जब ईरान ने कश्मीर मुद्दे पर भारत का साथ देकर पाकिस्तान समेत पश्चिमी देशों को ठेंगा दिखा दिया
ईरान और भारत के संबंध सदियों पुराने हैं और इस दोस्ती के कई किस्से इतिहास के पन्नों में दर्ज हैं. इसी दोस्ती से जुड़ा एक वाकया पिछले साल जून का है, जब इजरायल से संघर्ष के बीच ईरान ने अपना एयरस्पेस सिर्फ भारतीय नागरिकों को निकालने के लिए खोल दिया था.
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इजरायल और अमेरिका के हमले के बाद से ईरान पूरी दुनिया में अलग-थलग पड़ा है. भारत के लिए भी यह एक धर्मसंकट जैसी स्थिति है कि वह इस बहुध्रुवीय संघर्ष में किसके साथ जाए. खामेनेई के मारे जाने के बाद भारत की चुप्पी इसी असमंजस को जाहिर करती है.
हालांकि, ईरान और भारत के संबंध सदियों पुराने हैं और इस दोस्ती के कई किस्से इतिहास के पन्नों में दर्ज हैं. इसी दोस्ती से जुड़ा एक वाकया पिछले साल जून का है, जब इजरायल से संघर्ष के बीच ईरान ने अपना एयरस्पेस सिर्फ भारतीय नागरिकों को निकालने के लिए खोल दिया था.
लेकिन ये न तो पहला ऐसा मौका था और न आखिरी जब दुनिया को दरकिनार कर ईरान ने अपनी दोस्ती भारत के साथ खुलकर निभाई. इसकी मिसाल 90 के दशक की वो एक घटना भी है, जिसमें ईरान ने आर्थिक झंझावातों से जूझ रहे भारत को पश्चिमी देशों के कठोर प्रतिबंधों से बाल-बाल बचा लिया था. यह पाकिस्तान और दुनिया के कई इस्लामिक देशों का रचा चक्रव्यूह था, जिसमें कश्मीर मुद्दे के बहाने भारत पर कड़े प्रतिबंध लगाने की तैयारी की गई थी.
क्या कहानी है, विस्तार से बताते हैं.
ये साल 1994 के मार्च की बात है. ईरान में कड़ाके की सर्दी पड़ रही थी. खून जमा देने वाली इस सर्दी में तेहरान के हवाई अड्डे पर भारत का एक मिलिट्री विमान उतरता है. इस विमान में भारत के तत्कालीन विदेश मंत्री दिनेश सिंह हैं. उनके साथ तीन असिस्टेंट और एक डॉक्टर भी जहाज में मौजूद हैं. डॉक्टर इसलिए क्योंकि दिनेश सिंह बीमार थे और महीनों से दिल्ली के एम्स में भर्ती थे. लेकिन इसी हालत में उन्हें प्रधानमंत्री पीवी नरसिंह राव का एक बहुत जरूरी संदेश ईरान के तत्कालीन राष्ट्रपति अली अकबर हाशमी रफसंजानी को देना था. इसी बहुत महत्वपूर्ण काम के लिए वो अस्पताल के बिस्तर से उठकर तेहरान गए थे.
क्या था वो संदेश?
संदेश के बारे में बताने से पहले उसका बैकग्राउंड बता देते हैं. दरअसल, साल 1994 में पश्चिमी देशों का सपोर्ट पाकर इस्लामिक सहयोग संगठन (OIC) संयुक्त राष्ट्र के मानवाधिकार परिषद में एक प्रस्ताव पेश करने वाला था. यह प्रस्ताव भारत के खिलाफ था और मामला जम्मू-कश्मीर से जुड़ा था. इस प्रस्ताव में था कि जम्मू-कश्मीर में कथित मानवाधिकार के उल्लंघन के लिए भारत की UNHRC में निंदा की जाएगी. अगर ये प्रस्ताव पारित हो जाता तो इसे संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) में भेज दिया जाता. इसके बाद भारत की मुश्किलें बढ़ जातीं क्योंकि पश्चिमी देश एकजुट होकर भारत पर इस मुद्दे को लेकर आर्थिक प्रतिबंध लगाने की फुल तैयारी में थे.
भारत बुरी तरह फंस चुका था. दो साल पहले (1992 में) ही वह एक बड़े आर्थिक संकट से उबरा था. आर्थिक रूप से दिवालिया होने से बाल-बाल बचा था. इस दौरान उसे अपना सोने का भंडार तक गिरवी रखना पड़ा था. तभी ये नया संकट सामने आ गया, जो भारत सरकार के लिए ‘आसमान से गिरा खजूर पर अटका’ वाली स्थिति बन गई थी. रूस से भी मदद नहीं मिल सकती थी क्योंकि वहां अभी-अभी सोवियत संघ का विघटन हुआ था और किसी भी तरह का डिप्लोमेटिक सपोर्ट मुश्किल था.
भारत के खिलाफ इस प्रस्ताव के पीछे पाकिस्तान भी था, जो कश्मीर मुद्दे को यूएन के मंच पर लाने की एक और गंभीर कोशिश कर रहा था. कह सकते हैं कि वह इसमें लगातार कामयाब भी हो रहा था. ओआईसी उसके फुल सपोर्ट में खड़ी थी. पश्चिमी देश उसके साथ थे. प्रस्ताव को पास होना ही था. तभी प्रधानमंत्री नरसिंह राव के दिमाग में एक बात कौंधी. वह जानते थे कि इस्लामिक सहयोग संगठन आम सहमति के सिद्धांत पर काम करता है. यानी किसी प्रस्ताव पर संगठन के सारे सदस्यों की सहमति होगी तभी उसे आगे बढ़ाया जाएगा.
राव ने दिमाग लगाया कि अगर ईरान को मना लिया जाए और वह इस प्रस्ताव पर मतदान से अलग हो जाए या उसका विरोध करे तो इससे आम सहमति रुक जाएगी और प्रस्ताव खारिज हो जाएगा. लेकिन ये कैसे होगा? क्योंकि नई दिल्ली में उस समय के ईरानी राजदूत ने हुर्रियत डेलीगेशन को आश्वासन दिया था कि तेहरान कश्मीर को लेकर भारत के खिलाफ प्रस्ताव को पारित कराएगा. राव ने फिर भी चान्स लिया. तत्कालीन विदेश मंत्री दिनेश सिंह उस वक्त नई दिल्ली के एम्स में भर्ती थे. गंभीर रूप से बीमार थे. लेकिन ये काम करने के सबसे मुफीद व्यक्ति वही थे. उन्हें अस्पताल के बिस्तर से उठाकर दो डॉक्टरों के साथ तेहरान भेजा गया.
अब आते हैं उस ‘खास मेसेज’ पर, जिसने उस वक्त न सिर्फ कश्मीर मुद्दे को यूएन में जाने से रोका था बल्कि मुश्किल घड़ी में भारत की प्रतिष्ठा की भी रक्षा की थी.
दिनेश सिंह जब तेहरान एयरपोर्ट पर उतरे तब वहां के विदेश मंत्री अली अकबर वेलायती प्रोटोकॉल तोड़कर उनकी अगवानी करने पहुंचे. उनकी हालत देखकर वहां के अधिकारी चौंक गए. वेलायती ने व्हीलचेयर पर बैठे दिनेश सिंह का हाथ पकड़कर पूछा कि ऐसा क्या हो गया कि उन्हें इस हालत में यहां आना पड़ा. दिनेश सिंह ने मुस्कुराते हुए उन्हें एक चिट्ठी सौंप दी. यह एक ऑफिशियल डिप्लोमेटिक लेटर था, जिसे भारत के प्रधानमंत्री ने ईरान भेजा था.
अगले कई घंटों तक दिनेश सिंह ने ईरान के अधिकारियों को कश्मीर के हालात के बारे में जानकारी दी. उन्होंने राष्ट्रपति रफसंजानी, वेलायती और मजलिस अध्यक्ष नाटेक नूरी से भी मुलाकात की और उन्हें पूरी बात समझाई. दिन भर की मुलाकात के बाद दिनेश सिंह दिल्ली की फ्लाइट में थे. यहां से वो सीधे एम्स पहुंचे, लेकिन उनके पहुंचने से पहले ही दिल्ली में ईरान से एक संदेशा पहुंच गया था, जिसका नरसिंह राव 72 घंटे से इंतजार कर रहे थे.
इस संदेश में प्रधानमंत्री नरसिंह राव को आश्वासन दिया गया था कि ईरान भारत को नुकसान से बचाने के लिए हर संभव कोशिश करेगा.
ईरान ने वही किया भी. जिनेवा में संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद की बैठक में पाकिस्तानी दूत ने कश्मीर में मानवाधिकार उल्लंघन को लेकर भारत के खिलाफ निंदा प्रस्ताव आगे बढ़ाने की कोशिश की. लेकिन ईरान के प्रतिनिधि ने इसका समर्थन करने से इनकार कर दिया. तर्क दिया गया कि ईरान भारत और पाकिस्तान दोनों का दोस्त है और वह नहीं चाहता कि दोनों देशों के बीच के इस मामले को सुलझाने में औपनिवेशिक शक्तियां (पश्चिमी देश) दखल दें. ईरान के वीटो लगाते ही यह प्रस्ताव गिर गया. इस तरह से ईरान की दोस्ताना मदद से भारत एक बड़े संकट को टालने में सफल रहा.
हालांकि, कहा जाता है कि इसके नतीजे में पाकिस्तान के ईरान के संबंध जरूर खराब हो गए. उसने ईरान के इस कदम की कड़ी निंदा की और इसे ‘विश्वासघात’ बताया.
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