ताजा बयान पर मिट्टी डालने की कोशिश की, लेकिन सूत्र बता रहे हैं कि दोनों घटक दलों में नोटबंदी के बाद खटास की खबर सही है. आरजेडी ने नोट बैन का विरोध किया था, लेकिन नीतीश के समर्थन के बाद उसे अपने विरोधी स्वर मंद करने पड़े. पटना में हुए प्रदर्शन में न लालू पहुंचे और न उनके दोनों पुत्र. कांग्रेस नेताओं को छुटभैये आरजेडी नेताओं के साथ प्रदर्शन करना पड़ा.
डिप्टी सीएम तेजस्वी यादव ने अपनी मां की टिप्पणी पर कोई कमेंट करने से मना कर दिया. लेकिन इंडियन एक्सप्रेस ने बिना नाम लिए एक आरजेडी नेता का बयान छापा है, 'ये राबड़ी देवी के मुंह से अचानक निकल गई बात लगती है, लेकिन इसमें आप नीतीश और आरजेडी के उतार-चढ़ाव वाले रिश्तों का अक्स देख सकते हैं.'RJD के राष्ट्रीय प्रवक्ता मनोज कुमार झा ने अखबार से कहा, 'इस मुश्किल समय में जब तीखी पॉलिटिकल बैरिकेडिंग की वजह से राजनीति में लोक हास्य की जगह नहीं बची है, हम लोगों से अपील करते हैं कि वे नीतीश कुमार, लालू प्रसाद और सुशील मोदी के पुराने दिन याद करें, जब वो जेपी आंदोलन में साथ थे. ये सब जानते हैं कि सुशील मोदी और राबड़ी देवी एक दूसरे को देवर-भाभी मानते हैं. इसलिए इसका ज्यादा अर्थ निकाले बिना मामले को विराम देना चाहिए.' लेकिन बात तो अभी निकली है. दूर तलक जाएगी?
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