लल्लनटॉप शो: डॉ. आम्बेडकर का असली मकसद समझने के लिए इन बातों को समझ लें
डॉ भीमराव रामजी आंबेडकर, जिन्हें प्यार से बाबा साहब भी कहा जाता है. एक नामी स्कॉलर, नौकरशाह, क़ानूनविद, समाज सुधारक और राजनेता - जिन्होंने आज़ाद भारत के संविधान के निर्माण में बेहद महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. और ये करते हुए वो किसी धारा के बंधक नहीं हुए.

“शिक्षा हर व्यक्ति का जन्मसिद्ध अधिकार है और इस हक़ से उसे कभी भी वंचित नहीं किया जा सकता. शिक्षा इंसान को निडर बनाती है, एकता सिखाती है, उसे अधिकार का मतलब समझाती है और अधिकरा और स्वतंत्रता के लिए संघर्ष करना सिखाती है.”
ये कहा था डॉ भीमराव आम्बेडकर ने. भारतीय संविधान के जनकपुरुष आम्बेडकर. आज, 14 अप्रैल है. यानी आम्बेडकर जयंती. आप सभी को बधाई. डॉ भीमराव रामजी आंबेडकर, जिन्हें प्यार से बाबा साहब भी कहा जाता है. एक नामी स्कॉलर, नौकरशाह, क़ानूनविद, समाज सुधारक और राजनेता - जिन्होंने आज़ाद भारत के संविधान के निर्माण में बेहद महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. और ये करते हुए वो किसी धारा के बंधक नहीं हुए. उन्होंने एक अलहदा और स्पष्ट लकीर खींची. लेकिन लक़ीर खींच दी जाए, और वैसी की वैसी मान ली जाए, तो क्या बात होती? आम्बेडकर के समानता और प्रतिनिधित्व के मूल्य संविधान में निहित हैं. फिर भी संविधान समाज में कितना है, इसके अप्रत्यक्ष और कभी-कभी प्रत्यक्ष सबूत आपको और हमें समय-समय पर मिलते रहते हैं.
उच्च शिक्षा में भेद-भाव क्यों हो रहा है?'दलित दूल्हे को बारात में घोड़ी पर चढ़ने से रोका'
'दलित दूल्हा घोड़ी चढ़ा तो हुआ बवाल'
'कथित ऊंची जाति के लोगों के सामने से बारात गई तो हुआ पथराव'
इस तरह की कुछ खबरें रूटीन होती हैं. मतलब हर कुछ दिनों में वो हमारे सामने आ ही जाती हैं. नए नाम, नई जगह के साथ. 12 अप्रैल को मध्य प्रदेश में मंदसौर के गरोठ थाना इलाके से भी इसी तरह की खबर आई. इस दिन अर्जुन मेघवाल की शादी थी. अर्जुन बीएसएफ के जवान हैं. BSF... यानी बॉर्डर सिक्योरिटी फोर्स. जिसके जवान सरहदों पर देश की रखवाली करते हैं.
12 तारीख को अर्जुन की बारात निकली. उसी वक्त वहां से एक और बारात निकली जो कि दूसरे समुदाय की थी. आज तक से जुड़े आकाश चौहान की रिपोर्ट के मुताबिक दोनों बारात एक ही रास्ते से निकाले जाने के कारण दोनों पक्ष के बीच टकराव हो गया. इसका नतीजा ये हुआ कि दूसरे पक्ष ने दलित समुदाय से आने वाले अर्जुन मेघवाल की बारात रुकवा दी. विवाद की जानकारी पाकर जब पुलिस मौके पर पहुंची तो उन पर भी पथराव किया गया. जिसके बाद पुलिस ने पीड़ित पक्ष की शिकायत पर 29 लोगों के खिलाफ बलवा, मारपीट और एससी एसटी एक्ट की धाराओं में मामला दर्ज किया है.
एसपी मंदसौर के बयान से साफ है कि अगर पुलिस हालात को ना संभाल पाती तो विवाद काफी बड़ा हो सकता था. ख़ैर अर्जुन मेघवाल की बारात कल यानी 13 अप्रैल को पुलिस की मौजूदगी में निकाली गई.
मध्य प्रदेश से अब राजस्थान चलते हैं. 12 अप्रैल को बाड़मेर जिले के आसाडी गांव में एक दलित शख्स कोजाराम मेघवाल की निर्ममता से हत्या कर दी गई. आरोप गांव के कुछ दबंग किस्म के व्यक्तियों पर लगा. आज तक के दिनेश बोहरा के मुताबिक 15 मार्च को कोजाराम ने एसपी के सामने जान के खतरे का अंदेशा जताया था. आरोप लग रहे हैं कि पुलिस ने समय रहते कार्रवाई नहीं की जिसकी वजह से कोजाराम को जान से मार दिया गया. अब इस हत्या को लेकर राजस्थान के कई हिस्सों में गहलोत सरकार के खिलाफ प्रदर्शन हो रहे हैं.
ये घटनाएं अभी जो हमने आपको बताईं ये बीते दो-चार दिन की घटनाएं हैं. जिनकी जानकारी हम तक पहुंची है और हम आप तक पहुंचा रहे हैं. लेकिन हम सब जानते हैं कि वंचित तबके के साथ भेदभाव और शोषण के ऐसे मामलों की संख्या गिनती में बहुत बड़ी है जो कभी कहीं रिपोर्ट ही नहीं पाती. जो रिपोर्ट होती हैं एक नजर उन पर भी डाल लेते हैं.
अपराध के आंकड़े इकट्ठा करने वाली सरकारी संस्था NCRB के आंकड़ों के मुताबिक साल 2018 में कुल 42 हजार 793 मामले अनुसूचित जाति के लोगों के साथ अपराध के दर्ज किए गए. इसी तरह 2019 में 45 हजार 961 मामले, 2020 में 50 हजार291 मामले, और 2021 में 50 हजार 900 मामले दर्ज किए गए.
ST यानी अनुसूचित जनजाति समुदाय के लोगों के साथ हुए अपराधों की बात करें तो
2018 में 6,528 मामले,
2019 में 7,570 मामले,
2020 में 8,272 मामले और
2021 में 8,802 मामले दर्ज किए गए.
एक आंकड़ा देश के प्रीमियम हायर एजुकेशनल इंस्टीट्यूट्स से भी आया है. राज्य सभा में पूछे गए एक सवाल के जवाब में केंद्र सरकार ने 29 मार्च 2023 को बताया,
पिछले 5 सालों (2018-2023) में केंद्रीय विश्वविद्यालयों से OBC, SC और ST समुदाय से आने वाले कुल 14 हजार 446 छात्रों ने ड्रॉप आउट किया. इसमें OBC के 6901, SC कैटेगरी के 3596 और ST कैटेगरी के 3949 छात्र शामिल हैं. ड्रॉप आउट मतलब एडमिशन लेने के बाद अपना नाम वापस ले लेना या पढ़ाई छोड़ देना. इसी तरह भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान यानी IIT से 4,444 छात्रों ने ड्रॉप आउट किया. इसमें OBC के 2544, एससी कैटेगरी के 1362 और एसटी कैटेगरी के 538 छात्र शामिल हैं.
सरकारी आंकड़ों के मुताबिक भारतीय प्रबंधन संस्साथन यानी IIM से पिछले 5 साल में 366 छात्रों ने ड्रॉप आउट किया. इसमें 133 OBC, 143 SC और 90 एसटी कैटेगरी के छात्र शामिल हैं.
ड्रॉप आउट के ये आंकड़े देते हुए सरकार ने ये भी कहा कि कई बार छात्र अपनी पसंद के विषय, स्ट्रीम या शहर/संस्थान में जाने का विकल्प न मिलने की वजह से अपना नामांकन वापस ले लेते हैं. सरकार वंचित समुदाय के छात्रों के लिए कई तरह के स्कॉलरशिप और स्कीम चला रही है. सरकार की बात सही हो सकती है लेकिन हायर एजुकेशनल कैंपसेज में होने वाले भेदभावों से इनकार नहीं किया जा सकता. जहां से समय-समय पर छात्रों के साथ भेदभाव की खबरें आती रहती हैं. अभी बीते 12 फरवरी को IIT बॉम्बे में पढ़ने वाले 18 साल के दर्शन सोलंकी ने सुसाइड कर लिया था. बाद में पता चला कि साथी छात्रों के हैरेसमेंट से तंग आकर दर्शन ने ये कदम उठाया था. इस बात का ज़िक स्वयं भारत के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ ने भी अपने संबोधन में किया था. फरवरी में ही हैदराबाद के मेडिकल कॉलेज में पीजी स्टूडेंट डॉ. प्रीति ने भी सुसाइड कर लिया था. इसके पीछे भी वजह रैगिंग और हैरेसमेंट बताई गई. दर्शन और प्रीति का केस अपवाद भर नहीं है. पीछे मुड़कर देखें तो ना जाने कितने ही ऐसे नाम हमें दिखाई देते हैं. 27 मार्च 2023 को लोकसभा में पूछे गए एक सवाल के जवाब में केंद्र सरकार ने बताया था कि पिछले 5 सालों में IIT में कुल 33 छात्रों ने सुसाइड किया. जिसमें से 16 छात्र रिजर्व कैटेगरी से आते थे. इसी तरह NIT से सुसाइड के 24 मामले सामने आए. जिसमें से 14 छात्र रिजर्व कैटेगरी से थे.
पानी के लिए मुसलमान बनना पड़ाये हमने आपको दो घटनाएं बताईं. एक्सपर्ट्स मुद्दे पर क्या सोचते हैं, वो भी बताया. लल्लनटॉप ने कई बार आम्बेडकर के विचारों और जीवन के कई पहलुओं को कवर किया है. कभी हमारे ऐतिहासिक घटनाओं से जुड़े शो तारीख़ में. कभी किताबों से जुड़े हमारे रोज़ाना शो किताबी बातें में और कभी तो आपको दी लल्लनटॉप शो में भी. लेकिन आज आपको वो चुनिंदा बातें बताएंगे, जिससे आम्बेडकर आम्बेडकर बने.
पहले प्रसंग के लिए हमने अपने शो तारीख़ से ही एक क़िस्सा चुना है, जो 6 दिसंबर 2022 को प्रकाशित हुआ था. क्या है क़िस्सा?
कहानी 1901 की है. नौ साल के भीमराव अपनी एक्सटेंडेड फ़ैमिली के साथ सतारा में रहते थे. मां की मृत्यु हो चुकी थी और पिता फौज से रिटायर हो चुके थे. रिटायरमेंट के बाद कोरेगांव में ख़जांची की नौकरी करते थे. गर्मियों की छुट्टी में उन्होंने भीमराव और उनके भाई-बहनों को अपने पास कोरेगांव बुलाया. सब लोग ट्रेन से मसूर गए. जो कोरेगांव का सबसे नज़दीकी स्टेशन था. पिता ने लिखा था कि वो स्टेशन पर चपरासी को भेज देंगे, लेकिन घंटे भर स्टेशन पर खड़े रहने के बावजूद आंबेडकर और उनके भाई-बहन को रिसीव करने कोई स्टेशन पर आया नहीं. स्टेशन मास्टर ने बच्चों को देखा तो पूछा, 'सब चले गए, तुम लोग यहां क्यों खड़े हो'. भीमराव ने बताया कि उन्हें कोरेगांव जाना है और वो अपने पिता या उनके चपरासी का इंतज़ार कर रहे हैं. कुछ देर बाद स्टेशन मास्टर ने पूछा, 'तुम कौन हो?' आंबेडकर ने जवाब दिया
हम महार जाति के हैं'. ये सुनते ही स्टेशन मास्टर के चेहरे के हाव भाव बदल गए और वो अपने कमरे की ओर लौट गया.
मास्टर चला गया, मगर भीमराव और उनके भाई-बहन तो अब भी परेशान ही थे. स्टेशन के पास ही कुछ बैलगाड़ी वाले खड़े थे. लेकिन कोई भी अछूत को ले जाने को तैयार नहीं था. आंबेडकर दोगुने पैसे देने को भी तैयार थे, लेकिन तब भी कोई राज़ी न हुआ. इसके बाद स्टेशन मास्टर ने ही एक युक्ति निकाली. उसने भीमराव से पूछा, 'क्या तुम बैलगाड़ी चला सकते हो?' आंबेडकर ने कहा, 'हां'.
फिर स्टेशन मास्टर ने एक गाड़ी वाले से कहा कि वो दोगुने पैसे ले ले और उसे बैलगाड़ी भी नहीं चलानी. बस साथ-साथ चलता रहे. वो मान गया. भीमराव और उनके भाई बहन गाड़ी में बैठ गए. गाड़ी अपने रास्ते चलने लगी. और चलते-चलते रात हो गयी. सबके पास टिफन था, लेकिन पीने के लिए पानी नहीं था. कुछ देर बाद उन्हें एक चुंगी वाले की झोपड़ी दिखाई दी. आंबेडकर ने सोचा कि उससे पानी मांगा जाए. आंबेडकर पानी लेने जा ही रहे थे कि बैलगाड़ी वाले ने चेताया, 'चुंगी वाला हिन्दू है, वो महारों को पानी नहीं देगा'. फिर उसी ने हल भी निकाला. कहा, 'उसे बताना कि तुम मुसलमान हो. शायद पानी मिल जाए.'
आंबेडकर ने चुंगी वाले से पानी मांगा. चुंगी वाले ने सवाल पूछा, 'कौन हो?' आंबेडकर ने जवाब दिया, 'मुसलमान हैं'. आंबेडकर अच्छी-ख़ासी उर्दू बोल लेते थे, लेकिन चुंगी वाले को शक हो गया. उसने कहा, ‘तुम्हारे लिए यहां पानी नहीं है. दूर पहाड़ी पर है. वहां से ले आओ.’
अब तक बहुत रात हो चुकी थी. पहाड़ी पर जाना संभव नहीं था. इसलिए सबने बैलगाड़ी को खोलकर उसमें बिस्तर डाला और सब वहीं सो गए. इस वाक़िये को याद करते हुए डॉ आम्बेडकर अपनी जीवनी 'वेटिंग फ़ॉर वीज़ा' में लिखते हैं,
“मेरे दिमाग में चल रहा था कि हमारे पास काफ़ी खाना है. भूख के मारे हमारे पेट में चूहे दौड़ रहे हैं, लेकिन पानी के बिना हमें भूखे सोना पड़ रहा है और पानी इसलिए नहीं मिल सका क्योंकि हम अछूत हैं.”
9 साल के भीमराव पर इस वाक़िये का गहरा असर पड़ा. ऐसा नहीं था कि उन्हें पहली बार छुआछूत का सामना करना पड़ रहा था. स्कूल में वो बाक़ी बच्चों के साथ नहीं बैठ सकते थे. अकेले कोने में बैठना पड़ता था. वो अपने साथ एक बोरा लेकर आते थे, जिसे सफ़ाई करने वाला भी नहीं छूता था. घड़े से पानी नहीं पीने मिलता था, धोबी उनके कपड़े नहीं धुलता था, नाई बाल नहीं काटता था. लेकिन इस घटना ने उनके मन पर छाप छोड़ी, क्योंकि इससे पहले - बकौल आंबेडकर, 'अब तक मुझे लगता था कि छुआछूत एक सामान्य चीज़ है. कुछ लोग होते ही हैं, जिन्हें दूसरे लोग छूना नहीं चाहते."
जातिवाद के खिलाफ पहला सत्याग्रहदूसरी बड़ी घटना है महाड़ सत्याग्रह. गांधी ने नमक के हक़ के लिए डांडी मार्च किया था, और आम्बेडकर ने पानी के लिए. ब्रीफ़ में बैग्राउंडर बताते हैं. 1920 के दशक की बात है. तब की परिस्थितियों और जाति व्यवस्था में अछूत उन वॉटर बॉडीज़ का इस्तेमाल नहीं कर सकते थे, जिनका इस्तेमाल अगड़ी हिंदू जातियां करती थीं. अगस्त 1923 में बॉम्बे लेजिस्लेटिव काउंसिल ने एक प्रस्ताव पारित किया कि दलित समुदाय सरकारी वॉटर बॉडीज़ का इस्तेमाल कर सकती है. प्रस्ताव पारित हो गया और पूरे प्रांत में लागू भी हो गया, लेकिन कई अगड़ी जातियों ने इसका विरोध किया. ख़ासतौर पर बॉम्बे प्रांत के ही एक हिस्से महाड़ में. आंबेडकर तब दलितों की उभरती आवाज़ के रूप में देखे जाते थे. वो बड़े वकील तो थे ही. उनके पास रोज़ ढेरों लोगों के पत्र आते थे, जिनमें अछूतों पर होने वाले अत्याचार का ज़िक्र होता था. और एक दिन एक ऐसा ही पत्र उनके पास महाड़ से आया. लिखा था कि वहां अछूतों को चाबदार तालाब से पानी नहीं लेने दिया जाता. एक बार कुछ अछूतों ने वहां से पानी लेने की कोशिश की, तो उन्हें बहुत मारा गया. घर जला दिए गए, और परिवार वालों को जूतों से पीटा गया. आंबेडकर ने निश्चय किया कि वो महाड़ जाएंगे. 19 और 20 मार्च को डॉक्टर आंबेडकर ने कोलाबा में अछूतों की बैठक बुलाई. उसी रात बैठक में तय हुआ कि अगली सुबह से सत्याग्रह शुरू होगा.
20 मार्च की सुबह. डॉ आंबेडकर अपने ढाई हज़ार अनुयायियों के साथ तालाब पहुंचे. पहले ख़ुद अंजुली से पानी पिया. फिर उनके अनुयायियों ने. ये भारत में जातिवाद के खिलाफ पहला सत्याग्रह था. जैसा कि अपेक्षित था, इस घटना ने अगड़ी जातियों को काफ़ी नाराज़ किया. अफवाह फ़ैल गई कि अछूत कल वीरेश्वर मंदिर में जाने वाले हैं. जिसके बाद डॉक्टर आंबेडकर और उनके अनुयायियों पर हमला हुआ, जिसमें काफी लोगों चोट आई.
कुछ दिनों बाद सवर्णों ने तालाब की शुद्धि करवाई. तालाब का पानी निकाल कर पंचगव्य से भरे कुछ घड़े मंत्र पढ़ते हुए तालाब में उड़ेले गए. तब जाकर तालाब की शुद्धि मानकर पानी दुबारा प्रयोग हुआ.
डॉक्टर आंबेडकर का सत्याग्रह यहीं समाप्त नहीं हुआ. इसके नौ महीने बाद 24 दिसंबर 1927 को महाड़ में एक और सत्याग्रह की तैयारी हुई. लेकिन इससे पहले ही कुछ सवर्णों ने अदालत जाकर तालाब पर अपना दावा थोक दिया. आंबेडकर क़ानून का सम्मान करते थे. इसलिए अदालत का फैसला आने तक उन्होंने सत्याग्रह को टाल दिया. अदालत में मुकदमा 10 साल तक चला. 1937 को बम्बई हाईकोर्ट ने अछूतों के पक्ष में फैसला देते हुए उन्हें चाबदार तालाब से पानी लेने का हक़ सौंप दिया.
एक तरफ़ 9 साल के भीमराव हैं, अपने भाई-बहनों के लिए पानी मांगते हुए. फिर 26 साल बाद के आम्बेडकर हैं. अपनी जाति के पानी पीने का हक़ मांगते हुए. इस बीच आम्बेडकर के जीवन और विचार की यात्रा बहुत दिलचस्प है. इसमें एक स्कॉलर का नाम क़ाबिल-ए-ज़िक्र है. डॉ जॉन डूई. माना जाता है कि बाबासाहेब अंबेडकर का कहना थाकि वो अपने पूरे बौद्धिक जीवन का श्रेय प्रो जॉन डूई को देते हैं. जॉन डूई एक अमेरिकी दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक और शैक्षिक सुधारक थे. और उनके प्रैगमैटिज़्म या व्यवहारवाद का आम्बेडकर की सोच पर तगड़ी छाप थी. उनके बारे में तफ़्सील से बता पाना इस शो में मुमकिन नहीं है. लेकिन अगर आप पढ़ना चाहें, तो इंटरनेट पर आपको पर्याप्त जानकारी मिल जाएगी.
डॉ आंबेडकर ने अपने लंबे सार्वजनिक जीवन में ढेर सारे ऐसे काम किए, जिनपर लंबी बहस की जा सकती है. पक्ष और विपक्ष में तर्क दिये जा सकते हैं. डॉ आंबेडकर, महात्मा गांधी या फिर किसी भी दूसरे विचारक को आलोचना से परे कतई नहीं माना जा सकता. डॉ आंबेडकर की भी स्वस्थ आलोचना मौजूद है. लेकिन उन्हें ही कोट करें, तो उनके हिसाब से एक व्यक्ति के विकास के लिए तीन चीजों की आवश्यकता होती है- करुणा, समानता और स्वतंत्रता. हमारा मक़सद हैं कि आप इन विचारकों को पढ़ें, जानें, गुनें और समझने के जतन करें. अपनी सोच और उनके विचारों का एक संवाद करवाएं.
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