किसानों के आंदोलन में जान देने वाले संत राम सिंह जी सिंगड़े वाले की पूरी कहानी जान लीजिए
हरियाणा के करनाल में इनका डेरा है, लाखों अनुयायी हैं.
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बाबा राम सिंह को संत राम सिंह जी सिंगड़े वाले के नाम से जाना जाता था. कुंडली बॉर्डर पर उन्होंने खुद को गोली मार ली. वह आंदोलन कर रहे किसानों का हालत देखकर दुखी थे.
किसान आंदोलन का 21वां दिन. दिल्ली के सिंघु बॉर्डर पर किसानों का धरना जारी था. शाम होते-होते एक खबर आई. बाबा संत राम सिंह की आत्महत्या की खबर. उनका सुसाइड नोट सामने आया. इसमें उन्होंने लिखा था कि वह किसानों की हालत देखकर दुखी हैं. सरकार न्याय नहीं कर रही है. बाबा राम सिंह को संत राम सिंह जी सिंगड़े वाले के नाम से जाना जाता था.बाबा राम सिंह ने कुंडली बॉर्डर, जो कि सिंघू बॉर्डर के करीब है, वहां खुद को गोली मारी. उन्हें पानीपत के पार्क अस्पताल ले जाया गया, लेकिन जान नहीं बचाई जा सकी. अंतिम समय में उनके साथ रहे कमरजीत सिंह ने 'पंजाब तक' को बातचीत में बताया,
किसान आंदोलन शुरू होने के बाद वो (संत राम सिंह) हर दिन इसका अपडेट लेते थे. 9 दिसंबर को वह आंदोलन वाली जगह पर गए. किसानों की हालत देखी. किसान ट्रॉलियों में पड़े हुए थे. उन्होंने पांच लाख रुपए स्टेज पर दिए. 15 को भी हम वहां गए थे. 500 कंबल देने के लिए. वह लंगर वाली जगह पर बैठे, प्रवचन दिया. उसमें भी उन्होंने यही कहा कि वो बहुत दुखी हैं. सरकार को ऐसे मामलों को जल्द समेट लेना चाहिए. ठंड का समय है. 12 बजे के करीब हम टिकरी बॉर्डर पर गए. वहां पर उन्होंने हरियाणा के किसानों, लोगों और बच्चों से बातचीत की.कमरजीत सिंह ने आगे बताया,
16 दिसंबर को 11 बजे के करीब मेरे पास फोन आया. उस समय बाबा करनाल में थे. उन्होंने कहा कि मैं दिल्ली जा रहा हूं. परसों रात ही उन्होंने संकल्प लिया कि उन्हें स्टेज पर पाठ करना है, लेकिन टाइम निकल गया. फिर उन्होंने कहा कि सुबह कर लेंगे. उन्होंने अपने दो साथियों को पाठ करने के लिए भेजा. इस दौरान वह गाड़ी में थे. मैंने स्टेज वालों के सामने नाम लगवाया कि बाबा जी पाठ करेंगे. स्टेज वालों ने इसकी घोषणा कर दी. फिर हम पांच-सात लोग उन्हें बुलाने के लिए गाड़ी में गए. और देखा कि...
बचपन में ही घर छोड़ दिया था
हरियाणा का करनाल जिला. यहां एक गांव है. नाम है सिंगड़ा. बाबा का डेरा इसी गांव में है, जहां वह रहते थे. सिंगड़ा के गुरुद्वारे में सेवादार रहे महल सिंह के मुताबिक, बाबा राम सिंह जब 21 दिन के थे तो इनके मां-बाप ने गुरुद्वारे में ही उनका दान दे दिया था. उन्होंने सत्संग के जरिए पूरे समाज की सेवा की.उनके बारे में करनाल के कुछ लोगों ने बताया कि बचपन में ही उन्होंने अपना घर-बार छोड़ दिया था. 40 साल पहले वह पंजाब से सिंगड़ा गांव आए थे. 90 के दशक में. और यहीं के हो लिए. वह नानकसर संप्रदाय से जुड़े हुए थे. नानकसर संप्रदाय में संत बाबा राम सिंह का बहुत ऊंचा स्थान माना जाता है. दुनिया में हर जगह उन्होंने गुरमत का प्रचार किया. हर तरह की आपदा और संकट में वह बढ़चढ़ कर हिस्सा लेते थे.
उनके बारे में करनाल के व्यक्ति ने फोन पर बताया कि तीन साल तक बाबाजी की जुबान बंद रही. साल 2016 से 2019 तक. उनके वोकल में दिक्कत आ गई थी. लेकिन धीरे-धीरे उसमें सुधार हुआ. और फिर से उन्होंने पाठ करना और प्रवचन शुरू किया था. हालांकि इस बात की पुष्टी नहीं हो पाई है. बाबा के गुरुद्वारे में साल में दो बार बड़ा समागम होता था. देश विदेश से लोग आते थे.
हरियाणा के सिंगड़ा गांव में बाबा का डेरा जहां वह रहते थे.अंतिम समय में बाबा के साथ रहे कमरजीत सिंह ने बताया कि पूरी दुनिया में बाबा के फोलोवर्स हैं. ज्यादातर वो बाहर रहते थे. लेकिन कोविड के टाइम वह कहीं नहीं गए. वह खुद खेती किसानी से जुड़े थे. निसिंग और जुंडला समेत आसपास के एरिया में होने वाले किसान आंदोलन में भी शामिल होते थे.
सिंघड़ा गांव के सरपंच नवदीप सिंह ने भी मीडिया को बताया कि बाबा राम सिंह के बड़ी संख्या में समर्थक थे, और वो गुरुद्वारे में ही रहते थे. वे लगातार दिल्ली-हरियाणा के बॉर्डर पर धरने के लिए जा रहे थे. किसानों के इस संघर्ष को लेकर काफ़ी दुखी थे. सिंगड़ा के गुरुद्वारे में सेवादार रहे महल सिंह ने मौत की साजिश से इंकार किया है. उन्होंने कहा कि ऐसा कुछ नहीं है, ये एक कुर्बानी है. बाबा ने अपनी चिट्ठी में पीड़ा बता दी है. उनके डेरे में उनके शव को अंतिम संस्कार के लिए रखा गया है. 18 दिसंबर को उनका अंतिम संस्कार होगा.

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