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5 दिन तक समुद्र में भटके भारतीय मछुआरे को बांग्लादेशियों ने बचाया

मछुआरे को बचाने का वीडियो बताता है कि देश, धर्म,जाति से ऊपर इंसानियत है

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2 अगस्त 2019 (अपडेटेड: 2 अगस्त 2019, 03:01 PM IST)
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फोटो - thelallantop
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कहते हैं कि इंसान को सबसे ज्यादा हिम्मत तब मिलती है, जब वह ज़िंदगी और मौत के बीच कहीं फंसा होता है. अपनी जान बचाने के लिए वह कुछ भी करता है. ये कहानी है ऐसे ही एक मछुआरे की, जिसने असंभव सी लगने वाली ज़िंदगी की जंग जीत ली. वो भी समुद्र और उसकी लहरों से लड़कर. रविंद्रनाथ दास. पश्चिम बंगाल के 24 परगना जिले के नारायणपुर के रहने वाले हैं. अपने 14 साथियों के साथ समुद्र में मछली पकड़ने निकले थे. समुद्र की ऊंची लहरों से नाव का सामना हुआ और नाव डूब गई. बाकी लोग समुद्र में डूब गए. लेकिन रविंद्र ने हार नहीं मानी. जिंदगी के लिए लड़े. सहारा बना तेल का खाली ड्रम और बांस. 5 दिनों तक समुद्र की लहरों का सामना किया. और फिर उन्हें दिखी एक बांग्लादेशी नाव. नाव सवारों ने रविंद्रनाथ दास का रेस्क्यू किया. और इस रेस्क्यू ऑपरेशन को जिसने भी देखा, दिल पसीज गया. रवींद्र ने अपनी आपबीती बताई.
'6 जुलाई को समुद्र में तेज तूफान आया. और मेरी नाव पलट गई. मेरे साथी समुद्र में कूद गए. तीन की मौत नाव के नीचे आने से हो गई. बाकी जो बचे, वो डूब गए. लेकिन मैंने हिम्मत नहीं हारी. पांच दिनों तक कुछ नहीं खाया. खाने को कुछ था ही नहीं. इसलिए बस पानी पीया.
चारों तरफ पानी से घिरे रहने के बाद भी रविंद्र की प्यास बादलों ने बुझाई. जब बारिश होती तो वही पानी पी लेते. रविंद्र के लिए ये पांच दिन बेहद मुश्किल भरे थे. उन्होंने कहा,
सोचता था कि मेरी मौत जल्द हो जाएगी, लेकिन फिर जीने की चाह मुझे हिम्मत दे देती थी. 10 जुलाई को मैंने चिटगांव के पास बांग्लादेश का जहाज देखा. मुझे उम्मीद बंधी. मैं दो घंटे की कड़ी कोशिश के बाद उसके पास तक पहुंचा इसके बाद मुझे मदद मिली.
रविंद्र को अपने भतीजे को नहीं बचाने का अफसोस है. बचाव से केवल तीन घंटे पहले उसकी मौत हो गई. रविंद्र के लिए फरिश्ता बने बांग्लादेश के जहाज पर सवार लोग. उन्हें चित्तागोंग तट से रेस्क्यू किया गया था. इसके बाद उन्हें इलाज के लिए कोलकाता लाया गया.
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