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कर्फ्यू में कश्मीरी पंडित दोस्त के लिए राशन का बोरा लादकर निकलीं जुबेदा

बुरहान की मौत के बाद हिंसा में 30 लोगों की मौत हो चुकी है.

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12 जुलाई 2016 (अपडेटेड: 11 जुलाई 2016, 03:53 AM IST)
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फोटो - thelallantop
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मरने के बाद भी बुरहान वानी ने लोगों की नाक में दम कर रखा है. इसके मरने के बाद दो तरह के लोगों में झड़प हुई. एक वो जो इसके मरने का अफसोस मना रहे थे और दूसरे वो जो खुशी मना रहे थे. इसमें और 30 जिंदगियां चली गईं. झड़प दोबारा न हो, इसके लिए पिछले 4 दिनों से कश्मीर में कर्फ्यू लगा है. पुलिस गन ताने घूम रही है वहां की गलियों में. किसी के घर में राशन-पानी खत्म हो गया है तो किसी के घर में होने को है. और कुछ तो ऐसे हैं जो दो-तीन दिनों से भूखे हैं. और अन्न के दो दाने के लिए तरस रहे हैं. वो कहते है न कि बुरे वक्त में अपने ही अपनों के काम आते हैं. चाहे वो दोस्त-रिश्तेदार हों या सगे-संबंधी. जुबेदा बेगम इस कहावत की सही मिसाल हैं. जुबेदा बेगम और उनका परिवार कश्मीर में रहता है. जुबेदा के पास उनकी एक कश्मीरी पंडित दोस्त का फोन आया. उन्होंने उस फोन को अटैंड किया और लगीं बोरे में खाने का सामान भरने. सारा कुछ भरने के बाद बिना वक्त गंवाए वो निकल पड़ीं अपने शौहर के साथ श्रीनगर की गलियों में. उन गलियों में जहां कर्फ्यू लगा पड़ा है. जहां की गलियों में सिर्फ परिंदों के अलावा और कुछ नहीं दिख रहा.
जुबेदा को कोई शौक नहीं था कर्फ्यू लगी गलियों में मीलों चलने का. वो बस अपनी दोस्त की मदद करने के लिए इतना जोखिम ले रही थीं. 
दरअसल दीवानचंद और उनका परिवार झेलम नदी के उस पार जवाहरनगर में रहता है. उनको वहां रहते कई साल हो गए हैं. वो ऑल इंडिया रेडियो में काम करते हैं. और उनकी बीवी पास के लोकल स्कूल में टीचर हैं. जुबेदा भी उसी स्कूल में पढ़ाती हैं. दोनों की बहुत अच्छी दोस्ती है. बुरहान की मौत के बाद पूरे इलाके में कर्फ्यू लगा हुआ है. जिसके चलते लोगों को बहुत दिक्कत हो रही है. कर्फ्यू ने दीवानचंद को भी मुश्किल में डाल रखा है. घर में राशन का सामान नहीं, ऊपर से बीमार दादी. बच्चे भी भूख से बिलख रहे हैं. ऐसे में दीवानचंद की पत्नी ने जुबेदा को फोन कर दिया. घर के हालात बताए. और जरूरत को भी. जुबेदा ने कर्फ्यू का ख्याल नहीं किया. अपने पति के साथ निकल पड़ीं दोस्त और उसके परिवार की मदद करने. बोरे में चावल-दाल, और भी जरूरत के सामान पैक किए. कुछ मील के सफर के लिए पैदल निकल लीं दोस्त की मदद करने. जुबेदा कहती हैं, 'मुझे पता है कि ये मुश्किल है. पर हम कोशिश कर रहे हैं ताकि उनकी मदद कर सकें.'

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