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मीरा जाटव 'लेडी डॉन' नहीं थी, रेप विक्टिम थी, मर गई

जिसे 'लेडी डॉन' बताया जा रहा है, वह BSP नेता महेंद्र कटियार के बेटे के खिलाफ रेप की शिकायत करने आई थी. केस दर्ज नहीं हुआ. 4 घंटे बाद मीरा को ही अरेस्ट कर लिया गया.

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10 मई 2016 (अपडेटेड: 11 मई 2016, 06:31 AM IST)
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मीरा जाटव. लेडी डॉन. मर गई. खबर हर तरफ चल रही है. पुलिस पकड़कर ले जा रही थी, बचने के लिए जीप से कूद गई. काफी चोट लगी और अस्पताल में इलाज के दौरान उसकी मौत हो गई. उसे सब 'लेडी डॉन' कह रहे हैं. डॉन शब्द से एक नेगेटिव इमेज बनती है. और हम सोचते हैं कि चलो कानून और इंसानियत का एक और दुश्मन कम हुआ. लेकिन इस कहानी का एक दूसरा पहलू है.

मीरा के गुनाह और गिरफ्तारी की कहानी

सोमवार सुबह 20 साल की दलित लड़की मीरा जाटव की मौत हो गई. फर्रुखाबाद के कमालगंज थाने की पुलिस ने 30 तारीख को अरेस्ट किया था. बताया गया कि उसके पास से आधा किलो चरस मिली थी. कमालगंज के SHO सालिगराम वर्मा ने 23 अप्रैल को तमंचा और कारतूस बरामद करते हुए दो और लोगों को जेल भेजा था. मीरा पर इल्जाम था कि उनको जेल से छोड़ने के लिए उसने पुलिस को फोन किया और धमकाया. पुलिस को मीरा की तलाश थी. जाल बिछाया गया. पता लगा कि सदरियापुर गांव आ रही है. वहीं उसे अरेस्ट कर लिया और चरस बरामद की. गुरसहायगंज और फतेहगढ़ में उसके खिलाफ लूट के चार और एक केस गैंग्स्टर एक्ट के तहत दर्ज है. जब पुलिस की जीप में मजिस्ट्रेट के सामने पेश होने मीरा को ले जाया जा रहा था. तो वह चलती जीप से कूद गई. उसे कानपुर के LLR हॉस्पिटल में भर्ती कराया गया. डॉक्टर्स ने उसे ब्रेनडेड घोषित कर दिया. जो खबर सबको पता चली वो थी "लेडी डॉन मीरा जाटव की मौत."  

मीरा हुई बड़ी साजिश की शिकार?

फर्रुखाबाद के कमालगंज में एक ईंट भट्ठा है. बीएसपी नेता महेंद्र कटियार इसके मालिक हैं. मीरा के पिता इसी भट्ठे पर काम करते थे. 'हिंदुस्तान टाइम्स' की खबर के मुताबिक मीरा ने महेंद्र के बेटे गुरदीप पर इल्जाम लगाए थे. कि उसने अपने एक साथी के साथ उसे किडनैप करके रेप किया था. एक दिसंबर 2014 को. दो दिन तक कैद में रखा और कई बार रेप किया. लेकिन मीरा वहां से निकल भागने में कामयाब रही. जान का खतरा होने की वजह से वह भागकर पहुंची कमालगंज थाने. आपबीती सुनाई तो पुलिस वालों ने कहा कि अपने बाप को बुलाकर लाओ, तब देखेंगे. गुरदीप के खिलाफ उन्होंने कोई केस नहीं किया. इसके चार घंटे बाद गुरदीप खुद पहुंच गया थाने. केस दर्ज कराया कि ये लड़की उसके घर से दो फोन, एक पिस्टल और पर्स चुराकर भागी है. पुलिस ने तड़ाक पड़ाक कानून का पालन शुरू कर दिया. FIR फाइल की. एक घंटे के अंदर मीरा को पकड़कर जेल भेज दिया.
मार्च में उसे बेल मिली. कुछ ही देर में फिर अरेस्ट हो गई. गुरदीप की शिकायत पर. पुलिस ने इस बार उस पर गैंगस्टर एक्ट के तहत मुकदमा किया था. और चूंकि महिलाओं पर यह एक्ट कम ही लगता है, इसलिए उसके साथ 'लेडी डॉन' का लेबल भी चिपका दिया. 

मीरा की तीसरी और चौथी गिरफ्तारी

14 जुलाई 2015 को लड़की ने कोर्ट का सहारा लिया. गुरदीप पर रेप का केस करने के लिए. मुकदमा हुआ तो. लेकिन खत्म भी हो गया जल्दी में. उसके बाद मीरा को तीसरी बार अरेस्ट किया गया. ब्लैकमेलिंग और धमकी के जुर्म में. फिर डरी सहमी मीरा ने सहारा लिया एक सोशल एक्टिविस्ट का. नाम था संजीबा. संजीबा की मदद से 29 अप्रैल को कानपुर में नीलाभजा चौधरी से मिली. नीलाभजा कानपुर DIG हैं. उनसे बताया कि "मुझे तीन बार जेल भेजा जा चुका है. इंसाफ के लिए लड़ रही हूं. प्लीज, इस केस की सही से जांच की जाए. गुरदीप के केस से पहले का मेरा कोई क्रिमिनल रिकॉर्ड नहीं है. सही से जांच की जाए. अगर मैं मुजरिम हूं तो मुझे सजा मिले. नहीं तो इंसाफ मिले."
इस मीटिंग के कुछ ही घंटों बाद पुलिस ने उसे चौथी बार अरेस्ट किया. और खबर आई कि उसके पास से 500 ग्राम चरस निकली है. उसे कस्टडी में भेज दिया. जहां उसे बुरी तरह टॉर्चर किया गया. जख्मी मीरा जाटव को आधी रात में मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया गया. इसके लिए उसे मजिस्ट्रेट के घर ले जाया गया. ताकि रिमांड बढ़ाई जा सके. लेकिन उसकी हालत इतनी खराब थी कि फिर जेल नहीं भेजा गया. उसे कानपुर के LLR हॉस्पिटल भेज दिया.
meera हालांकि पुलिस ने इंकार किया कि उसे यातनाएं दी गई हैं. वहां बताया गया कि वो चलती जीप से कूद गई थी. लेकिन उन्होंने ने ये नहीं बताया कि आधी रात को मजिस्ट्रेट के घर क्यों लेकर गए थे. दो दिन हॉस्पिटल में पड़ी रही. 4 मई को कोमा में चली गई. डॉक्टर्स ने उसे ब्रेन डेड घोषित कर दिया. उसके बाद तक मजिस्ट्रेट उसका बयान लेने नहीं पहुंचे. न्यूरोसर्जन गजेंद्र सिंह ने बताया कि उसके सिर में गहरी चोटें थीं. जिसकी वजह से उसकी मौत हुई है.

क्यों कोई उसकी तरफ से आगे नहीं आया?

वो एक लड़की थी, और दलित लड़की. अब तक तो इस पर कायदे से लोगों को रोड पर आ जाना था.  सभी चैनलों पर पैनल डिस्कशन होना था. दलित के घर खाना खाने वाले नेताओं को उसके मरने पर तुरंत उसके घर जाना था. बल्कि सबसे पहले तो मायावती की पार्टी बीएसपी को यह मुद्दा उठाना था. वो दलितों को उनका हक दिलाने का वादा करती हैं. लेकिन यहां उन्हीं के सिपहसालार महेंद्र कटियार के बेटे पर आरोप है. कटियार ने इस मामले पर कुछ भी बोलने से इंकार कर दिया. राहुल गांधी गांव-गांव जाकर दलितों की झोपड़ी में खाना खाते हैं. उनका हाथ आम आदमी के साथ है. उन्हें भी इस पर सोचने की फुरसत नहीं. बीते दिनों में बीजेपी का दलित-प्रेम भी जगा है. उन्हें भी फिक्र नहीं. और समाजवादी पार्टी की तो सरकार ही है. उन्हें तो अब तक मामला पकड़ लेना चाहिए था. और वे कहां हैं, राजनीति की बाईं धारा वाले लोग- जो रोहित वेमुला की लड़ाई लड़ रहे हैं. लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ. खबर चली और खत्म हो गई. क्योंकि उसके नाम के साथ 'लेडी डॉन' लगा था. उसके साथ खड़े होने में हाथ जलने का खतरा था. यहां लोग छाछ भी फूंक-फूंक कर पीते हैं.

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