जस्टिस काटजू ने पाकिस्तानी चैनल से जो कहा, उससे भारतीय खुश नहीं होंगे
काटजू पहले भी ऐसे बयान दे चुके हैं, जिनपर विवाद हो चुका है.
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जस्टिस काटजू (दाएं) ने भी इमरान खान को नोबल पीस प्राइज़ देने की मांग की है.
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सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड जस्टिस हैं जस्टिस मार्कंडेय काटजू. जब सुप्रीम कोर्ट में थे तो अपने फैसलों के लिए जाने जाते थे. जब रिटायर हो गए तो अपने बयानों के लिए जाने जाते हैं. अब जब पुलवामा हमला और उसके बाद भारत-पाकिस्तान के बीच हुई सर्जिकल स्ट्राइक के बाद सीमा पर तनाव बढ़ा हुआ है, तो जस्टिस काटजू ने एक और बयान दिया है. इस बार ये बयान भारत में न देकर दिया है पाकिस्तान के टीवी चैनल पर. और इस बयान के बाद एक ओर जस्टिस काटजू की आलोचना हो रही है तो दूसरी ओर उनकी हंसी भी उड़ाई जा रही है.
पाकिस्तान का एक न्यूज़ चैनल है जीओ न्यूज़. उसपर एक कार्यक्रम आता है कैपिटल टॉक. 5 मार्च को इसी कैपिटल टॉक शो में जस्टि काटजू फोन पर बोल रहे थे. उन्होंने कहा-

जीओ टीवी का स्क्रीन ग्रैब.

और रही बात शांति कायम करने की, तो जस्टिस काटजू को ये भी याद होना चाहिए कि शांति की सारी बातें पुलवामा हमले के बाद हो रही हैं. पुलवामा में 40 जवानों की शहादत के बाद शांति की बात हो रही है, जिसका बदला लेने के लिए इंडियन एयरफोर्स ने बालाकोट में एयरस्ट्राइक की. फिर से एयर स्ट्राइक न हो और फिर से पाकिस्तान में बने हुए आतंकी ठिकाने तबाह न हों, इसके लिए इमरान खान शांति की बात कर रहे हैं. अगर इमरान खान शांति के इतने ही पैरोकार थे, तो क्या उन्हें नहीं पता कि भारत में आतंक फैलाने वाला जैश-ए-मोहम्मद का मुखिया मौलाना मसूद अज़हर पाकिस्तान के बहावलपुर में ही है. अगर ये बात सुरक्षा एजेंसियों को पता है, तो ऐसा तो हो ही नहीं सकता कि इमरान खान को न पता हो. अगर वो शांति चाहते तो मसूद अहज़र को गिरफ्तार कर चुके होते. शायद हम अपने 40 जवानों को जिंदा देख पाते. लेकिन नहीं, इमरान खान ने ऐसा कुछ नहीं किया. और अब भी कुछ नहीं कर रहे हैं.

पाकिस्तान की ओर से जारी प्रेस रीलीज़, जिसमें 44 आतंकियों को हिरासत में लेने की बात कही गई है.
भारत ने पाकिस्तान को जैश-ए-मोहम्मद के खिलाफ सबूत सौंप दिए हैं. डॉजियर में आतंकियों के नाम तक हैं, लेकिन उनपर क्या ऐक्शन लिया गया. सिर्फ 44 आतंकियों को हिरासत में लेना और फिर गृह मंत्रालय के सचिव का ये कहना कि अगर सबूत नहीं मिला, तो हम सभी को रिहा कर देंगे, सख्त कदम है. क्या ये ऐसा कदम है, जिसके लिए इमरान खान को शांति का नोबेल मिलना चाहिए. और अगर नहीं, तो फिर जस्टिस काटजू किस मुंह से कह रहे हैं वो इमरान खान को नोबल देने की मुहिम का समर्थन करते हैं. जस्टिस काटजू कह रहे हैं कि भारत और पाकिस्तान गरीब देश हैं, वो लड़ाई नहीं कर सकते. लेकिन कोई भी देश इतना गरीब नहीं हो सकता कि वो अपने 40 जवानों की शहादत का बदला न ले. और रही बात इमरान खान के शांति प्रस्ताव की, तो वो अगर इतने ही गंभीर होते तो पाकिस्तान की ओर से सीज फ़ायर का उल्लंघन नहीं होता. खुद आर्मी कह चुकी है कि 14 फरवरी को पुलवामा हमले के बाद अब तक कम से कम 70 बार सीज फायर का उल्लंघन हो चुका है.
पाकिस्तान ने जैश के आतंकी मसूद अजहर के भाई और 43 आतंकियों को हिरासत में ले लिया है
पाकिस्तान का एक न्यूज़ चैनल है जीओ न्यूज़. उसपर एक कार्यक्रम आता है कैपिटल टॉक. 5 मार्च को इसी कैपिटल टॉक शो में जस्टि काटजू फोन पर बोल रहे थे. उन्होंने कहा-

जीओ टीवी का स्क्रीन ग्रैब.
'दोनों देशों के बीच जंग नहीं होगी, दोनों न्यूक्लियर पावर हैं और दोनों इस बात को जानते हैं. ये नूरा कुश्ती है. चुनाव हैं तो घर में घुसकर मारने जैसी बात होगी ही. दोनों देशों को जो करना चाहिए, वो बातें इमरान खान ने कही हैं. उन्होंने बहुत सही बात बताई है. मैं उनके भाषण से बहुत प्रभावित हूं और उनके भाषण को पूरी दुनिया में सुनाया जाना चाहिए. वो स्कॉलर भी हैं. ऐसा लगता है कि वो ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी में सिर्फ क्रिकेट ही नहीं खेलते थे. उन्होंने इतिहास को गहराई से पढ़ा है. ठंडे दिमाग से समझाया है कि पाकिस्तान भी हमले का शिकार रहा है. ऐसे में बातचीत ही तरीका है, जंग कोई तरीका नहीं है. वो नोबल प्राइज़ के हकदार हैं और मैं इस मुहिम का समर्थन करता हूं.'लेकिन इमरान खान के लिए तो नोबल प्राइज़ की कोई मुहिम चल ही नहीं रही है, फिर समर्थन किस बात का. हां पाकिस्तान की संसद में इमरान खान को नोबल पीस प्राइज़ देने की मांग उठी थी. लेकिन इस मांग को तो खुद इमरान खान ने खारिज़ कर दिया था. उन्होंने ट्वीट किया था-
मैं नोबेल शांति पुरस्कार के योग्य नहीं हूं. इस योग्य व्यक्ति वह होगा जो कश्मीरी लोगों की इच्छा के अनुसार कश्मीर विवाद का समाधान करता है और उपमहाद्वीप में शांति और मानव विकास का मार्ग प्रशस्त करता है.

और रही बात शांति कायम करने की, तो जस्टिस काटजू को ये भी याद होना चाहिए कि शांति की सारी बातें पुलवामा हमले के बाद हो रही हैं. पुलवामा में 40 जवानों की शहादत के बाद शांति की बात हो रही है, जिसका बदला लेने के लिए इंडियन एयरफोर्स ने बालाकोट में एयरस्ट्राइक की. फिर से एयर स्ट्राइक न हो और फिर से पाकिस्तान में बने हुए आतंकी ठिकाने तबाह न हों, इसके लिए इमरान खान शांति की बात कर रहे हैं. अगर इमरान खान शांति के इतने ही पैरोकार थे, तो क्या उन्हें नहीं पता कि भारत में आतंक फैलाने वाला जैश-ए-मोहम्मद का मुखिया मौलाना मसूद अज़हर पाकिस्तान के बहावलपुर में ही है. अगर ये बात सुरक्षा एजेंसियों को पता है, तो ऐसा तो हो ही नहीं सकता कि इमरान खान को न पता हो. अगर वो शांति चाहते तो मसूद अहज़र को गिरफ्तार कर चुके होते. शायद हम अपने 40 जवानों को जिंदा देख पाते. लेकिन नहीं, इमरान खान ने ऐसा कुछ नहीं किया. और अब भी कुछ नहीं कर रहे हैं.

पाकिस्तान की ओर से जारी प्रेस रीलीज़, जिसमें 44 आतंकियों को हिरासत में लेने की बात कही गई है.
भारत ने पाकिस्तान को जैश-ए-मोहम्मद के खिलाफ सबूत सौंप दिए हैं. डॉजियर में आतंकियों के नाम तक हैं, लेकिन उनपर क्या ऐक्शन लिया गया. सिर्फ 44 आतंकियों को हिरासत में लेना और फिर गृह मंत्रालय के सचिव का ये कहना कि अगर सबूत नहीं मिला, तो हम सभी को रिहा कर देंगे, सख्त कदम है. क्या ये ऐसा कदम है, जिसके लिए इमरान खान को शांति का नोबेल मिलना चाहिए. और अगर नहीं, तो फिर जस्टिस काटजू किस मुंह से कह रहे हैं वो इमरान खान को नोबल देने की मुहिम का समर्थन करते हैं. जस्टिस काटजू कह रहे हैं कि भारत और पाकिस्तान गरीब देश हैं, वो लड़ाई नहीं कर सकते. लेकिन कोई भी देश इतना गरीब नहीं हो सकता कि वो अपने 40 जवानों की शहादत का बदला न ले. और रही बात इमरान खान के शांति प्रस्ताव की, तो वो अगर इतने ही गंभीर होते तो पाकिस्तान की ओर से सीज फ़ायर का उल्लंघन नहीं होता. खुद आर्मी कह चुकी है कि 14 फरवरी को पुलवामा हमले के बाद अब तक कम से कम 70 बार सीज फायर का उल्लंघन हो चुका है.
पाकिस्तान ने जैश के आतंकी मसूद अजहर के भाई और 43 आतंकियों को हिरासत में ले लिया है
