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ये गोली कश्मीरियों की आंख में घुस जाती है, जिंदगी नरक हो जाती है

पैलेट गन से मारने पर जान नहीं जाती. पर आंख में पैलेट लगा तो आंख भी नहीं बचती.

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12 जुलाई 2016 (अपडेटेड: 12 जुलाई 2016, 11:29 AM IST)
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18 साल का मोहम्मद यासीन, कश्मीर के SMHS हॉस्पिटल के बेड पर पड़ा हुआ है. उसकी आंखों के सामने सफेद धुंध छा गई है. उसे नहीं पता कि अब वो दोबारा कभी देख पाएगा या नहीं. यासीन जैसे 92 केस अब तक रिपोर्ट हुए हैं.
श्रीनगर के जिस SMHS अस्पताल में यासीन का इलाज चल रहा है, वहां आई डिपार्टमेंट के सभी 72 बेड भरे हुए हैं. ज्यादातर पेशेंट यंग लड़के हैं. इनमें बहुत से माइनर भी हैं. जिसमें एक 12 साल की लड़की भी है.
हॉस्पिटल एडमिनिस्ट्रेशन बता रहा है कि दूसरे सेक्शन के वॉर्ड भी खाली किए जा रहे हैं ताकि आंख की इंजरी वाले पेशेंट्स भर्ती किए जा सकें.
हॉस्पिटल के आई स्पेशलिस्ट डॉ. सज्जाद खांडे बताते हैं.
बुरहान की मौत के बाद विरोध प्रदर्शन में कई लोगों की आंखों में चोटें आई हैं. हम अभी तक ऐसे 92 पेशेंट का इलाज कर चुके हैं. फिर भी हर घंटे नए मरीज आ रहे हैं.
चोटें इतनी खतरनाक हैं कि लगता है अब उनकी आंख की रोशनी कभी वापस नहीं आएगी. यहां आने के बाद भी पहले सादे कपड़ों में आये पुलिस वाले उनकी पिछली जिंदगी के बारे में पूछताछ कर रहे हैं जिसे वो रिकॉर्ड भी करके ले जा रहे हैं. इसके बाद ही हम उनकी जांच कर पाते हैं.
उन्होंने इंडियन एक्सप्रेस को बताया एक बार उन्हें ट्रामा सेंटर में ऑपरेशन बंद करना पड़ा. क्योंकि इतने लोग थे कि वहां भी घुसते चले जा रहे थे.

पुलिस और पैलेट गन यानी नॉन-लीथल हथियार

कश्मीर में विरोध को रोकने के लिए 2010 से ही पुलिस पैलेट गन का यूज कर रही है. तब पुलिस ने इसे नॉन-लीथल हथियार होने के चलते यूज करना शुरू किया था. नॉन-लीथल हथियार उन्हें कहा जाता है, जिसके यूज से मरने के चांसेस कम होते हैं. पर साल दर साल पुलिस इसका यूज बढ़ाती गई.

पुलिस यूज कर रही है ज्यादा खतरनाक पैलेट

इस पैलेट गन में लगने वाले पैलेट्स की रेंज 5 से 12 के बीच होती है. 5 सबसे ज्यादा खतरनाक होता है. वैसे प्रदर्शन कर रही भीड़ को कंट्रोल करने के लिए 9 रेंज का पैलेट रिकमेंडेड है. पर पुलिस भीड़ को काबू करने को कई बार 6 या 7 रेंज के पैलेट भी यूज करती है.
पैलेट पिस्टल और पैलेट
पैलेट पिस्टल और पैलेट्स

कई केस में वापस नहीं आई रोशनी

इन पैलेट के यूज से कोई मरता नहीं इसलिए पुलिस इसका जमकर यूज करती है. पर अगर ये आंख में लग जाए तो आदमी की आंख का बचना मुश्किल होता है. और अगर एक देख सकने वाला आदमी अचानक से किसी एक्सीडेंट में अपनी दोनों आंखें खो देता है तो उसकी जिंदगी मौत से बदतर हो जाती है.
केवल उस इंसान की जिंदगी ही नहीं, उसका सारा परिवार तबाह हो जाता है. कई बार जिस लड़के के साथ ऐसा हुआ होता है उसके घर के लोग उसे लेकर चेन्नई तक चक्कर लगा आए हैं कि शायद उनके घर वालों की आंख की रोशनी वापस आ जाए, पर ऐसा होता नहीं है. सालों लग जाते हैं परिवार को ये सच्चाई स्वीकार करने में.
बहुत कम ही केस ऐसे हैं. जिनमें आंखों में पैलेट लगने के बाद वापस आ गई हो रोशनी. यासीन नाम का एक लड़का जो वहीं SMHS हॉस्पिटल में भर्ती होकर इलाज करा रहा है, बताता है.
हम बुरहान के जनाजे में भाग लेने गए थे. लौटते वक्त हम 20 लड़के थे. अचानक से पुलिस से हम पर पैलेट गन से हमला किया. एक पैलेट मेरी आंख में लगा. मुझे बस इतना याद है कि कुछ जलता हुआ मेरी आंखों में घुसा और मुझे बहुत तेज दर्द हुआ. मैं इस हालत में भी मीलों चला और अवंतीपोरा हॉस्पिटल पहुंचा. जहां डॉक्टर्स ने मेरी कोई मदद करने से मना कर दिया.
मैंने पंपोर की ओर जाती हुई एक एम्बुलेंस देखी और उसमें बैठ गया. तब मुझे उसने दूसरी एम्बुलेंस में बिठाया जो मुझे श्रीनगर ले गई. मेरी दाईं आंख में दो पैलेट थे. मेरा परिवार जानता भी नहीं कि मुझे क्या हुआ क्योंकि मेरा फोन भी नहीं लग रहा था.
फोटो- फेसबुक
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एक और लड़का जिसका उसी बेड पर इलाज चल रहा है. उसकी बायीं आंख में पैलेट लगा था. वो कहता है,
मैं अपनी बायीं आंख से अब बिल्कुल नहीं देख सकता. हम नारे लगा रहे थे तब तक पुलिस वाले आए. उन्होंने पैलेट्स दागने शुरू कर दिए. जो आकर मेरी आंख में लगा.
डॉक्टर खांडे ने कहा, वो पेशेंट्स जो अभी देख पा रहे हैं, कई बार वो भी हफ्ते भर बाद नजर खराब होने की शिकायत करते हैं. क्योंकि पैलेट आंख में घुस जाता है और आंख के टिश्यू को धीरे-धीरे खराब करने लगता है. हम ऐसे केस में मदद को कुछ नहीं कर सकते. रोज 10 केस ऐसे आ रहे हैं.
एक लड़का जिसको सोमवार को पंपोर में विरोध के दौरान आंख में पैलेट लगा था, कहता है.
सुरक्षाबल हमें जिंदगी भर के लिए अंधा कर देना चाहते हैं. मैं अब केवल एक आंख से देख सकता हूं. ये क्या अपने अधिकारों की मांग कर रहे लोगों से निपटने का तरीका है?
खांडे ने बताया बहुत से केस तो ऐसे भी होते हैं जिनकी कोई रिपोर्ट ही नहीं होती क्योंकि साउथ कश्मीर से यहां तक आने में दो दिन लग जाते हैं. इसलिए बहुत से लोग यहां तक पहुंच ही नहीं पाते. उन्होंने एक ऐसे केस के बारे में भी बताया, जिसमें पहले उसकी एक आंख में पैलेट लगा था फिर दूसरी वाली में भी लग गया. यानी अब दोनों आंखें खराब हो चुकी हैं.
SMHS हॉस्पिटल के एक दूसरे डॉक्टर ने नाम न छापने की शर्त पर बताया है कि इस बार सबसे ज्यादा पेशेंट आ रहे हैं. वो भी सब के सब पैलेट्स से घायल.
एक सीनियर पुलिस अफसर ने इस बारे में कहा -
मुझे इसके खराब रिजल्ट्स मालूम हैं. पर इसके अलावा दूसरा कोई चारा भी नहीं है. पैलेट बंदूकें ही हैं जिन्हें विरोध के दौरान आसानी से इस्तेमाल किया जा सकता है क्योंकि मौत सबका ध्यान तेजी से अपनी और खींचती है. यहां बहुत से केस आए हैं जिसमें मरीजों की आंख में पैलेट से चोट आई है पर मुझे नहीं लगता उनकी आंख की रोशनी इससे जानी चाहिए, पर सुनने में आया है कि आंखें खराब हो रही हैं.

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