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इंडिया 11 - 0 पाकिस्तान

इंडिया और पाकिस्तान की 11वीं मुलाक़ात. वर्ल्ड कप में. इंडिया फ़िर जीता. मैच रिपोर्ट.

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फोटो - thelallantop
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केतन बुकरैत
19 मार्च 2016 (अपडेटेड: 19 मार्च 2016, 03:04 AM IST)
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मैच शुरू होने का टाइम आया तो बारिश आ चुकी थी. लोग छाते की बजाय घर से तिरंगा लेके आये थे. चेहरे पर लगा तीन रंगों का पेंट धुलने को नहीं लगाया था. इन्द्रदेव को भी सुननी पड़ी. अरे सुननी क्या, माननी पड़ी. कलकत्ता की ज़मीन थी. कोई मज़ाक की बात नहीं थी. कलकत्ता यानी वो पिच जहां बाबू मोशाय सौरव गांगुली खेलते थे. जहां से जगमोहन डालमिया आते थे. जहां की बोली सुनते ही कानों में शहद घुलने लगता है. जहां का रसगुल्ला खाते ही डायबिटीज़ पछाड़ें मार के रो देता है. जहां पीली टैक्सी में घूमते हुए किशोर दा के गाने सुनते हुए आपको मालूम चल जाता है कि जन्नत आखिर होती क्या है. जहां की दुर्गा पूजा पूरे इंडिया में वर्ल्ड फेमस है. जहां की ट्राम वहां के दिल की धड़कन है. ईडेन गार्डन. इंडिया बनाम पाकिस्तान. जानते हो क्या होता है? ईडेन पर एक भी मैच में नहीं जीता था इंडिया पाकिस्तान से. लेकिन ये भी तो था कि वर्ल्ड कप में इंडिया हारा नहीं था पाकिस्तान से. लेकिन बारिश मानने को नहीं तैयार थी. मैच शुरू होने के टाइम पिच पे कवर पड़े हुए थे. मैच शुरू हुआ घंटे भर देरी से. 18 ओवर एक साइड को मिले. 4 गेंदबाज 4-4 ओवर फेंक सकते थे. माने एक कोई 2 फेंकेगा. ये रूल थे मैच के. मैच के पहले इमरान खान आते हैं, सचिन तेंदुलकर, ममता दी, अमितावच्चन आते हैं. सचिन ने क्या कहा, सुनाई नहीं दिया. पब्लिक उनका नाम सुनते ही पागल हो जाती है. शोर मचाती है. टॉस के वक़्त सौरव दादा आये. ट्रॉफी हाथ में लेके. इमोशनल मोमेंट था. सौरव गांगुली वो जिसने इंडिया को जीतने की आदत डलवाई. जिसने सीना तान के सामने वाले प्लेयर से कभी कहा था कि पिच के आस पास भी आया तो कहानी पैक कर दूंगा. श्री लंका के खिलाफ़ मैच था. रसेल फर्नान्डो को बोला था. वो पिच पे चल रहा था. जिसने लॉर्ड्स में नेटवेस्ट जीतने पर टीशर्ट निकाल कर सालों पुरानी दुश्मनी निकाली थी. फ्लिंटॉफ़ से. वो सौरव गांगुली हाथ में ट्रॉफी लेके अमिताभ बच्चन और शफ़कत अमानत अली खान को लीड कर रहा था. मैच में अमानत ने पाकिस्तान का और अमिताभ बच्चन ने इंडिया का राष्ट्रगान गाया. शरीर के रोंगटे खड़े हो जाते हैं 'जय जय जय जय हे!' सुनते और गाते हुए. आज भी खड़े हुए. अमितावच्चन की आवाज़ में कुछ और ही लगता है राष्ट्रगान. ये जो भी बहसबाजी चल रही है न आज कल, इन सभी को ले आओ. और समझाओ कि ऐसे निकलता है दिल से 'भारत माता की जय!' मैच शुरू हुआ. इंडिया बॉलिंग कर रहा था पहले. टीम का एक प्लेयर जिसका मज़ाक उड़ाती है फेसबुक और ट्विटर की जनता, गेंद फेंक रहा था. सारे मज़ाकों से दूर. भरे स्टेडियम के सामने. स्टेडियम क्या, करोड़ों आँखों के सामने. लोग कहते थे कि ये इतने पुराने हैं कि इनको मैच फ़ीस नहीं पेंशन मिलती है. लेकिन इन्होंने ये बताया कि एक्सपीरियंस आखिर होता क्या है. अच्छा और बुरा एरिया होता क्या है. लेंथ क्या होती है और लाइन किसे कहते हैं. पहले ओवर में मात्र तीन रन. दो लेंथ बाल बाकी सभी गेंदों में कोई रूम नहीं. आशीष नेहरा. 17 साल से इंडिया के लिए गेंद फेंक रहा एक चेहरा. अगला ओवर अश्विन. पाकिस्तान छोड़ो, इंडिया के प्लेयर्स की भी आँखें चौंधा गयी होंगी. बॉल ऐसे टर्न हो रही थी जैसे उसका बैट्समैन के पास जाने का मन ही नहीं था. मुंह के सामने से गेंद घूमे जा रही थी. उसके बाद से तो बस स्पिनर्स का झोंका चालू हो गया. इधर आश्विन उधर जडेजा. आश्विन के 3 ओवर हो गए तो रैना आ गया. रैना ने आते ही चौथी गेंद पर शरजील खान को पांड्या के हाथों कैच कराया और वहां से इंडिया की बोहनी शुरू हुई. इंडिया को ये मैच जीतना वाकई ज़रूरी था. अगर ये मैच हार जाते तो वर्ल्ड कप की ये रेस इंडिया के लिए ख़तम थी. हालांकि धोनी की रणनीति में एक दो खामियां ज़रूर थीं लेकिन फिर भी बुमराह ने आखिरी ओवर में कसी गेंद फेंक कर पाकिस्तान को 118 पे रोक लिया. हर कोई जानता था कि पाकिस्तान के 120 पार करते ही इंडिया की मुसीबतें शुरू हो जातीं. 61,337 लोगों के सामने इंडिया 119 रन बनाने उतरा. कोहली का कहना था कि एक बेहतरीन प्लेयर को खराब पिचों की सबसे ज़्यादा ज़रुरत होती है. कोहली को वही मिला. रोहित शर्मा जल्दी में निकलते बने और कोहली ने एंट्री मारी. वही रौब. वही क्लास. कोहली को न्यूज़ीलैंड की हार ने 'हर्ट' किया था. हम घर की पिच पर ऐसा परफॉर्म नहीं करते. ऐसा कहा था कोहली ने मैच खतम होने के बाद. साफ़ था कि उसे वो हार खटक रही थी. लिहाज़ा बैटिंग करते वक़्त ये सब कुछ दिमाग में चल रहा था. कोहली ने पाकिस्तान के खिलाफ़ पचास पूरा करने के लिए जो भी शॉट्स खेले, वो ये बताते हैं कि लड़का रन बनाने को नहीं, गेम जीतने को बल्ला चलाता है. दो कवर ड्राइव. बल्ला कहीं भी शरीर से दूर नहीं. इस पिच पर जैसा खेलना चाहिए, एकदम वैसा. जितनी देर के लिए वो क्रीज़ पे था, उतनी देर तक पाकिस्तान हारता गया. ऐसा लग रहा था जैसे रामायण का किष्किन्धा काण्ड चल रहा हो और बालि अपने सामने वाले की ताकत खैंचता जा रहा हो. कोहली बैटिंग कर रहा था और सचिन खड़े होके तिरंगा लहरा रहे थे. सचिन वो जिन्हें 2003 के वर्ल्ड कप में पाकिस्तान के खिलाफ़ मैच में मैन ऑफ़ द मैच डिक्लेयर करने के बाद मैदान में मौजूद पब्लिक को चुप करवाना पड़ा था. वैसे जानकारी के लिए बता दूं कि सचिन को क्रिकेट का भगवान कहते हैं. भले ही पहली इनिंग्स में अश्विन और जडेजा ने गेंदें घुमाई हों, लेकिन कोहली के फुटवर्क और युवराज के पेशेंस ने खूब साथ निभाया. बैट पे पड़ने वाले किनारे खाली ज़मीन पे गिर रहे थे. पहली इनिंग्स में जडेजा अपनी रेगुलर गेंद नहीं फेंक पा रहे थे क्यूंकि उनकी सीधी गेंदें भी टर्न हो रही थीं. उन्हें खुद इसका विश्वास नहीं हो रहा था. बैटिंग में डर का समय सिर्फ उस वक़्त आया था जब मोहम्मद शमी ने धवन और रैना को 2 गेंदों में ही आउट कर दिया. ऐसा लग रहा था कि शमी तुरुप का इक्का साबित होंगे लेकिन युवराज ने दूसरे पूंजाबी कोहली के साथ टिक कर ये बता दिया कि "पंजाबियां दी शान वखरी!"   *more to follow*

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