कैलाश विजयवर्गीय. नेशनल जनरल सेक्रेटरी हैं. भाजपा के. वो पार्टी जिसकी केंद्र मेंसरकार है. सरकार से याद आया, बचपन में एक गाना सुना था, "हमरी जीजी की है सरकार, केजीजा पानी भरें..." भाजपा इस वक़्त वही जीजी है जिसकी सरकार बनी हुई है. कैलाशविजयवर्गीय शाहरुख़ खान से पानी भरवाना चाहते हैं. कैलाश ने ट्विटर पर एक फ़ोटो अपलोडकी. जिस पर लिखा, "प्रधानमंत्री मोदी जी ने नोट बंदी कर काले धन वाले 'रईसों' कोज़मीन पर ला दिया. अब बारी देश की 'काबिल' जनता की है. जो 'काबिल' है, उसका हक़ कोईबेईमान 'रईस' न छीन पाए."https://twitter.com/kailashonline/status/822832221794877440--------------------------------------------------------------------------------ये ट्वीट उस समय आया है जब शाहरुख़ खान की 'रईस' और ऋतिक रोशन की 'काबिल' रिलीज़ होनेको हैं. रईस और काबिल - विजयवर्गीय के ट्वीट में दोनों ही शब्द साफ़ साफ़ मौजूद हैं.कैलाश विजयवर्गीय ने कहा कि वो सिर्फ मोदी जी की नोटबंदी के स्टेप के बारे में बातकर रहे थे. उनका बचाव करते हुए शाइना एनसी ने ट्वीट किया और कहा कि किसी भी जगह परहृतिक या शाहरुख़ का नाम नहीं लिया गया है. और इस बात को सिर्फ नोटबंदी के सन्दर्भमें ही कहा गया है. इसलिए कंट्रोवर्सी न बनाई जाए. शाइना एनसी फ़ैशन डिज़ाइनर हैं औरसाथ ही महाराष्ट्र बीजेपी की स्पोक्सपर्सन हैं. --------------------------------------------------------------------------------शाहरुख़ खान अचानक ही देशद्रोही नहीं हुए हैं. उन्हें तमाम विशेषणों से नवाज़ा जा रहाहै. और ये अचानक नहीं हुआ है. ये धीरे-धीरे हुआ है. और हो रहा है. लगातार. शाहरुख़के नाम के आगे खान लिखा है. और ये उन्हें कई लोगों की आंखों में 'देशद्रोही' ताकतोंके नज़दीक पहुंचा देता है. शाहरुख़ ने कितनी ही बार कहा हो कि "माय नेम इज़ खान, ऐंडआइ ऐम नॉट अ टेररिस्ट" लेकिन जनता है कि मानने को तैयार नहीं है. विजयवर्गीय औरउनके चेले हैं कि मानने को तैयार नहीं हैं. काबिल और रईस शब्दों की मौजूदगी, ऐसेवक़्त पर जब ये दोनों ही फ़िल्में एक साथ रिलीज़ हो रही हैं, मात्र संयोग नहीं है. जबरईस का नाम लेते हुए उसे 'देश का न होने वाला' क़रार दिया जाता है, और रईस नाम कीफिल्म में शाहरुख़ खान हों तो दो और दो चार जोड़ लिया जाना चाहिए. हिंदी में एक बातसीखी है. जब भी ऐसे शब्दों का इस्तेमाल किया जाए जिनका मतलब शाब्दिक न होकरसांकेतिक हो तो उन्हें "..." में कैद कर दिया जाता है. ये यूं कहना होता है कि"भाईसाब! इसपर एक्स्ट्रा गौर फरमाइयेगा." विजयवर्गीय ने भी बखूबी इसका सहारा लियाहै. 'कट्टर देशभक्तों' की नज़र में शाहरुख़ खान देश के नहीं हो पाए. तब भी नहीं जबउन्होंने देश के माहौल पर चिंता जताई, और तब भी नहीं जब 'चक दे इंडिया' मेंउन्होंने देश को वर्ल्ड कप जितवाया. अब कहा जा रहा है कि वो एक 'आतंकवादी' का रोलनिभा कर उसे हीरो बना रहे हैं. और ये तब कहा जा रहा है जब फ़िल्म किसी ने भी देखी हीनहीं है. एक मैसेज है जो व्हाट्सैप्प के चक्कर काट रहा है. इसमें फैलाया जा रहा हैकि - "रईस की कहानी एक आतंकवादी अब्दुल लतीफ़ की कहानी है. लतीफ़ दाउद इब्राहिम सेमिलकर आतंकवादी गतिविधियों में शामिल था. साथ ही शराब का इल्लीगल धंधा भी करता था.और बाकी कई नशे भी. अब शाहरुख़ उसी आतंकवादी को देश के सामने हीरो बनाना चाहता है.वही आतंकवादी जिसने मुंबई के बम ब्लास्ट्स की फंडिंग भी की. और इसीलिए शाहरुख़ की इसफ़िल्म को बॉयकॉट कर दिया जाना चाहिए." वो शायद भूल गए कि इसी फिल्म में एकनवाज़ुद्दीन सिद्दीकी भी है. वो पुलिसवाला है. जो रईस को पकड़ने की फ़िराक में है.फ़िल्म में जितना भौकाल शाहरुख़ का दिखा है, उतनी ही अथॉरिटी नवाज़ की भी दिखी है. कईजगहों पर नवाज़, शाहरुख़ पर भारी पड़े हैं. नवाज़ से परेशान होकर रईस उसके ट्रांसफर तककी बात करता है. नवाज़ एकमात्र इंसान है जो शाहरुख़ की आंख में झांककर उसे बर्बादकरने की बात कहता है. तो कुल मिलाकर मुद्दा ये है कि लोगों ने रईस की शान तो देखीमगर नवाज़ की हनक न देखी. उन्होंने ये तो देखा कि मियां भाई डेयरिंग दिखा रहे हैंमगर ये नहीं सोचा कि मियां भाई को 1995 में अरेस्ट कर 1997 में एनकाउंटर में मारदिया गया. उन्होंने बिना फ़िल्म देखे मियां भाई के भौकाल को सब कुछ घोषित कर दिया औरअपने ही देश की पुलिस के एक अफ़सर के भौकाल को कुछ भी न समझा. वाह! तालियां पीटीजायें.--------------------------------------------------------------------------------शाहरुख़ खान, चूंकि पैसे वाले हैं, उनकी पत्नी इस फिल्म की प्रोड्यूसर हैं, उनके इसफिल्म पर काफी पैसे लगे होंगे इसलिए वो सॉफ्ट टार्गेट साबित होते हैं. बेहद सॉफ्ट.इनकी हालत खराब रहती है. क्यूंकि इन्हें दस-बीस नहीं, सौ-पचास नहीं बल्कि करोड़ोंरुपये वापस करवाने होते हैं. दसियों लोग अपना न जाने क्या-क्या इनकी फ़िल्मों केभरोसे मार्केट में उतार देते हैं. उन सभी की ज़िम्मेदारी शाहरुख़ पर या इन जैसेऐक्टर्स पर होती है. ऐसे में शाहरुख़ और इनके जैसे तमाम ऐक्टर्स अटैक किये जाने केलिए एकदम तैयार मालूम देते हैं. मतलब, इन्हें नहीं निशाना बनाया जाए तो किसे? -------------------------------------------------------------------------------- हाल ही के कुछ वर्षों में इस तरह निशाना बनाये गए लोग कौन हैं? जिनकी फिल्मों काबहिष्कार करने की बातें कही गयी है, या व्हाट्सैप्प या सोशल मीडिया पर धकापेल फ़ैलीहै, वो कौन हैं? सलमान खान. शाहरुख़ खान. आमिर खान. नीचे एक फ़िगर दिया हुआ है.गणितीय भाषा में इसे वेन डाइग्राम कहते हैं. ये सारी सिचुएशन साफ़ कर देता है. तीनगोले हैं. तीनों अलग-अलग बातों को रिप्रेज़ेंट करते हैं. इस केस में शाहरुख़, सलमानऔर आमिर को. इनमें वो चीज जो कॉमन है, एक दूसरे को काटती है. इस केस में - ख़ान.ख़ान. फ्रॉम दि एपिग्लॉटिस. इन तीन ख़ानों में से एक के सामने देशभक्त 'काबिल' को खड़ाकर दिया गया है. लड़ाई अब फिल्म की नहीं है. लड़ाई है देशभक्ति बनाम गद्दारी की. औरइस लड़ाई का शंख फूंका है उन्होंने जिन्हें एक डेमोक्रेसी में होते हुए एक पॉलिटिकलपार्टी का जनरल सेक्रेटरी बनाया गया है. काबिल किस बेस पर देशभक्त हैं, मालूम नहींचल पा रहा है. एक बात और. पिछले कुछ अरसे में 'देशभक्तों' ने जिन-जिन फिल्मों कोबॉयकॉट करने की बात कही है, उन फ़िल्मों ने भयानक कमाई की है. एक भी फ़िल्म फ्लॉपनहीं हो पाई है. अफ़सोस! 'बजरंगी भाईजान' को टार्गेट किया तो 90 करोड़ के बजट पर बनीइस फिल्म ने कुल 626 करोड़ रुपये कमाए. 'सुल्तान' ने दुनिया भर में 584 करोड़ रुपयेकमाए. धार्मिक पाखंडों पर क़रारी मार करने वाली फ़िल्म 'पीके' 85 करोड़ में बनी औरउसने 792 करोड़ कमाए. रिलीज के दौरान ही इस फिल्म को बॉयकॉट करने की बात की जानेलगी. बड़ी हाय-तौबा मची. यहां से आमिर खान की साढ़े-साती शुरू हुई. इसके बाद आमिर नेइनटॉलरेंस पर जो कहा वो सभी को याद है. उसने साढ़े साती को डबल कर दिया. फिल्म आई'दंगल'. 70 करोड़ में बनी और 721 करोड़ रुपये कमाकर देश की सबसे कमाऊ फिल्म बन गयी.शाहरुख़ की ही 'दिलवाले' ने 372 करोड़ रुपये कमाए. --------------------------------------------------------------------------------इसके साथ ही एक आयाम और है. आप इस चेन-ऑफ़-थॉट के ख़िलाफ़ बोलने की सोचें, बोलने कीकोशिश करें तो आपकी छीछालेदर कर दी जाएगी.एक लड़की ने विजयवर्गीय के ट्वीट के जवाब में जब ये बताना चाहा कि ऐसे जब भी फिल्मोंको बॉयकॉट करने की कोशिश की गई है, उन्हीं फिल्मों ने खूब कमाई की है. उसके ऐसाकहते ही, एक वर्ग विशेष उस पर टूट पड़ा. उससे राशनकार्ड वाली फिल्म बनवाने को कहागया. इस वक्त संदीप कुमार के एमएमएस को ध्यान में रख लिया जाये. अगले ट्वीट पर उसलड़की के 'संतरों' की बात की गयी. एक और लड़की ने कुछ कहने की कोशिश की तो एक ख़ासतस्वीर जिसमें शाहरुख़ के हाथों में एक लड़की का पैर था, दिखाई गयी और पूछा गया कितस्वीर में वो ही लड़की है क्या.ये एक बेहद आसान तरीका है. किसी के कपड़ों के अन्दर तक घुस जाने का. खासकर एक लड़कीके. मां-बहन की बातें आ जायें तो रस दोगुना बढ़ जाता है. है कि नहीं? -------------------------------------------------------------------------------- फ़िल्मों में काम करने वाली जमात अब दो भागों में बंट गयी है. 'देशभक्त' -जिन्हें सड़क पर सोने वाला हर इंसान कुत्ता नज़र आता है और 'देशद्रोही' - जिनके द्रोहकी उपज देश में होती ग़लत बातों की ओर इशारा करना था. और ताज़ी बातों में ये किअभी-अभी विजयवर्गीय साहब का एक और ट्वीट आया है जिसमें लेथन को समेटने की भरपूरकोशिश की गयी है. अब 'रईस' और 'काबिल' को और भी संदर्भों में इस्तेमाल किया गया है.मगर फिर भी भाव वही है. काबिल अब भी गुड बॉय है और रईस गंदा बेबी. सुना है कि अबकाबिल चाय बेचते बेचते प्रधानमंत्री बन जाता है जबकि रईस का कुरता फटा रहता है.प्रधानमंत्री तो 'देशभक्त' है ही. और रईस बेचारा फिरंगी मां की औलाद है. लिहाज़ाउसकी देशभक्ति पर शक किया जाना लाज़मी है. फ़िलहाल, 'रईस' और 'काबिल' रिलीज़ के इंतज़ारमें हैं. सभी पक्ष लामबंद हैं. वो भी जिन्हें फ़िल्म देखनी ही है. वो भी जो फिल्मबॉयकॉट करने की तैयारी में जुटे हुए हैं. कुछ वो भी हैं जिन्हें फ़र्क नहीं पड़ता.उन्हें व्हाट्सैप्प पर मसाला भेजा जा रहा है. शाहरुख़ खान ट्रेन में सफ़र कर रहे हैं.एक आदमी स्टेशन पर मची भगदड़ में जान गंवा चुका है. 'रईस' के ख़िलाफ़ फ़ील्डिंग सेट कीजा रही है. दिव्यांग 'काबिलों' को पढ़ने के लिए व्हाट्सैप्प मेसेज भेजे जा रहे हैं. ('काबिल' और 'रईस' दो कमर्शियल फिल्में हैं जो एंटरटेन करने के लिए बनाई गई हैं. नतो कोई ऊंची है न कोई नीची. उम्मीद है अपने-अपने दर्शक वर्गों को ये पसंद आएंगी.)