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  • Kerala: Dalit priest Biju Narayanan is in hospital after being stabbed at his home

केरल के पहले दलित पुजारी पर साल में दूसरी बार जानलेवा हमला हुआ है

वैदिक क्लास चलाने पर हो चुका है एसिड अटैक.

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27 सितंबर 2017 (अपडेटेड: 27 सितंबर 2017, 12:32 PM IST)
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बीजू केरल के वेट्टाकोरुमकन मंदिर में पुजारी भी हैं.
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केरल में 23 सितंबर को मलयालम फिल्मों के सुपरस्टार और राज्यसभा एमपी सुरेश गोपी ने अगले जन्म में फिर ब्राह्मण पैदा होने की इच्छा जताई थी. ताकि वो सबरीमाला मंदिर में पुजारी बन सकें. सही ही सोच रहे हैं. ये मैं इसलिए कह रहा हूं क्योंकि दलित होना इतना आसान नहीं है. फिर दलित होकर पुजारी बनना तो नामुमकिन ही समझिए. जाति व्यवस्था ने कुछ इसी तरह का दलदल बनाया है लेकिन इसी नामुमकिन को मुमकिन किया बीजू नारायणन ने. बीजू को देश का पहला दलित पुजारी बताया जाता है. उन पर एक साल में दो बार जानलेवा हमला हो चुका है. दूसरा हमला आज यानी 27 सितंबर को ही हुआ है. घर में घुसकर मारा अज्ञात लोगों ने और अपनी घटिया सोच ज़ाहिर की है. फिलहाल बीजू अस्पताल में भर्ती हैं. उन्हें गंभीर चोटें आई हैं.
जून में नारायणन पर एसिड अटैक किया गया था.
जून में नारायणन पर एसिड अटैक किया गया था.

बीजू पर इससे पहले एक हमला इसी साल जून में हुआ था. उन पर किसी ने एसिड फेंक दिया था. वो तब मंदिर जा रहे थे. शरीर का करीब 18% हिस्सा जल गया था. खुन्नस बीजू की वैदिक क्लास से थी, जिसमें वो बच्चों को वेद पढ़ाते थे. उन्हें क्लास बंद करने के लिए कई बार धमकाया भी जा चुका था.
बीजू को कुछ दिन पहले भी धमकी मिली थी. इसलिए क्योंकि वो एक महायज्ञ की तैयारी कर रहे थे. दलित पुजारियों के साथ महायज्ञ. ये बात शायद कुछ लोगों को नागवार गुजरी. क्योंकि कुछ लोग मानते हैं कि पूजा-पाठ-यज्ञ करना या कराना किसी ख़ास जाति की बपौती है.

बीजू पहले दलित हैं, जिन्होंने तंत्र विद्या की पढ़ाई की

केरल का एक शहर है पलक्कड़. यहां एक जगह विलायूर है, जहां के वेट्टाकोरुमकन मंदिर में बीजू नारायणन पुजारी भी हैं. वेट्टाकोरुमकन को भगवान शिव का पुत्र माना जाता है. भगवान शिव ने अर्जुन को पाशुपतास्त्र नाम का एक हथियार देने के लिए शिकारी का रूप धरा था. उनके साथ देवी पार्वती भी थीं. कहते हैं इसी दौरान वेट्टाकोरुमकन का जन्म हुआ था.
केरल में पहाड़ियों के बीच है सबरीमाला मंदिर.
केरल में पहाड़ियों के बीच है सबरीमाला मंदिर.

बीजू पहले दलित हैं, जिन्होंने त्रावणकोर देवस्वोम बोर्ड में होने वाली तांत्रिक की पढ़ाई के लिए क्वॉलिफाई किया. उन्होंने यहीं चारों वेदों का अध्ययन किया, जिसके बाद ही वो पुजारी बन सके. त्रावणकोर देवस्वोम बोर्ड ही वो संस्था है, जो केरल के सभी 1248 मंदिरों की देखरेख करती है. केरल का मशहूर सबरीमाला मंदिर का प्रशासन भी यही संस्था संभालती है.

केरल में मंदिर प्रवेश का रहा है लंबा इतिहास

आजादी से पहले 1924–25 की बात है. मंदिरों में केवल सवर्णों को ही जाने की छूट थी. अवर्णों यानि 'निचली' जाति के लोगों को मंदिर के पास की सड़कों पर चलने तक की अनुमति नहीं थी. इसके खिलाफ केरल में एक आंदोलन चला. नाम था वायकोम सत्याग्रह. वायकोम नाम इसलिए क्योंकि त्रावणकोर के वायकोम नाम के गांव से ही ये आंदोलन शुरू हुआ. गांव के एक मंदिर में 30 मार्च, 1924 को केरल कांग्रेसियों के एक दल ने, जिसमें सवर्ण और अवर्ण दोनों थे, मंदिर में प्रवेश किया. इस कदम को काफी समर्थन मिला. हालांकि बाद में इन लोगों को गिरफ्तार भी कर लिया गया. इनके समर्थन में फिर पूरे देश से स्वयंसेवक वायकोम पहुंचने लगे.
गांधीजी ने भी दिया था आंदोलन को समर्थन.
गांधीजी ने भी दिया था आंदोलन को समर्थन.

महात्मा गांधी भी इसके समर्थन में वायकोम पहुंचे. गांधीजी ने यहां की महारानी से मुलाकात की. नतीजा ये निकला कि मंदिर के पास की सड़कों पर चलने की अनुमति निचली जातियों को दे दी गई. आंदोलन यहीं नहीं खत्म हुआ. नतीजा ये निकला कि 1936 में हरिजनों और दलितों को मंदिर में प्रवेश की अनुमति भी दे दी गई.


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