अलग राज्य की मांग के लिए हो रहे आंदोलन की बलि चढ़ा है ये पत्रकार
त्रिपुरा की पार्टी इंडीजिनियस पीपुल्स फ्रंट ऑफ त्रिपुरा (IPFT) पर है हत्या का आरोप.
Advertisement

त्रिपुरा में लंबे समय से चल रहे आंदोलनों की भेंट चढ़ा है पत्रकार.
Quick AI Highlights
Click here to view more
1947 में देश आजाद हुआ. 9 सितंबर 1949 को फिलहाल देश के तीसरे सबसे छोटे राज्य त्रिपुरा का भारत में विलय हुआ. इससे पहले ये एक प्रिंसली स्टेट था. यानी रियासत था. 1963 में इसे यूनियन टेरेटरी बना दिया गया. 21 जनवरी, 1972 को त्रिपुरा को फुल-फ्लैश राज्य का दर्जा मिल गया. पर ये सब इतनी शांति से नहीं हुआ. त्रिपुरा के बगल में था ईस्ट पाकिस्तान या अब का बांग्लादेश. वहां से थोक के भाव बंगाली हिंदू पलायन करके त्रिपुरा आ रहे थे. ये बात त्रिपुरा में रह रहे लोगों को बिलकुल नहीं भा रही थी. सो आजादी के तुरंत बाद पूरे देश की तरह ही यहां भी संघर्ष छिड़ गया. लंबे वक्त तक चला. फिर वक्त के साथ हालात बदले और लोग शांति से रहने लगे.
2001 की जनगणना के अनुसार त्रिपुरा में 70 फीसदी बंगाली थे. मूलत: त्रिपुरा के लोग यानी आदिवासी सिर्फ 30 फीसदी ही बचे. इस बात की आग लोगों के अंदर सुलग रही थी. फिर 02 जून 2014 को लंबे आंदोलन के बाद आंध्र प्रदेश से कटकर एक नया राज्य तेलंगाना बना, जिसने इस सुलग रही आग में घी डालने का काम किया. त्रिपुरा अस्मिता के रखवालों का ईमान जाग गया और वो भी करने लगे एक अलग राज्य की मांग. ‘तिपरा लैंड’ की मांग. जहां त्रिपुरा के आदिवासियों का बोलबाला होगा. इस अभियान की कमान संभाल रखी है एक इंडीजिनियस पीपुल्स फ्रंट ऑफ त्रिपुरा (IPFT) नाम के कट्टरपंथी संगठन ने. इस संगठन का कहना है कि अलग राज्य की उनकी मांग संवैधानिक है और वो इसे लेकर रहेंगे. इस मांग का विरोध त्रिपुरा में राज कर रही सीपीआईएम सरकार के साथ ही कांग्रेस और बीजेपी ने भी किया है. पर IPFT ने अभियान चला रखा है. राजनैतिक रैलियों के साथ ही आए दिन प्रदर्शन हो रहे हैं.

तिपरा लैंड के लिए कई साल से चल रहे हैं धरना-प्रदर्शन.
ऐसा ही एक प्रदर्शन 20 सितंबर को हो रहा था. त्रिपुरा के मंडई इलाके में. इस दौरान IPFT और CPM की आदिवासी विंग त्रिपुरा राजेर उपजाति गण मुक्ति परिषद (TRUGP) के कार्यकर्ताओं के बीच झड़प हो गई. पुलिस ने लाठीचार्ज किया तो हिंसा और भड़क गई. इस बीच प्रदर्शन को कवर करने आए एक स्थानीय टीवी पत्रकार शांतनु भौमिक की हत्या कर दी गई. निर्मम हत्या. कवरेज के दौरान उन पर किसी ने पीछे से हमला किया और उनका अपहरण कर लिया. बाद में शांतनु की लाश एक लोकल स्टेडियम के पीछे मिली. उनके शरीर पर चाकू से हमले के कई निशान थे.
पांच सितंबर को इसी तरह बंगलुरु में एक वरिष्ठ पत्रकार गौरी लंकेश की हत्या कर दी गई और अब शांतनु की. जल्द ही कोई ये भी बोल सकता है कि 'सितंबर में तो पत्रकार मरते ही रहते हैं.' हालात कुछ ऐसे ही हैं. गौरी लंकेश के मामले में भी सीबीआई जांच की मांग की गई है. त्रिपुरा के इस पत्रकार की हत्या की भी सीबीआई जांच की मांग कर दी गई है.

पत्रकारों ने प्रदर्शन कर सीबीआई जांच की मांग की है.

अगरतला के बारामुरा में तिपरा लैंड की मांग के लिए रेलवे लाइन ब्लॉक कर दी गई थी.

IPFT के नेता एनसी देव वर्मा ने आंदोलन को आगे बढ़ाया है.
INPT ने 2003 के विधानसभा चुनाव में कांगेस के साथ गठबंधन कर लिया. पार्टी ने 6 सीटें जीतीं. मगर फिर टूट फूट शुरू हो गई. कुछ लोग लेफ्ट के साथ चले गए तो कुछ कांग्रेस के साथ रहे. 2009 लोकसभा चुनाव से पहले एक बार फिर IPFT नाम का जिन जाग गया. INPT के कुछ नेताओं ने इस पार्टी का झंडा फिर उठा लिया. नेतृत्व किया ऑल इंडिया रेडियो के डायरेक्टर रहे एनसी देव वर्मा ने. पार्टी ने सबसे प्रमुख लक्ष्य रखा एक अलग राज्य का. तिपरा लैंड का. और तब से उसने यही मुद्दा पकड़ रखा है. इसी की आग में 20 सितंबर को एक पत्रकार की बलि चढ़ गई.
वीडियो देखें:
यह भी पढ़ें:
अमरा राम : राजस्थान का वो विधायक जो पुलिस की गोली से बचने ऊंट पर चढ़कर भागा था
जो पार्टियां पावर में रहीं, वही चीरहरण करती रही हैं दल-बदल विरोधी कानून का
2001 की जनगणना के अनुसार त्रिपुरा में 70 फीसदी बंगाली थे. मूलत: त्रिपुरा के लोग यानी आदिवासी सिर्फ 30 फीसदी ही बचे. इस बात की आग लोगों के अंदर सुलग रही थी. फिर 02 जून 2014 को लंबे आंदोलन के बाद आंध्र प्रदेश से कटकर एक नया राज्य तेलंगाना बना, जिसने इस सुलग रही आग में घी डालने का काम किया. त्रिपुरा अस्मिता के रखवालों का ईमान जाग गया और वो भी करने लगे एक अलग राज्य की मांग. ‘तिपरा लैंड’ की मांग. जहां त्रिपुरा के आदिवासियों का बोलबाला होगा. इस अभियान की कमान संभाल रखी है एक इंडीजिनियस पीपुल्स फ्रंट ऑफ त्रिपुरा (IPFT) नाम के कट्टरपंथी संगठन ने. इस संगठन का कहना है कि अलग राज्य की उनकी मांग संवैधानिक है और वो इसे लेकर रहेंगे. इस मांग का विरोध त्रिपुरा में राज कर रही सीपीआईएम सरकार के साथ ही कांग्रेस और बीजेपी ने भी किया है. पर IPFT ने अभियान चला रखा है. राजनैतिक रैलियों के साथ ही आए दिन प्रदर्शन हो रहे हैं.

तिपरा लैंड के लिए कई साल से चल रहे हैं धरना-प्रदर्शन.
ऐसा ही एक प्रदर्शन 20 सितंबर को हो रहा था. त्रिपुरा के मंडई इलाके में. इस दौरान IPFT और CPM की आदिवासी विंग त्रिपुरा राजेर उपजाति गण मुक्ति परिषद (TRUGP) के कार्यकर्ताओं के बीच झड़प हो गई. पुलिस ने लाठीचार्ज किया तो हिंसा और भड़क गई. इस बीच प्रदर्शन को कवर करने आए एक स्थानीय टीवी पत्रकार शांतनु भौमिक की हत्या कर दी गई. निर्मम हत्या. कवरेज के दौरान उन पर किसी ने पीछे से हमला किया और उनका अपहरण कर लिया. बाद में शांतनु की लाश एक लोकल स्टेडियम के पीछे मिली. उनके शरीर पर चाकू से हमले के कई निशान थे.
पांच सितंबर को इसी तरह बंगलुरु में एक वरिष्ठ पत्रकार गौरी लंकेश की हत्या कर दी गई और अब शांतनु की. जल्द ही कोई ये भी बोल सकता है कि 'सितंबर में तो पत्रकार मरते ही रहते हैं.' हालात कुछ ऐसे ही हैं. गौरी लंकेश के मामले में भी सीबीआई जांच की मांग की गई है. त्रिपुरा के इस पत्रकार की हत्या की भी सीबीआई जांच की मांग कर दी गई है.

पत्रकारों ने प्रदर्शन कर सीबीआई जांच की मांग की है.
IPFT पर है हत्या का आरोप
हत्या का आरोप इंडीजिनियस पीपुल्स फ्रंट ऑफ त्रिपुरा (IPFT) के कार्यकर्ताओं पर लगा है. इसके चार कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार भी किया गया है. पत्रकार की हत्या से ठीक पहले गण मुक्ति परिषद के करीब 100 कार्यकर्ताओं पर भी अगरतला से 40 किलोमीटर दूर खोवै जिले के छनखोला क्षेत्र में हमला किया गया. इसका आरोप भी IPFT पर है. गण मुक्ति परिषद (टीआरयूजीपी) के समर्थक जीएमपी की एक रैली में शामिल होने के लिए बस स्टैंड पर इकट्ठा हुए थे.
अगरतला के बारामुरा में तिपरा लैंड की मांग के लिए रेलवे लाइन ब्लॉक कर दी गई थी.
IPFT ने जुलाई में 11 दिन तक किया था चक्का जाम
'तिपरा लैंड' की मांग के लिए IPFT ने जुलाई में 11 दिन तक स्टेट हाईवे और रेल नेटवर्क चोककर रखा था. ये आंदोलन 10 जुलाई, 2017 को शुरू हुआ था और 20 जुलाई को खत्म हो गया था. जिस रेलवे लाइन को रोका गया था वो यहां की एकमात्र रेलवे लाइन थी. 11 दिन तक त्रिपुरा जाने वाली सभी ट्रेनें कैंसिल कर दी गई थीं. हाईवे बंद होने से प्रदेश में खाने-पीने के सामान तक की कमी हो गई थी. फिर केंद्र सरकार की तरफ से इस मुद्दे पर बातचीत का आश्वासन मिला और आंदोलन खत्म हुआ.NDA का हिस्सा रही है IPFT
इंडीजिनियस पीपुल्स फ्रंट ऑफ त्रिपुरा (IPFT) की कहानी भी दिलचस्प है. 1997 में बनी ये पार्टी 2001 में खत्म हो गई थी. मगर ये एक बार फिर 2009 में जी उठी. 2013 में 11 संगठनों का नॉर्थ ईस्ट रीजनल पॉलिटिकल फ्रंट बना, जिसने आने वाले लोकसभा चुनाव में एनडीए का समर्थन किया. IPFT भी इस फ्रंट का हिस्सा थी. 2000 में इस पार्टी को पहली सफलता मिली. त्रिपुरा ट्राइबल एरिया ऑटोनोमस डिस्ट्रिक्ट काउंसिल के इलेक्शन में इसको 28 में से 17 सीटें मिलीं. मगर इसके बाद कई नेता इधर-उधर चले गए और पार्टी टूट गई. 2002 में एक नई पार्टी बनी इंडीजिनियस नेशनलिस्ट पार्टी ऑफ त्रिपुरा (INPT). इसमें IPFT का विलय हो गया और इसका नाम खत्म हो गया.
IPFT के नेता एनसी देव वर्मा ने आंदोलन को आगे बढ़ाया है.
INPT ने 2003 के विधानसभा चुनाव में कांगेस के साथ गठबंधन कर लिया. पार्टी ने 6 सीटें जीतीं. मगर फिर टूट फूट शुरू हो गई. कुछ लोग लेफ्ट के साथ चले गए तो कुछ कांग्रेस के साथ रहे. 2009 लोकसभा चुनाव से पहले एक बार फिर IPFT नाम का जिन जाग गया. INPT के कुछ नेताओं ने इस पार्टी का झंडा फिर उठा लिया. नेतृत्व किया ऑल इंडिया रेडियो के डायरेक्टर रहे एनसी देव वर्मा ने. पार्टी ने सबसे प्रमुख लक्ष्य रखा एक अलग राज्य का. तिपरा लैंड का. और तब से उसने यही मुद्दा पकड़ रखा है. इसी की आग में 20 सितंबर को एक पत्रकार की बलि चढ़ गई.
राजनीतिक वर्चस्व की लड़ाई
जैसे केरल में बीजेपी और लेफ्ट पार्टियों के बीच राजनीतिक वर्चस्व के लिए संघर्ष चल रहा है, वैसा ही कुछ हाल त्रिपुरा का भी है. फिलहाल सबकी नजर आदिवासियों पर है. सभी पार्टियां खुद को इसका अगुआ बनाने में लगी हैं. सीपीआई (एम) और IPFT के बीच इसके लिए आए दिन झड़प हो रही है. सीपीआई (एम) का कहना है कि ये सब बीजेपी करवा रही है. IPFT के पीछे बीजेपी ही है. सीपीआई (एम) का कहना है कि ये सब 2018 में होने वाले चुनाव के लिए करवाया जा रहा है. बीजेपी इसीलिए हिंसा करवा रही है. उसने पत्रकार की हत्या के लिए भी बीजेपी को जिम्मेदार बताया है. मानिक सरकार के नेतृत्व में त्रिपुरा में पिछले 20 साल से सीपीआई (एम) की ही सरकार है.वहीं, बीजेपी ने इस बात का खंडन किया है. साथ ही उसने सीपीआई (एम) की सरकार पर सवाल खड़े किए हैं. उनका कहना है कि राज्य में अराजकता का माहौल है और कोई भी सुरक्षित नहीं है.CPIM strongly condemns the brutal Murder of Progressive Journalist Shantanu Bhowmik by IPFT goons who are directly patronized by BJP/RSS! pic.twitter.com/zhDgNWoWZP
— CPI (M) (@cpimspeak) September 21, 2017
Journalist #ShantanuBhowmick
(27) murdered covering political clash in #Tripura
. Law and order nonexistent only violence under CPI(M) rule. pic.twitter.com/GXRuMxFzhy
— BJP Tripura (@BJP4Tripura) September 20, 2017
पत्रकार को लेफ्ट का मेंबर बता रहे थे
27 साल के शांतनु भौमिक दिनरात टीवी नाम के एक लोकल चैनल में काम करते थे. इस चैनल को प्रो-लेफ्ट माना जाता है. टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार स्थानीय लोग कह रहे थे कि शांतनु को मारते वक्त आरोपी IPFT के कार्यकर्ता सीपीआई (एम) का मेंबर बता रहे थे. शांतनु के साथ कैमरामैन भी था, मगर वो किसी तरह बच निकला.वीडियो देखें:
यह भी पढ़ें:
अमरा राम : राजस्थान का वो विधायक जो पुलिस की गोली से बचने ऊंट पर चढ़कर भागा था
जो पार्टियां पावर में रहीं, वही चीरहरण करती रही हैं दल-बदल विरोधी कानून का

