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इस सैटेलाइट से अमेरिका के धुर्रे उड़ा दिए, तो ईरान ने ऐसे किए थे US बेस पर सटीक हमले

लीक हुए डाक्यूमेंट्स से पता चलता है कि ईरान को सैटेलाइट इमेजरी किसी दूसरे देश ने नहीं दी. बल्कि ईरान को तो किसी के पास जाने की जरूरत ही नहीं. अब ईरान के पास खुद का सैटेलाइट है. TEE-01B नाम के इस सैटेलाइट को चीनी कंपनी - अर्थ आई (Earth Eye) - ने बनाया और लॉन्च किया था. बाद में इसे इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कोर (IRGC) की एयरोस्पेस फोर्स ने अपने कब्जे में ले लिया.

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16 अप्रैल 2026 (अपडेटेड: 16 अप्रैल 2026, 09:52 AM IST)
iran bought its own satellite for irgc aerospace force used to track us military
ईरान के पास अब उसकी अपनी सैटेलाइट है (PHOTO-Novaspace, X)
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ईरान ने मिडिल-ईस्ट में मौजूद अमेरिकी ठिकानों पर ताबड़तोड़ और सटीक हमले किए. लेकिन सवाल ये कि उसे अमेरिकन मिलिट्री ठिकानों की इतनी पुख्ता लोकेशन मिली कैसे? जवाब है 'सैटेलाइट'. खबर आई है कि तमाम प्रतिबंधों को ठेंगा दिखाते हुए ईरान ने एक सैटेलाइट खरीदा है.

फाइनेंशियल टाइम्स के हाथ कुछ ऐसे दस्तावेज लगे हैं जिनका ताल्लुक ईरानी मिलिट्री से है. इन लीक हुए डाक्यूमेंट्स से पता चलता है कि ईरान को सैटेलाइट इमेजरी किसी दूसरे देश ने नहीं दी. बल्कि ईरान को तो किसी के पास जाने की जरूरत ही नहीं. अब ईरान के पास खुद का सैटेलाइट है. TEE-01B नाम के इस सैटेलाइट को चीनी कंपनी - अर्थ आई (Earth Eye) - ने बनाया और लॉन्च किया था. बाद में इसे इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कोर (IRGC) की एयरोस्पेस फोर्स ने अपने कब्जे में ले लिया.

अर्थ आई एक ऐसे एक्सपोर्ट मॉडल के तहत काम करती है जिसे "इन-ऑर्बिट डिलीवरी" कहा जाता है. इस मॉडल के तहत, चीन से लॉन्च किए गए स्पेसक्राफ्ट को विदेशी खरीदारों को तभी सौंपा जाता है, जब वे सफलतापूर्वक अपनी ऑर्बिट में पहुंच जाते हैं. रिपोर्ट के मुताबिक, ईरानी कमांडरों ने इस सैटेलाइट को इस इलाके में मौजूद अमेरिका के अहम मिलिट्री ठिकानों पर नजर रखने का काम सौंपा था. इसी कड़ी में IRGC को इम्पोसैट (Emposat) द्वारा चलाए जा रहे कमर्शियल ग्राउंड स्टेशनों के नेटवर्क तक पहुंच भी दी गई थी. इम्पोसैट बीजिंग की एक सैटेलाइट सर्विस देने वाली कंपनी है, जिसका काम एशिया, लैटिन अमेरिका और उससे भी आगे तक फैला हुआ है.

चीन के सैटेलाइट से कहां-कहां की लोकेशन निकाली?

कहा जा रहा है कि इस सैटेलाइट ने 13, 14 और 15 मार्च को सऊदी अरब के प्रिंस सुल्तान एयर बेस की तस्वीरें ली थीं. इसके एक दिन बाद, 14 मार्च को, प्रेसिडेंट ट्रंप ने माना कि वहां तैनात अमेरिकी विमानों को नुकसान पहुंचा है. रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि TEE-01B ने उसी समय जॉर्डन के मुवफ्फक साल्टी एयर बेस, बहरीन के मनामा में अमेरिकी 5th फ्लीट मुख्यालय और इराक के एरबिल हवाई अड्डे के आसपास भी नजर रखी.

इसकी निगरानी का दायरा और भी आगे तक फैला हुआ था, जिसमें कुवैत में कैंप ब्यूहरिंग और अली अल सलेम एयर बेस, जिबूती में कैंप लेमोनियर, और ओमान में दुक्म एयरपोर्ट जैसी अमेरिका से जुड़ी फैसिलिटीज शामिल थीं. इसने खाड़ी देशों में सिविलियन इंफ्रास्ट्रक्चर की भी निगरानी की, जिसमें यूएई में खोर फक्कन कंटेनर बंदरगाह और किदफा पावर एंड डिसैलिनेशन सेंटर, और बहरीन का अल्बा एल्यूमीनियम प्लांट शामिल है. इस मामले पर जानकारी देते हुए एक पूर्व वरिष्ठ वेस्टर्न देश के खुफिया अधिकारी कहते हैं,

‘ऐसा हो ही नहीं सकता कि कोई चीनी कंपनी, सरकार में किसी की मंजूरी के बिना सैटेलाइट लॉन्च करने जैसा कोई काम कर सके. मुझे लगता है कि यह काफी समय से बिल्कुल साफ है कि चीन खुफिया जानकारी के मामले में ईरानियों की मदद कर रहा है, लेकिन वह अपनी सरकार की भूमिका को छिपाने की कोशिश कर रहा है.’

चीन के विदेश मंत्रालय ने हाल के दिनों में बार-बार इस बात से इनकार किया है कि वह ईरान को किसी भी तरह की सैन्य मदद दे रहा है. अमेरिकी सरकार के अनुसार, चीन लंबे समय से ईरान के बैलिस्टिक मिसाइल प्रोग्राम को सपोर्ट कर रहा है. वो उसे ऐसे पुर्जों की मदद देता रहा है, जिनका इस्तेमाल मिसाइल बनाने में किया जा सकता है.

वीडियो: दुनियादारी: ईरान से ट्रंप का गंदा खेल जारी?

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