सरल शब्दों में पढ़ें, मोदी ने अमेरिका में क्या उखाड़ा
मनमोहन के काम को मोदी ने एक स्टेप आगे बढ़ाया. अब भारत NSG में जा सकता है.
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लल्लनटॉप
8 जून 2016 (अपडेटेड: 8 जून 2016, 12:37 PM IST)
भ्रमण गुरु मोदी जी इतनी प्रचण्ड गर्मी में धीरे से विदेश निकल लिए. कुल 140 घंटों के लिए. 44 घंटे उड़ने में जायेंगे. बाकी मन की बात करने में. अभी तक 3 मेन मुद्दों पर तो मोदी जी ने अपनी बात मनवा ली है:
1. भारत को MTCR (मिसाइल टेक्नोलॉजी कंट्रोल रिजीम) ग्रुप में घुसने की जगह मिली. अब NSG (न्यूक्लियर सप्लायर्स ग्रुप) में जाने का रास्ता क्लियर होगा.
2. बहुत दिन से भारत को तंग कर रही कंपनी 'वेस्टिंगहाउस ' अब हमारे यहाँ 6 न्यूक्लियर रिएक्टर लगाएगी.
3. क्लाइमेट चेंज मुद्दे पर भारत को फंडिंग मिलेगी. नई टेक्नोलॉजी से प्रदूषण कम करने के लिए. ये एकदम तय नहीं है. पर कुछ पॉजिटिव है जरूर.
इन तीनों बातों को लेकर मोदी जी के विरोधी और भक्त ट्विटर पर उलझे हुए हैं. पर कोई कायदे से ये नहीं बता रहा कि मोदी जी की इन बातों का घाटा -नफा क्या है. पहले भी कुछ हुआ था या सब आज ही हो गया. हम थोड़ा डिसकस करते हैं.
क्या है ये NSG (न्यूक्लियर सप्लायर्स ग्रुप)?
न्यूक्लियर सप्लायर्स ग्रुप 48 देशों का एक समूह है जो दुनिया में न्यूक्लियर टेक्नोलॉजी और न्यूक्लियर मटेरियल के खरीद-बेच को कंट्रोल करता है. दुनिया में बहुत कम देशों के पास ये टेक्नोलॉजी और मटेरियल है. जरूरत सबको है. क्योंकि इससे सबकी बिजली-बत्ती का इंतजाम हो जायेगा. प्रदूषण भी कम होगा. तेल बेचने वालों की दादागिरी भी कम होगी.
जब इतने उत्तम विचार हैं फिर दिक्कतें कहाँ से आईं?
दिक्कत तो हमने ही शुरू की थी. मतलब भारत ने. आज़ादी के बाद यूँ था कि हमारे पास न्यूक्लियर मटेरियल के रूप में बहुत ज्यादा थोरियम और थोड़ा सा यूरेनियम था. थोरियम को डायरेक्ट न्यूक्लियर प्लांट में यूज नहीं कर सकते. यूरेनियम को कर सकते हैं. प्लान था कि 40 -50 साल में धीरे-धीरे थोरियम को यूरेनियम में बदलने की तकनीक लाएंगे और अपना कार्यक्रम दुरुस्त कर लेंगे. रूस से हमने हेल्प ली और अपने न्यूक्लियर रिएक्टर लगाने शुरू कर दिए. जो भी हमारे पास यूरेनियम था उसी से. थोड़ा बहुत इधर-उधर से ले लिया.
फिर पाकिस्तान से और चीन से हमारी लड़ाई हो गई. दिक्कत हो गई. बस हमने 'परमाणु-परीक्षण' कर लिया. मतलब जो हमारे पास था उसी से 'न्यूक्लियर हथियार' बना लिए. 1974 में. प्रोजेक्ट का कोड नाम रखा था- बुद्ध मुस्कुराये. सबके कान खड़े हो गए. तुरंत 'न्यूक्लियर सप्लायर्स ग्रुप' बनाया गया. ग्रुप बोला किसी को हमसे पूछे बगैर न्यूक्लियर मटेरियल नहीं मिलेगा.
NPT(नॉन-प्रोलिफरेशन ट्रीटी) ने दिक्कतें बढ़ा दी
न्यूक्लियर सप्लायर्स ग्रुप में शामिल होने के लिए इस पर साइन करना जरूरी हो गया. पूरी दुनिया के देश धड़ाधड़ साइन मारने लगे. हमने नहीं मारा. अपना ऐटिट्यूड है. क्योंकि ये शर्त बहुत ही जालिम थी. 5 देश अमेरिका, चीन, फ्रांस, इंग्लैंड और रूस सब कुछ रखना चाहते थे. कि हथियार सिर्फ इनके पास रहे और बाकी लोग देखते रहें. हमने मना कर दिया. फिर उन्होंने भी मना कर दिया. नहीं देंगे सामान. ले लो टेक्नोलॉजी. अब नहीं लोगे? हमारा थोरियम-यूरेनियम वाला कार्यक्रम घिसटने लगा.
कुछ ख़ास हो नहीं रहा था. अमेरिका और बाकी न्यूक्लियर देशों की दादागिरी के बावजूद बिना एनपीटी पर साइन किये 1998 में हमने पोखरण में फिर परीक्षण कर दिया. अब तो आग ही लग गयी.
मिलेनियम बदला फिर हवाओं का भी रुख बदला
दुनिया के सारे देश नॉन-प्रोलिफरेशन ट्रीटी पर साइन कर चुके हैं. सिर्फ पांच देशों - भारत, पाकिस्तान, उत्तर कोरिया, इजराइल और ईरान ने मना किया है. इन सबमें भारत का रिकॉर्ड बहुत अच्छा रहा है. हम किसी को धमकाते नहीं. पाकिस्तान धमकाता है. उत्तर कोरिया भी धमकाता है. ईरान किसी से पूछता नहीं. इजराइल किसी को कुछ बताता नहीं. हमने किसी को बेचा भी नहीं है. पाकिस्तान लीबिया को बेचते पकड़ा जा चुका है. हमारा उद्देश्य शुरू से यही रहा है- सबका साथ, सबका विकास. 2008 तक ये बात सबको समझ आ गई. अमेरिका तैयार हो गया कि न्यूक्लियर रिएक्टर बनाने में मदद करेंगे. नॉन-प्रोलिफरेशन ट्रीटी पर साइन करना जरूरी नहीं है. इस डील को सिविल न्यूक्लियर डील कहा गया.
फिर जापान ने अड़ंगा लगा दिया. क्योंकि रिएक्टर के कोर की टेक्नोलॉजी जापान से ही आती है. उनको भारत पर विश्वास नहीं है. जापान न्यूक्लियर हथियार का भुक्तभोगी देश है. उसको इग्नोर नहीं कर सकते. उधर चीन कहने लगा कि अगर भारत को मिलेगा तो पाकिस्तान को भी मिलना चाहिए. अब हम फिर फंस गए.
अब इस साल क्या हुआ है?
भारत ने लगातार सारे देशों से संपर्क साधा है. मोदी जी की हवाई यात्रायें काम आई हैं. न्यूक्लियर सप्लायर्स ग्रुप के कई देशों का सपोर्ट मिल चुका है इंडिया को. एक बैकडोर एंट्री की जगह है.
ऐसा है कि हथियारों से जुड़े तीन और मेन ग्रुप हैं-
MTCR- ये मिसाइल टेक्नोलॉजी को कंट्रोल करता है.
वासेनार अरेंजमेंट- ये छोटे और मिडिल क्लास के हथियारों की खरीद-बिक्री को कंट्रोल करता है.
ऑस्ट्रेलिया ग्रुप- ये केमिकल और बायोलॉजिकल हथियार को कंट्रोल करता है.
ओबामा ने सलाह दी कि इन ग्रुपों में शामिल होने से न्यूक्लियर सप्लायर्स ग्रुप में शामिल होने का रास्ता खुल जायेगा. तो अब MTCR में भारत की एंट्री पर सहमति से एक रास्ता खुला है.
भारत ने एक और दांव खेला है. दुनिया में क्लाइमेट चेंज को लेकर काफी बवाल चल रहा है. बड़े देश सबको सलाह दे रहे हैं कि पेट्रोल-डीजल और कोयला का कम इस्तेमाल करो. भारत ने कहा- जी बिलकुल. पर न्यूक्लियर टेक्नोलॉजी तो दे दीजिये. अँधेरे में थोड़ी रहेंगे. अब 'वेस्टिंगहाउस' कंपनी हमारे यहाँ 6 न्यूक्लियर रिएक्टर लगाएगी. तो 2008 वाले सिविल न्यूक्लियर डील का अगला स्टेप पूरा हुआ है. अभी जापान की सहमति बाकी है.
क्या हो सकता है?
24 जून को भारत के न्यूक्लियर सप्लायर्स ग्रुप में शामिल होने को लेकर चर्चा होगी. अगर चीन ने अड़ंगा नहीं लगाया तो मामला क्लियर है. शामिल हो जायेंगे. फिर पाकिस्तान बोलेगा कि बड़े भाई को सीट दिया, हमको भी दो. तो थोड़ी मौज ली जाएगी. क्योंकि हमसे बिना पूछे उसको कुछ नहीं मिलेगा.
मजाक के अलावा बहुत ही तगड़े फायदे भी हैं. राजनीतिक और आर्थिक दोनों-
1. NSG में शामिल होने के बाद भारत यूएन की सुरक्षा परिषद में अपनी उम्रभर की सदस्यता मांगेगा. सिर्फ पांच देशों को ही वीटो पावर नहीं मिलना चाहिए. भारत ये स्टेटस डिजर्व करता है.
2. न्यूक्लियर मटेरियल और टेक्नोलॉजी को बांटने में भारत की मंजूरी ली जाएगी.
3. हमारी गाँव-गाँव तक बिजली पहुँचाने की योजना सही में पूरी होगी.
4. भारत अगर फिर हथियार बना ले तो विरोध तो होगा पर मुंहां-मुंही. बिज़नेस नहीं रोक देंगे. 1998 के बाद तो बहुत दिक्कत हो गई थी.
5. साउथ एशिया में चीन के साथ भारत भी बराबरी में खड़ा रहेगा.
हमारा उत्साह तो देखने लायक है. पर सब कुछ हो नहीं गया है. कुछ हुआ है. कुछ बाकी है. सारे 48 देशों का सपोर्ट चाहिए. अगर चीन ने ना कर दिया तो फिर सब स्वाहा!