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इस आदमी की सुन ली जाती तो टल सकता था कानपुर ट्रेन हादसा

न किसी के सिर से मां-बाप का साया छिनता और न किसी को औलाद का गम सहना पड़ता.

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पंडित असगर
21 नवंबर 2016 (अपडेटेड: 20 नवंबर 2016, 04:22 AM IST)
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इंदौर-पटना एक्सप्रेस. तड़के करीब तीन बजे. कानपुर के पुखरायां में 14 डिब्बे पटरी से उतरे. चीख पुकार. लाशों के टुकड़े. दर्दनाक मंजर. इस हादसे में अब तक 133 लोगों की जान जा चुकी है, 150 से ज्यादा गंभीर रूप से जख्मी हैं. इसलिए ये आंकड़ा अभी और भी बढ़ सकता है. दुआ है कि मौत का आंकड़ा यही ठहर जाए. ये हादसा पूरी तरह टल सकता था. सबकी जान बच सकती थी. किसी का घर नहीं उजड़ता. न किसी के सिर से मां-बाप का साया छिनता और न ही किसी को अपनी औलाद का गम सहना पड़ता. अगर रेलवे के अफसर ने S2 कोच में सफर कर रहे प्रकाश शर्मा की बात को मान लिया होता. और उसकी जांच करवा ली होती. रेलवे के अफसर की ये अनदेखी सैकड़ों लोगों की जिंदगी से खेल गई. 35 साल के प्रकाश शर्मा मध्य प्रदेश के मंदसौर जिले में खेरखेड़ा गांव के रहने वाले हैं. वह शनिवार को दो बजे इंदौर से इंदौर-पटना एक्सप्रेस में सवार हुए. एस-2 कोच में थे. ये वही डिब्बा है जो हादसे में पूरी तरह से डैमेज हो गया. प्रकाश शर्मा ने मीडिया को बताया कि वह ट्रेन से रोजाना सफर करते हैं. लेकिन पहली बार उन्हें लगा कि पहियों से कुछ अलग तरह की आवाज आ रही थी. पहियों में सामान्य से ज्यादा शोर हो रहा था.
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रविवार सुबह उन्हें हादसे की सूचना मिली तो लगा कि उनकी आशंका सच साबित हो गई. प्रकाश कहते हैं कि मैंने हादसे के 12 घंटे पहले चेताया था. रेलवे के अफसर उनकी बात को गंभीरता से लेते तो इस हादसे को टाला जा सकता था. हादसा कैसे हुआ, कौन इसका जिम्मेदार है. इसका अभी खुलासा नहीं हुआ है. रेलवे पूरे हादसे की अपने स्तर पर जांच करेगा, जिसके बाद हादसे की असल वजह का पता चल सकेगा. ट्रेन हादसे में S1, S2, S3 और S4 कोच हादसे में बुरी तरह डैमेज हुए हैं. जिस वजह से मौत का आंकड़ा बड़ा हो गया.

आउटडेटेड थे ट्रेन के कोच

हादसे की वजह में एक वजह ये भी हो सकती है कि इंदौर-पटना एक्सप्रेस के आईसीएफ कोच आउटडेटेड थे. इनको राजधानी और शताब्दी के मॉडर्न Linke Hoffman Busch कोच से बदला जाना है. रेलवे मिनिस्टर सुरेश प्रभु ने साल 2015-16 के बजट में प्रॉमिस किया था कि चरणबद्ध तरीके से ट्रेनों में LHB कोच को जोड़ा जाएगा. और आईसीएफ कोच को बाहर किया जाएगा. लेकिन एक साल बाद ये प्रोसेस ठप्प पड़ा है. कहा जा रहा है कि इंडस्ट्री नए कोच देने में सक्षम नहीं है. क्योंकि आईसीएफ कोच की संख्या ज्यादा है, और उस तरह से नए कोच बनने में टाइम लगेगा. नए कोच साल में जोड़े जा सकेंगे. अभी 55 हजार पुराने आईसीएफ कोच पटरी पर दौड़ रहे हैं. जबकि LHB कोच की संख्या 5 से 8 हजार तक है.
 

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