शहबाज शरीफ ने चीन पहुंचते ही 'कश्मीर' का राग अलापा, भारत ने दोनों को जमकर सुनाया
चीन दौरे के बाद जारी बयान में पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने चीन को जम्मू-कश्मीर के हालात के बारे में बताया. इसके बाद चीन ने कहा कि कश्मीर का मुद्दा बहुत पुराना है और इसे शांति से बातचीत के जरिए सुलझाया जाना चाहिए. चीन ने कहा कि इस मामले में UN के नियमों और भारत-पाकिस्तान के बीच हुए समझौतों का पालन होना चाहिए.

कश्मीर पर चीन और पाकिस्तान की नई बयानबाजी ने एक बार फिर पुराने विवाद को हवा दे दी है. पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ की चीन यात्रा के बाद जारी ज्वाइंट स्टेटमेंट में दोनों देशों ने कश्मीर को ‘इतिहास से बचा हुआ मुद्दा’ बताया. इस पर भारत ने भी बिना किसी नरमी के साफ संदेश दे दिया कि जम्मू-कश्मीर और लद्दाख भारत का अभिन्न हिस्सा थे, हैं और रहेंगे. इस मसले में किसी तीसरे देश की दखलअंदाजी बर्दाश्त नहीं की जाएगी.
चीन और पाकिस्तान ने अपने बयान में क्या कहा?चीन दौरे के बाद जारी बयान में पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने चीन को जम्मू-कश्मीर के हालात के बारे में बताया. इसके बाद चीन ने कहा कि कश्मीर का मुद्दा बहुत पुराना है और इसे शांति से बातचीत के जरिए सुलझाया जाना चाहिए. चीन ने कहा कि इस मामले में UN के नियमों और भारत-पाकिस्तान के बीच हुए समझौतों का पालन होना चाहिए. पाकिस्तान और चीन का ये बयान 26 मई को आया. असल में पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ 23 से 26 मई तक चीन के दौरे पर थे. इस दौरान शहबाज शरीफ की मुलाकात चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग और प्रधानमंत्री ली च्यांग से हुई. दोनों देशों ने कहा कि उन्होंने चीन-पाकिस्तान की 'हर मौसम में साथ निभाने वाली रणनीतिक साझेदारी' को और मजबूत करने पर सहमति बनाई है.

शहबाज शरीफ ने दोनों देशों के बीच राजनयिक रिश्तों के 75 साल पूरे होने के कार्यक्रम में भी हिस्सा लिया. बयान में कहा गया कि पाकिस्तान ने चीन को जम्मू-कश्मीर के हालात के बारे में जानकारी दी है. इसके बाद चीन ने कहा कि कश्मीर मुद्दे को UN चार्टर के मुताबिक सुलझाया जाना चाहिए.
चीन और पाकिस्तान ने Transboundary Water Resources Cooperation पर भी साथ काम करने की चाहत जताई. हालांकि, इस पर पूरा ब्योरा नहीं दिया गया है क्योंकि चीन और पाकिस्तान के बीच बहने वाली कई नदियां भारतीय इलाके से होकर गुजरती हैं.
जॉइंट स्टेटमेंट पर भारत ने क्या कहा?चीन और पाकिस्तान के ज्वाइंट स्टेटमेंट पर भारतीय विदेश मंत्रालय का भी जवाब आया है. विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने इस मुद्दे पर जवाब दिया है. उन्होंने कहा,
‘भारत जम्मू-कश्मीर को लेकर चीन और पाकिस्तान के संयुक्त बयान में की गई बेवजह टिप्पणियों को पूरी तरह खारिज करता है. जम्मू-कश्मीर और लद्दाख भारत के अभिन्न और अटूट हिस्से थे, हैं और हमेशा रहेंगे.’
भारत ने ये भी कहा कि कश्मीर पर उसका रुख हमेशा से साफ रहा है और दुनिया ये जानती है. ऐसे में किसी दूसरे देश का इस मामले पर कमेंट करना ठीक नहीं है. मामला सिर्फ कश्मीर तक नहीं रुका. भारत ने चीन-पाकिस्तान इकनॉमिक कॉरिडोर यानी CPEC पर भी आपत्ति जताई. विदेश मंत्रालय ने कहा कि CPEC के कुछ प्रोजेक्ट भारत की उस जमीन पर बनाए जा रहे हैं, जिस पर पाकिस्तान ने गैरकानूनी कब्जा कर रखा है. उन्होंने कहा कि भारत ऐसे किसी भी कदम का विरोध करता है, जो पाकिस्तान के कब्जे को वैध दिखाने की कोशिश करे. CPEC के मामले में रणधीर जायसवाल ने कहा,
‘CPEC के कुछ प्रोजेक्ट भारत की संप्रभु जमीन पर हैं. भारत ऐसे सभी प्रयासों का विरोध करता है और खारिज भी करता है, जो पाकिस्तान के अवैध कब्जे को मजबूत करने की कोशिश करते हैं.’
रणधीर जायसवाल ने आगे कहा कि भारत ने 1963 में चीन और पाकिस्तान के बीच हुए सीमा समझौते को कभी मान्यता नहीं दी.
नदियों के पानी पर समझौता, भारत की आपत्तिइसके अलावा चीन और पाकिस्तान ने अपने बयान में Transboundary Water Resources Cooperation की बात भी की थी. इस पर भी भारत ने सवाल उठाया. विदेश मंत्रालय ने कहा कि जब चीन और पाकिस्तान की साझा सीमा ही नहीं है, तो फिर Transboundary Water Resources Cooperation जैसी बात का सवाल ही नहीं उठता.

इस पूरे बयान से साफ दिख रहा है कि चीन एक बार फिर पाकिस्तान के साथ मजबूती से खड़ा नजर आ रहा है. कश्मीर और पानी जैसे मुद्दों का जिक्र करके चीन अपने पुराने साथी पाकिस्तान को खुश करने की कोशिश करता दिख रहा है. कुल जमा बात ये है कि चीन-पाकिस्तान के बयान में कश्मीर, CPEC और पानी के मुद्दों पर जो बातें कही गईं, भारत ने उन सभी पर एक-एक करके सख्त जवाब दिया. संदेश साफ था कश्मीर पर भारत का स्टैंड नहीं बदला है, और इस मामले में किसी तीसरे देश की दखलअंदाजी मंजूर नहीं है.
इन सबके बीच बीते दिनों ये भी खबरें आईं कि चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग सितंबर में नई दिल्ली में आयोजित होने वाले ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में शामिल हो सकते हैं. अगर ये दौरा होता है, तो 2020 की गलवान घाटी की झड़प और दोनों देशों के बीच उपजे तनाव के बाद, करीब 7 साल में उनकी यह पहली भारत यात्रा होगी.
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