"जब सचिन को एल्बो इंजरी हुई तो हल्का बल्ला मैंने बनाया"
क्रिकेट के मैदान पर तो बहुत देखे हैं. मगर उनके पीछे काम करने वाले कभी देखे हैं? कभी जाना है उनके बारे में? वो भी उतनी ही मेहनत करते हैं.
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फोटो - thelallantop
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हर प्लेयर की बात होती है. विराट की हो रही है, सचिन की होती थी, द्रविड़ की होती थी, गांगुली की होती थी. लेकिन हम कभी उस मेहनत को नोटिस नहीं करते जो पर्दे के पीछे चल रही होती है. इन सभी प्लेयर्स की मेहनत के पीछे की मेहनत. कभी सोचा है सचिन के बल्ले के बारे में? वो बल्ला जो बड़े बड़े अहंकारों को सेकण्ड के अन्दर बाउंड्री के पार भेज देता था. वो बल्ला जिसके एक प्रहार से पाकिस्तान वर्ल्ड कप के बाहर हो गया. वो बल्ला जिससे दुनिया को वन-डे मैचों का पहला दोहरा शतक मिला. वो बल्ला जिससे पार पाने में बड़े-बड़े सूरमाओं की जिंदगियां निकल गयीं. उस बल्ले को बनाता कौन है? अगर सचिन को अमुक भार का बल्ला पसंद है तो आखिर इसका ध्यान कौन रखता है?
सौरव गांगुली. रात को बुखार में तड़प रहा है. अगले दिन मैच है. अपने परिवार से बात करने के बाद किसे फ़ोन करता है. किसपर विश्वास जताता है कि फलाना शख्स मुझे मैच के लिए फ़िट बना सकता है.
क्रिकेट की विज्डन की किताब. तमाम रिकॉर्ड्स उसमें शामिल रहते हैं. लोगों को पहचान मिलती है. लेकिन ये कौन है जो इन सबपर नज़र रखता है. कौन है जो नए लड़कों को लेजेंड्स के बीच जगह देता है. जो उनके रिकॉर्ड्स को मापता है, और करीने से सजाता है. ऐसे जैसे कैबिनेट में ट्रॉफियां सजी हुई हों.
टीवीएस लेकर आया है ऐसे लोगों की कहानी. अपने नए ऐड में. इसमें शामिल है वो शख्स जिसने 10 साल तक इंडियन क्रिकेट टीम को एक्यूपंक्चर और मसाज दिया. अगले दिन खेलने लायक बनाया. प्रकाश धातोंडे हैं जो स्टैट्स इकट्ठे करते रहे हैं. मोबिन शेख हैं जो प्रणव धनावड़े को ट्रेन करते हैं और एक इनिंग्स में सबसे ज़्यादा रन बनाने का रिकॉर्ड अपने नाम रखते हैं. राम भंडारी हैं जिनके बनाये बल्लों से तेंदुलकर, द्रविड़ खेलते थे और विराट कोहली अब भी खेलते हैं.
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