मुझे नहीं मालूम है कि आपका कौन सा सम्मान खतरे में है. खतरे में है भी या नहीं,फर्क नहीं पड़ता. मुझे नहीं मालूम है कि कौन सी फ़िल्म आपकी किस भावना को आहत कर रहीहै. कर भी रही है तो अपनी भावना की आहुति दे दीजिये. क्यूंकि जब आपकी आहत भावना औरखतरे में पड़ा सम्मान आपको सड़क पर चलती एक बस, जिसमें स्कूल से वापस आते बच्चे मौजूदथे, पर पत्थर बरसाने को कहता है तो मुझे आपमें और उन तालिबानियों में कोई अंतर नहींमालूम देता है जिन्होंने मलाला के सर में गोलियां मार दी थीं. उसके पढ़ने जाने सेउनकी भी भावनाएं आहात थीं. वो पढ़ाई बैन करना चाहते थे और आप एक फ़िल्म. आप दोनों एकही सिक्के के पहलू हैं जो एक दूसरे को पूरा कर रहे हैं और कुछ नहीं.मुझे ऐसे महाटुच्चे कथित राजपूतों को तालिबानी कहने में एक पैसे का संकोच नहीं हैऔर न ही कोई डर है.अव्वल तो ये कि पद्मावती कभी थी ही नहीं. वो एक कोरी कल्पना है जैसे हर धर्म का हरभगवान है. मनगढ़ंत कहानियों के ऊपर जीने वालों की इस दुनिया में कोई कमी नहीं है.मगर जिस तरह से मानसिक रूप से विक्षिप्त इंसान को भी जीने का पूरा हक मिलता है वैसेही हर धर्म को मानने वाले को जीने का पूरा हक है. ये हक़ उससे कोई भी छीन नहीं सकता.लेकिन अपने विश्वास को दूसरे पर थोपने के लिए वो अगर ऐसी नीचता पर उतर आए कि बच्चोंसे भरी बस पर पत्थर बरसाने लगे तो उसके पृष्ठ भाग को लाठियों से इतना लाल कर दियाजाए कि उसे देख दुनिया की सभी ट्रेनें अपनी जगह रुक जाएं. मुझे नहीं मालूम है कि येकौन से किस्म के राजपूत होंगे जिन्होंने वो पत्थर फेंके होंगे. वो बच्चे थे वोबच्चे जिन्हें शायद इस सब से कोई सरोकार भी नहीं है. अगर कोई सरकार के ख़िलाफ़प्रदर्शन कर रहा है तो एक अलग ही लेवल पर जाकर उसके सरकारी संपत्ति को नुकसानपहुंचाने को समझा जा सकता है. (वो लेवल एक गजब ही लेवल होगा लेकिन हां, समझा जासकता है. समझा जाए ही, ये ज़रूरी नहीं है) मगर बच्चों पर पत्थर बरसाने में कौन सीबहादुरी है. क्या ये वही हैं जो राह में चलते किसी कुत्ते को पत्थर मार के अपनीमूंछ ऐंठते हैं और खुद को राजपूत कहने लगते हैं? कुछ रोज़ पहले मध्य प्रदेश के रतलाममें केजी के बच्चों को पीट दिया. करणी सेना ने. मैं थूंकता हूं ऐसी सेना पर. सेनाओंके अपने नियम होते हैं. अपने उसूल होते हैं. वो झुंड जो जाकर 5-6 साल के बच्चों कोएक गाने पर नाचने की वजह से पीट आए, सेना नहीं बल्कि चमड़े की चप्पल में लगी फफूंदकी कॉलोनी कहलाती है जिसके ऊपर सवा सौ ग्राम कड़ुआ तेल डालकर उसे धूप में सुखायाजाता है. इस वक़्त ज़रुरत है तो उस सवा सौ ग्राम तेल की. हर उस लाठी के लिए जोपुलिसिया पैसे से खरीदी गई है. ये बेहद शर्म की बात है कि प्रदेशों के मॉल्स केबाहर जितने लोग नहीं हैं उससे ज़्यादा पुलिस बल तैनात है क्यूंकि इन शूरवीरों कीहालात एक फ़िल्म के रिलीज़ होने से खराब है. मुझे नहीं लगता है कि राजा रतन सिंहअलाउद्दीन के हमले से इतना घबराएंगे होंगे जितना ये कमज़ोर, खोखले और नीच कथितराजपूत एक फ़िल्म को सामने देख घबराए हुए हैं. बच्चों की बस पर पत्थर फेंके जा रहेहैं. बच्चों को पीटा जा रहा है. हरयाणा प्रदेश में हफ़्ते भर में आधा दर्जन रेप कीखबरें आईं जिसपर किसी की रूह नहीं कांपी. लेकिन राजपूताना अस्मत दीपिका पादुकोण कीकमर में छिपी बैठी थी जिसे कम्प्यूटर ग्राफ़िक्स की मदद से लुटने से बचा लिया गया.एक राजपूत राजा एक आताताई से हार जाता है. उसकी पत्नी को अपनी जान देनी पड़ती है. औरउसकी पीढ़ी के लोग अपनी हार को एक औरत के जौहर करने से छिपा लेते हैं, उसे देवीबनाते हैं और उसकी आबरू को उसका रूप धरने वाली की कमर में ढूंढते हैं. मानसिकदिवालियेपन का इससे अच्छा नमूना और कहां मिलेगा? अगर ये काफ़ी नहीं है तो इस वीडियोको देखिये. बस में बच्चे हैं, उनको पढ़ाने वाले हैं. नीचे छिपे बैठे हैं. क्यूंकिसड़क पर जानवरों के साथ इंसान रुपी खोखले जानवर जो खुद को राजपूत कहते हैं, भी घूमरहे थे. उनके हाथ में पत्थर थे. उन्होंने वो पत्थर उठाये और दे मारे उस बस पर.Video of school bus attacked today in Gurugram by anti-Padmavati cowards. Thisis the aukat of groups like the Karni Sena: attackers of little kids. May themen responsible for this never be able to walk again. pic.twitter.com/4ZFKvJboKc— Shiv Aroor (@ShivAroor) January 24, 2018 अलाउद्दीन जब राजा रतन सिंह से मिलनेआया था तो ऐसा मौका भी आया जब रतन की तलवार अलाउद्दीन की गर्दन पर थी. एक झटका औरदिल्ली अपना शाह खो देती. (जैसा कि फ़िल्म में दिखाया गया है.) लेकिन रतन सिंह नेऐसा नहीं किया. क्यूंकि अलाउद्दीन अकेला आया था और निहत्था था. उसी की पीढ़ी को आगेबढ़ाने वाले आज बच्चों की बसों पर पत्थर फेंक रहे हैं और उन्हें पीट रहे हैं. येराजपूत नहीं हो सकते. ये फफूंद से ज़्यादा कुछ भी नहीं हो सकते. चाहिए तो बस सवाग्राम तेल, हर पुलिसिया पैसों से खरीदी गई लाठी पर.-------------------------------------------------------------------------------- ये भी पढ़ें:पद्मावत फ़िल्म रिव्यू