ईरान संकट के बीच सबसे बड़ा सवाल, चीन कहां है?
अमेरिका और इजरायल ने संयुक्त रूप से चीन पर हमला कर दिया है. इस बीच सवाल उठ रहे हैं कि ईरान से रणनीतिक गलबहियां करने वाला चीन कहां है. लोग अमेरिकी गठबंधन की नजर से चीन को देख रहे हैं. सवाल उठ रहा है कि अमेरिका की तरह चीन अपने सहयोगी ईरान की मदद के लिए आगे क्यों नहीं आया?

मई 2025. चीन के यिवू से एक मालगाड़ी 15 दिनों का सफर करके इंचेह बोरुन बॉर्डर से होते हुए ईरान के बंदरगाह पर पहुंची. कई विश्लेषकों के लिए यह एक ऐतिहासिक क्षण था. कहा गया अमेरिकी प्रतिबंधों से जूझ रहा ईरान आखिरकार दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था से जुड़ गया. बीजिंग की महत्वकांक्षी परियोजना बेल्ट एंड रोड से भी ईरान के जुड़ने की बातें चलने लगी. प्रतीकों की राजनीति के सिरे से एक थ्योरी चल निकली. चीन ही ईरान का अंतिम सहारा बनेगा.
यह चर्चा अमेरिका-इजरायल और ईरान के बीच संघर्ष शुरू होने से पहले ही जोर पकड़ने लगी थी. जब मार्च 2021 में दोनों देशों ने 25 वर्षीय सहयोग समझौते पर हस्ताक्षर किए. इसके तहत ईरान में 400 अरब डॉलर के निवेश का अनुमान था. फिर मार्च 2023 में सऊदी अरब और ईरान ने चीन की मध्यस्थता में संबंधों को सामान्य बनाने की घोषणा की.
फिर युद्ध शुरू होने के पहले भी दोनों देशों के गठबंधन की मजबूती के संकेत मिले. लड़ाई शुरू होने के ठीक चार दिन पहले रॉयटर्स के हवाले से खबर आई कि चीन में बने CM-302 एंटी-शिप क्रूज मिसाइलों की खरीद के लिए ईरान और चीन की बातचीत आखिरी दौर में है. इन मिसाइलों की मारक क्षमता लगभग 290 किलोमीटर है और इन्हें कम ऊंचाई पर तेज गति से उड़कर डिफेंस सिस्टम को चकमा देने के लिए बनाया गया है.
इसी दौरान ओपेन सोर्स इंटेलिजेंस (OSINT) कम्युनिटी ने नए चीनी खुफिया संगठन मिजारविजन की गतिविधियों को ट्रैक किया. इसने 28 फरवरी के हमलों से कुछ दिन पहले पश्चिम एशिया में अमेरिकी सैन्य गतिविधियों की ऐसी सेटेलाइट तस्वीरें जारी कीं जिन्हें आमतौर पर संवेदनशील माना जाता है. इससे इस धारणा को मजबूती मिली की इस बार बीजिंग मिडिल ईस्ट में हो रहे मिलिट्री बिल्डअप में ज्यादा अग्रेसिव रुख अख्तियार करेगा. लेकिन जैसे ही युद्ध शुरू हुआ और पहले ही दिन ईरान के सुप्रीम लीडर की हत्या हो गई. चीन के तेवर आश्चर्यजनक ढंग से नरम पड़ गए.
चीन ने ईरान से जिन मिसाइलों का वादा किया था वो अगर युद्ध के मोर्चे पर अपनी क्षमता के हिसाब से प्रदर्शन करतीं तो अमेरिकी नौसेना के लिए परिस्थितियां ज्यादा मुश्किल साबित होतीं. ईरान युद्ध के चौथे दिन तक इस बात का शायद ही कोई सबूत है कि अब्राहम लिंकन कैरियर स्ट्राइक ग्रुप ने अपनी भूमिका में कोई बदलाव किया है. कैरियर एयर विंग और विध्वंसक पोत यूएसएस फ्रैंक ई. पीटरसन जूनियर, यूएसएस स्प्रुआंस और यूएसएस मर्फी से मिलकर बने इस ग्रुप ने पहले दिन से ही बिना किसी खास प्रतिरोध के हमला जारी रखा है.
कई लोगों ने चीन के इस संयम को ईरान को अधर में छोड़ देने जैसा बताया है. चैथम हाउस से जुड़े अहमद अबूदूह का कहना है कि खाड़ी में अमेरिकी सेना की तैनाती के बावजूद बीजिंग ने खुलकर समर्थन देने से परहेज किया है. हालांकि वे चेताते हैं,
इसे विश्वासघात समझना एक गलत धारणा है. चीन ने हमेशा ईरान को सैन्य सहायता देने से परहेज किया है.
नीदरलैंड्स के ग्रोनिंगन यूनिवर्सिटी के विलियिम फिगुएरोआ साल की शुरुआत में कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी प्रेस से प्रकाशित अपने रिसर्च पेपर में अबूदूह की बात का समर्थन करते दिखते हैं. फिगुएरोआ का तर्क है,
“विदेशी पर्यवेक्षकों ने ईरान और चीन के बीच हुए समझौते को बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया था. इसमें मुख्य रूप से भविष्य में सहयोग बढ़ाने की रुपरेखा प्रस्तुत की गई थी, जिसमें कोई स्पेशल कॉन्ट्रैक्ट, ठोस प्रस्ताव या फिर वित्तीय लक्ष्य शामिल नहीं था.”
विलियिम फिगुएरोआ बताते हैं कि असल मुद्दा यह है कि दुनिया चीन को अमेरिकी गठबंधन के आईने में ही देखती आ रही है. चीन मिडिल ईस्ट में अमेरिका की तरह व्यवहार करने के लिए नहीं आया है. किसी की मदद नहीं करने को साहस की कमी की तरह नहीं देखा जाना चाहिए. यह बीजिंग की रणनीतिक योजना का हिस्सा है. अहमद अबूदूह इसके पक्ष में एक और तर्क देते हैं उनका मानना है,
“बीजिंग कमजोर ईरानी शासन को जोखिम और अवसर दोनों की तरह देखता है. वह ईरानी शासन का पूर्ण पतन नहीं चाहता. लेकिन अपने ऊपर ईरान की निर्भरता बढ़ाने और उनकी कमजोरी का फायदा उठाने के लिए वह पूरी तरह से तैयार है.”
डिफेंस एक्सपर्ट फीगेनबाम इस वास्तविकता को और साफगोई से बयां करते हैं. उनका कहना है,
“चीन 120 से ज्यादा देशों का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है. वह इस क्षेत्र में अपनी नीति को केवल एक देश पर निर्भर नहीं करता. अफगानिस्तान इसका एक और उदाहरण है, जहां अमेरिकी सेनाओं की वापसी के बाद से चीनी कंपनियों ने युद्धग्रस्त देश के खनिज भंडारों का दोहन करने की कोशिश की है.”
यानी ट्रेन के सफर से शुरू हुई, फिर मिसाइल देने की खबरें और सैटेलाइट से ली गई तस्वीरों से पुष्ट हुई यह कहानी नाटकीय ढंग से खत्म नहीं होती. चीन अनुपस्थित नहीं है. वह बस एक करदाता की तरह मौजूद है, जो एक बेहद लंबी भू-राजनीतिक (Geo-Political) चाल चल रहा है.
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