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'प्यारे इंडिया, मर रहे देश में ये जीना भी क्या जीना'

JNU विवाद के बाद आजादी और देश को लेकर मलयालम एक्टर मोहनलाल ने ये ब्लॉग लिखा है. पढ़िए.

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24 फ़रवरी 2016 (अपडेटेड: 24 फ़रवरी 2016, 01:25 PM IST)
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सबको चाहिए आजादी. आपको, हमें. हैं भी तो हम आजाद. लेकिन JNU स्टूडेंट्स पर देशद्रोह के आरोप के बाद 'आजादी' टॉपिक फिर छिड़ गया है. मलयालम के एक जाबड़ हीरो हुए मोहनलाल. टेरिटोरियल आर्मी में लेफ्टिनेंट कर्नल की मानद रैंक भी मिली हुई है. मोहनलाल ने एक ब्लॉग लिखा है आजादी और देश को लेकर. टाइटल है, 'व्हाट द पॉइंट ऑफ अस लिविंग वेन इंडिया इज डाइंग.' खूब पढ़ा जा रहा है. आप भी पढ़िए. और सोचिए. मर रहे इंडिया में हमारे जीने का क्या मतलब?
'कुछ दिन पहले मैंने अखबार में एक तस्वीर देखी. शहीद लान्स नायक सुधीश की चार महीने की प्यारी बेटी. अपने पापा की लाश के पास नजर आ रही थी. सुधीश ने अपनी बच्ची को पैदा होने के बाद कभी नहीं देखा था. अब उसी अखबार में मैंने हमारे देश की यूनिवर्सिटी में चल रही लड़ाई को पढ़ा. अखबार में बार स्कैम, असेंबली के झगड़े समेत कई और खबरें भी थीं. ये सब पढ़कर मुझे शर्मिंदगी और दर्द दोनों का एहसास हुआ. एक ऐसा देश, जहां फौजी मुल्क के लिए जान देते हैं. ऐसे देश में नागरिकों का आजादी और देशभक्ति पर चर्चा करने से ज्यादा शर्मनाक कुछ नहीं हो सकता. हल्की सी ठंड में हम रजाइयों और मोटे कंबलों में घुस जाते हैं. हमारे पास नहाने और ब्रश करने के लिए गरम पानी का जुगाड़ रहता है. इन सुविधाओं का इस्तेमाल कर हम यूनिवर्सिटी और दफ्तर जाते हैं. लेकिन हम करते क्या हैं. अपने फौजियों को गाली देते हैं. उन पर ही सवाल उठाते हैं. जब आम नागरिक तमाम सुविधाओं के मजा ले रहे होते हैं, तब देश के कहीं किसी कोने में अपने परिवार से दूर वो फौजी अपने बच्चों के बारे में सोचते होंगे. उन अपनों के बारे में, जिन्हें वो पीछे छोड़ आए हैं. जिन्हें शायद उन्होंने कभी न देखा हो. अपने बच्चे को याद करते होंगे. सियाचिन में बर्फ में दबकर हमारे जवान शहीद हुए थे. जवानों को खोजने के लिए पाकिस्तान भी मदद के लिए तैयार था. क्या हमने उन्हें इतनी भी इज्जत दी. एक अच्छे बेटे या बेटी होने के नाते जैसे हम अपने मां-बाप को नहीं छोड़ते हैं. ठीक वैसे ही हम अपने देश से दूर नहीं रह सकते. हमारा देश वो मिट्टी है, जहां हम खड़े होते हैं. वो आसमां है, जो हमारे सर के ऊपर है. देश वो हवा है, जहां हम सांस लेते हैं. वो पानी जो हम पीते हैं. ये हमारा देश जमीन का वो टुकड़ा है, जहां हम मरने के बाद एक हो जाएंगे. अभी जो बहस चल रही है. उसमें मुझे कोई दिलचस्पी नहीं है. लेकिन कुछ लोगों के एटीट्यूड ने मुझे परेशां कर दिया है. मेरी सभी गार्जियंस और घर के बुजुर्गों से अपील है कि वो अपने बच्चों से बात करें. उन्हें देश के सही मायने समझाएं. बहस और डिस्कशन लोकतंत्र के लिए बेहद जरूरी हैं. किसी ऐसी बहस का हिस्सा बनने का कोई मतलब नहीं है, जिससे अपने देश की आजादी स्ट्रॉन्ग न हो. जिससे हमारे देश का अपमान हो.'

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