'डूगना लगैन भरना परेगा.'फिल्म 'लगान' में ब्रिटिश अफसर का ये हिंदी एक्सेंट आप भूले नहीं होंगे. अंग्रेजोंको हिंदी नहीं आती और आती है तो उनका लहजा खराब होता है. भारत में ज्यादातर लोग यहीसोचते हैं. लेकिन यह धारणा टूटती है जब आप इयान वूलफर्ड के ट्वीट्स देखते हैं.ऑस्ट्रेलिया के इस बंदे ने ट्विटर पर अपनी शानदार हिंदी से तहलका मचा रखा है.अमेरिकी मूल के इयान वूलफर्ड ऑस्ट्रेलिया की ला ट्रोब यूनिवर्सिटी में हिंदी केलेक्चरर हैं. उनका ट्विटर हैंडल है @iawoolford, जिससे वह हिंदी में ट्वीट करते हैं. यहां उनके करीब साढ़े 11 हजार फॉलोअर हैं.हिंदी के मशहूर लेखक फणीश्वरनाथ रेणु पर उनकी किताब आने वाली है. कभी वह अकबरइलाहबादी के जन्मदिन पर उनका शेर ट्वीट करते हैं तो कभी बच्चन की पंक्तियां याददिलाते हैं. उनके ज्यादातर ट्वीट्स हिंदी साहित्य से ही जुड़े होते हैं. लेकिनइंडियन डिशेज और भारत के राजनीतिक मसलों पर भी इक्का-दुक्का कमेंट से भी वह गुरेजनहीं करते. उनका सेंस ऑफ ह्यूमर भी कमाल का है.इयान वूलफर्ड का हिंदी उच्चारण ऐसा है कि ऑडियो सुनेंगे तो लगेगा ही नहीं कि कोईअंग्रेज है. दिलचस्पी बढ़ी तो हमने इयान से संपर्क किया और उनसे यह बातचीत ईमेल केजरिये की. आपको यह भी बता दें कि हमारे ज्यादातर सवालों के जवाब उन्होंने खुद हिंदीमें लिखकर भेजे.https://www.youtube.com/watch?v=A4YneE-jbI4पढ़िए, इयान से हुई बातचीत:ऑस्ट्रेलिया में रहने वाला एक अमेरिकी शख्स हिंदी पर कैसे मोहित हो गया? शुरुआतकैसे हुई? हिंदी से जुड़ाव बचपन से रहा. मां हेलेन मायर्स म्यूजिक साइंटिस्ट हैं औरप्रवासी भारतीय कम्युनिटीज में संगीत पर रिसर्च करती हैं. बचपन में उनके साथत्रिनिदाद, फिजी और मॉरीशस गया. भारत भी गया. 12 की उम्र में मां ने मेरा दाखिलात्रिनिदाद के एक स्कूल में कराया. वहां स्कूली दोस्तों के साथ भजन और लोकगीत गातेहुए हिंदी पढ़ना शुरू किया.कॉर्नेल युनिवर्सिटी से ग्रेजुएशन के दौरान मैंने हिंदी की औपचारिक पढ़ाई शुरू की.संगीत और एशियन स्टडीज मेरा 'मेन सब्जेक्ट' था. संगीत अब भी मेरे लिए बहुत मायनेरखता है. असल में, कुछ समय के लिए मैं ऑपरा गायक बनना चाहता था. ऑस्ट्रेलिया आने केकुछ ही समय पहले मैंने इंडियन म्यूजीशियन वनराज भाटिया के साथ काम किया जब वेन्यूयॉर्क आए थे.https://twitter.com/iawoolford/status/671305568892534784हिंदी के लिए मेरे आकर्षण की वजह है संगीत और प्रदर्शन की मेरी चाह. भारत में कवितापढ़ने के लिए नहीं, गाने कि लिए होती है. यह एक परफॉर्मेंस है. मैंने यह कॉर्नेलमें अपनी बीए के दौरान प्रोफेसर कॉनी फेयरबैंक्स और प्रोफेसर मेहर फारूकी से सीखा.हिंदी भाषा और साहित्य में एमए और पीएचडी अमेरिका की यूनिवर्सिटी ऑफ टेक्सस से की.यहां मेरा तआरुफ फणीश्वरनाथ रेणु की रचनाओं से हुआ— जैसे कि ‘तीसरी कसम’ और ‘मैलाआंचल’. इसके बाद मैंने भारत में बहुत समय बिताया जिसमें जयपुर के अमेरिकनइंस्टिट्यूट ऑफ इंडियन स्टडीज का हिंदी प्रोग्राम शामिल था. वहां मैंने डॉ एएनसिंह, विधु चतुर्वेदी, सईद अयुब, और नीलम बोहरा सिंह से हिंदी सीखी. भारत के हिंदीविशेषज्ञों की अद्भुत टीम के बिना मैं वहां नहीं होता, जहां आज हूं. पसंदीदा भारतीयफिल्में: लगान, कुछ कुछ होता है, रंग दे बसंती, श्री चार सौ बीस मैंने अमेरिका कीयूनिवर्सिटी ऑफ़ टेक्सास, कोर्नेल युनिवर्सिटी, और सिराक्यूज़ युनिवर्सिटी में हिंदीपढ़ाई है. दो साल पहले मैं ऑस्ट्रेलिया आया और मेलबोर्न की लाट्रोब युनिवर्सिटी मेंहोंदी प्रोग्राम के निर्देशक और व्याख्यता का पद हासिल किया. ऑस्ट्रेलिया अप इसविचार से जागृत हो रहा है कि दुनिया में रहने के लिए सिर्फ अंग्रेजी भाषा काफ़ीनहीं है.अपनी मुंहबोलियों सालियों संग इयान की होलीआप फणीश्वर नाथ रेणु पर किताब लिख रहे हैं. उनसे आकर्षण की कहानी क्या है? मैंनेउत्तरी-पूर्व बिहार में रेणु के गांव में अपनी पीएचडी का थीसिस लिखा. मैं रेणु केलोकगीत के प्रति गहरे प्यार से बड़ा मोहित था. 'मैला आंचल' पढ़ने के बाद जिसमें सौसे ज़्यादा लोकगीत शामिल है, मैं रेणु के गांव जाकर देखना चाहता था. बिहार में इतनेअच्छे लोगों ने मेरा स्वागत किया. तब से मैं वहां के कलाकारों के साथ काम करने जातारहता हूं.https://twitter.com/iawoolford/status/543745199084548096आपके पसंदीदा हिंदी लेखक, कवि और शायर कौन से हैं? किन्हें ज्यादा पढ़ते हैं? इसकाजवाब रोज़ बदलता रहेगा. मेरे लिए रेणु जी हिंदी लेखकों में से हमेशा प्रथम रहेंगे.उनके बाद जो लेखक मन में आते हैं वे हैं हरिशंकर परसाई. वे इतने महान व्यंगकार थेऔर उनके बहुत सारे लेख आज भी प्रासंगिक है. सिर्फ भारत में नहीं बल्कि अन्य देशोंमें भी. मेरे छात्रों को उनकी कहानियां बहुत पसंद है— जैसे कि ‘चूहा और मैं’ और‘भेड़ और भेड़िया’. मेरे छात्रों को ऑस्ट्रेलिया के राजनीतिक हालात से इसकी तुलनाअहम लगती है.रेणु की पत्नियों लतिका और पद्मा के साथ इयान. दोनों का देहांत हो चुका है.महादेवी वर्मा भी मुझे पसंद हैं. उनकी कविता ‘जो तुम आ जाते एक बार’ एक मास्टरपीसहै. 'कितनी करुणा कितने संदेश' — मैंने बहुत लोगों को ये पंक्तियां सुनते ही रोतेदेखा है.मेरी बात अधूरी रह जाएगी अगर मैं तुलसीदास का नाम ना लूं. कभी कभी मुझे लगता है किकोई भी रामचरितमानस की इस चौपाई से टक्कर नहीं ले पाया है: घन घमंड नभ गरजत घोराप्रिया हीन डरपत मन मोरा ।। दामिनि दमक रह नघन माहीं खल कै प्रीति जथा थिर नाहीं ।।मेरे पास इस चौपाई का गुंदेचा ब्रदर्स की परफॉर्मेंस की रिकॉर्डिंग है. पर मैं इसेसाल में सिर्फ एकाध बार सुनता हूं क्योंकि डर है कि अगर कई बार सुनूंगा तो उनकीआवाज का शानदार असर कम न हो जाए.https://twitter.com/iawoolford/status/671165280026910720भारत में रहने का अनुभव कैसा रहा? एक 'गोरे' को इतनी अच्छी हिंदी बोलते देख लोगचौंक गए होंगे? या कभी ऐसा हुआ है कि जिन्हें आपके बारे में ज्यादा न मालूम हो,उन्होंने आपसे अंग्रेजी में बात शुरू करनी चाही हो? कोई मजेदार किस्सा हो तो साझाकरें. बचपन से भारत आता रहा हूं. 2003 में एक साल के लिए जयपुर में था. वाराणसी औरउसके इर्द-गिर्द गांवों में काफी समय बिताया है. करीब एक साल के लिए बिहार केअररिया जिले के एक गांव में रहा. अब भी आना-जाना जारी है.जब मैं बिहार या यूपी के गांवों में होता हूं तो लोगों को मेरे हिंदी बोलने परज्यादा हैरत नहीं होती. शायद इसलिए क्योंकि यहां के लोग इतनी अंग्रेजी नहीं बोलते.पर मैंने देखा है कि दिल्ली और दूसरे शहरों के लोग ज्यादा चकित होते हैं. पसंदीदाभारतीय व्यंजन (cuisine): लिट्टी चोखा कभी कभी जब मैं लोगों से हिंदी में बात करताहूँ तब उन्हें काफी देर तक महसूस नहीं होता. ऑस्ट्रेलिया की युनिवर्सिटी में सबसेमजेदार भाषा का ऐसा भ्रम हुआ था. मैंने कैंपस में एक भारतीय आदमी को अपने बेटे सेबात करते हुए सुना. वे रास्ता भूल गए थे. तो मैंने उनसे हिंदी में पूछा कि वे कहांजाना चाहते हैं. पिता ने अंग्रेजी में जवाब दिया- 'वी वॉन्ट टू गो टू द लाइब्रेरी'.हिंदी में मैंने उनको रास्ता बताया. जब वे चलने लगे तो मैंने बेटे को हैरान होकरकहते सुना, 'पापा, उस अंग्रेज को हिंदी कैसे आती है?' और पापा ने जवाब दिया “क्यामतलब है तुम्हारा, वो तो अंग्रेजी में बोल रहा था.'https://twitter.com/iawoolford/status/670356516008955904क्रिकेट के मैदान पर जब डेविड वॉर्नर ने रोहित शर्मा को अंग्रेजी सीखने की नसीहतदी, तो आपने अपने ब्लॉग पर रोहित और हिंदी के पक्ष में लिखा. आपने वॉर्नर केव्यवहार को अपमानजनक बताया और उन्हें हिंदी सीखने की नसीहत दी. ऑस्ट्रेलिया मेंभारतीय छात्र नस्ली हिंसा का शिकार होते रहे हैं. क्या आपको लगता है कि ऑस्ट्रेलियामें या अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हिंदी उपेक्षा, भेदभाव या हीन भावना की शिकार है?डेविड वॉर्नर क्रिकेट के शानदार खिलाड़ी है. कभी कभी मैं मस्ती के लिए यूट्यूब परउनके स्विच हिट्स देखता हूं. वह भारत के बारे में भी काफी कुछ जानते होंगे क्योंकिवह दिल्ली डेयरडेविल्स और हैदराबाद सनराइजर्स के लिए खेल चुके हैं. लेकिन शायद उसदिन एमसीजी पर वह ये भूल गए होंगे. पहली इनिंग के 23वें ओवर में वॉर्नर ने रोहितशर्मा से जाकर कहा, 'स्पीक इंग्लिश'. मैं नहीं जानता कि वार्नर ने ऐसा क्यों किया.एक क्रिकेट फैन और हिंदी का प्रोफेसर होने के नाते मुझे बुरा लगा. यह शर्मनाक औरबुरी बात थी. ऑस्ट्रेलिया के मुकाबले भारत में कहीं ज्यादा क्रिकेट के खिलाड़ी हैं.क्रिकेट की चर्चा कई भाषाओं में होती है, जैसे कि हिंदी, तमिल, गुजराती, पंजाबी,भोजपुरी, मैथिली और अन्य भारतीय भाषाओं में. जब वॉर्नर ने यह बात कही तब ऐसा लगा किउन्हें एशिया और विश्व में ऑस्ट्रेलिया की जगह का अंदाजा नहीं है. पसंदीदा भारतीयएक्टर-एक्ट्रेस: आमिर खान, रेखा मैंने वॉर्नर के बर्ताव व्यवहार कोभारत-ऑस्ट्रेलिया के रिश्ते को लेकर भी देखा है - खास कर जब 2009 में इंडियनस्टूडेंट्स पर नस्ली हमले हुए थे. वॉर्नर की टिप्पणी नॉन-ब्रिटिशर्स के लिए कड़वामाहौल पैदा कर सकती है. इसलिए जरूरी है कि ऐसे बर्ताव को बढ़ावा न दिया जाए.अपने स्टूडेंट्स के साथ इयानमेरे कई इंडियन स्टूडेंट्स भी हैं जिन्होंने हिंदी साहित्य नहीं पढ़ा, क्योंकि वेइंडिया में इंग्लिश मीडियम स्कूलों में पढ़े हैं. मैं यूनिवर्सिटी में प्रोफेसरहूं, तो इनकी शिक्षा मेरा फर्ज है. लेकिन उनरी सुरक्षा हमारी अव्वल जिम्मेदारी है.हिंदी में टाइप करने के लिए 'गूगल हिंदी इनपुट' का ही इस्तेमाल करते हैं या कुछ और?मुझसे अकसर यह सवाल पूछा जाता है. इस पर मैंने ब्लॉग पोस्ट भी लिखी है. कईहिंदीभाषी हिंदी में टाइप करना चाहते हैं, पर उसका तरीका नहीं जानते. मैं अपनेएप्पल लैपटॉप पर बिल्ट-इन हिंदी का इस्तेमाल करता हूं. फोन पर चैटिंग करते समय मैंएप्पल के बिल्ट-इन हिंदी कीबोर्ड का इस्तेमाल करता हूं. एंड्रॉयड में कई विकल्पहैं- जैसे गूगल हिंदी इनपुट. मैंने अपनी पत्नी के एंड्रॉयड फोन में हिंदी इंस्टॉलकर रखी है, ताकि मैं एंड्रॉयड पर भी टाइप करना सीख सकूं और स्टूडेंट्स को सिखासकूं.रेणु के पैतृक गांव में बालों की छंटाईआप फणीश्वर नाथ रेणु पर जो किताब लिख रहे हैं, उसके बारे में बताएं. वह अंग्रेजीमें ही होगी? हां अंग्रेजी में ही. यह रेणु के गांव में होने वाली पारंपरिकपरफॉर्मेंस के बारे में है. रेणु की लिखाई में कई लोक संगीत के उदाहरण है. जब मैंउस गांव में था तब मैंने कुछ ऐसे कलाकारों के साथ काम किया जिन्होंने असल में रेणुके साथ कुछ गीत गाए थे. मेरी सब से एक्साइटिंग डिस्कवरी थी कि रेणु खुद एक कलाकारथे. वे बिदापत नाच के कलाकारों के साथ काम करते थे. धान के खेतों में धान रोपते हुएवे भी बारहमासा गाते थे. रेणु के उपन्यास में लिखे गीतों की परफॉर्मेंस बिहार मेंदेखना मेरे लिए कितना एक्साइटिंग था, मैं बता नहीं सकता. वह तब भी था जब मैंने श्रीरामप्रसाद मंडल के समुह को बारहमासा गाने गाते सुना— फागुन मासा रे गवना छे किपहिरू कुसुम ही रंग हो पंथ चलाइत केसिया संहारू बान्हू कि अंचर पवन झरे… रामप्रसादजी ने 'मैला आँचल' नहीं पढ़ा था. उनके यह गाना इसलिए पता था क्योंकि वे एक किसानथे. उनको याद है कि रेणु जी बारिश के मौसम में ये गाना गाते थे. रामप्रसाद जी ने'मैला आंचल' को मेरे लिए जिंदा किया. आखिरी हिंदी फिल्म कौन सी देखी: मसानगोरखपुर के दुमारी गांव में दिवंगत भोजपुरी कवि रामनवल मिश्रा के साथरामप्रसाद अब इस दुनिया में नहीं रहे. 18 महीने पहले वे दिल के दौरे से गुजर गए. वे65 साल के थे. उनके बारे में सोचते हुए आंखें भर आती हैं. उनकी आवाज की रिकॉर्डिंगसुनकर भावुक हो जाता हूं. जब भी मैं उनके घर जाता था या उनके साथ खेत में बैठता थावे मुझे कुछ ना कुछ नया सुनाते थे. मेरे हर सवाल के लिए उनके पास जवाब में एक गानाथा. वे हमेशा कहते थे, 'फिर आना, अपना माइक लाना और मैं तुम्हें कुछ और बताऊंगा.'मुझे लगा था कि मेरे पास उनके साथ काम करने के कई साल हैं, पर अफसोस ऐसा नहीं है.उम्मीद करता हूं कि रेणु के साहित्य और बिहार के लोकगीतों के बारे में मेरी किताबरामप्रसाद जी की विरासत का वर्णन कर पाएगी.हिंदी को लेकर ऑस्ट्रेलिया में क्या रुझान है? आपकी यूनिवर्सिटी में कितने गैरहिंदीमूल के स्टूडेंट्स हिंदी पढ़ रहे हैं? ऑस्ट्रेलिया में हिंदी के छात्रों की संख्याबढञ रही है. इस साल हिंदी फर्स्ट ईयर में गैर-भारतीय मूल के 15 स्टू़डेंट्स थे. उनमें से कई दूसरे और तीसरे साल में भी हिंदी भी पढ़ेंगे. उन्होंने बहुत अच्छा फैसलालिया है. नक्शे पर नजर डालिए और देखिए कि ऑस्ट्रेलिया के लिए एशिया कितना अहम है.भारत ऑस्ट्रेलिया के लिए मूल सहयोगी बनता जा रहा है और भारत से रिश्ते कायम रखने केलिए सिर्फ अंग्रेजी काफी नहीं है. ऑस्ट्रेलिया के कई इलाकों में ऐसे लोगों की जरूरतहै जो हिंदी और दूसरी भारतीय भाषाओं के जानकार हों.एक तस्वीर में आपको रेणु के घर पर 'लुंगी' पहनकर बैठे हुए देखा. बहुत क्यूट लग रहेथे. आपका पसंदीदा भारतीय परिधान (dress) कौन सा है? भारत में पुरूषों के लिए पहनावाकठिन नहीं है. विदेशी भी इसके साथ सहज हैं. कई बार जीन्स और शर्ट ठीक रहती है.बिहार जाता हूं तो अपने साथ लुंगी, कुर्ते, जीन्स, और कभी कभी वेस्टर्न सूट भी लेजाता हूं. कभी न कभी इन सबकी जरूरत पड़ती है. गांव में रास्ते के हैंड-पंप के पासनहाता हूं. एक लड़का पानी निकालता है और दूसरा मुझे साबुन देता है. उस दौरान लुंगीबहुत जरूरी है. हैंड-पंप के पानी से भीगते हुए आप जीन्स नहीं पहन सकते.पसंदीदा हिंदी मुहावरा: ट्विटर पर चोर नाचा किस ने देखा ;)एक बार बारिश के मौसम में मैंने धान की रोपनी में मदद की क्योंकि मैं बारहमासा केगाने रिकॉर्ड करना चाहता था, जो सिर्फ उस काम के दौरान गाए जाते हैं. उस काम के लिएभी लुंगी जरूरी है. पर जब मैं गांव छोड़कर पूर्णिया जाता हूं तब मेरा पहनावा अलगहोता है — पैंट, शर्ट, और अच्छे जूते.आपने कभी हिंदी/हिंदुस्तानी भाषा की कविता या कहानी में हाथ आजमाया है? अगर हो तोहमसे शेयर करें. मैं शायर तो नहीं, मगर भारत ने मुझे शायरी सिखा दी. कभी कभी कुछलिख लेता हूं. वे काफी छोटी होती हैं, 140 अक्षरों की, ताकि वे एक ट्वीट में समाजाएं. दिल्ली चुनाव के समय जब मैं लाट्रोब युनिवर्सिटी के पास कंगारुओं से भरे जंगलसे गुजर रहा था, तब मैंने ये पंक्तियां लिखीं: जब भी मैं देखता हूं वन में कंगारूलग रहा है कि हम रहते गंवारू रात भर पीता हूं बोतल या दारू कहता−क्या इस बार चलेगाझाड़ू? आपका हिंदी उच्चारण काफी अच्छा है. आपने हिंदी उच्चारण कैसे दुरुस्त किया?कोई सिखाने वाला था या वीडियो/फिल्में देखकर? यह कहने के लिए बहुत धन्यवाद. कभी कभीमैं सपना देखता हूं कि बॉलीवुड की फिल्म में कोई रोल करूं- जैसे लगान में कप्तानरसेल. उस के लिए मुझे ब्रिटिश-हिंदी एक्सेंट का इस्तेमाल करना पड़ेगा जो मैं मैंकभी-कभार मजाक में कर लेता हूं. तो कभी कोई रेणु के 'मैला आंचल' पर फिल्म बनाए तोमैं जरूर कहूंगा कि डायरेक्टर साहब कि शुरुआत के मार्टिन साहब का रोल मुझे दें. उससे मेरा सपना सच हो जाएगा.जहां तक मेरे उच्चारण की बात है, इसका श्रेय मेरे शिक्षकों को जाता है. भारत मेंरहने का भी फायदा मिला है.गोरखपुर में एक हिंदी प्रोफेसर के साथउच्चारण भाषा सीखने का कठिन हिस्सा है. पढ़ाने के दौरान भी पहले दिन से इस पर ध्यानदेता हूं. अमेरिकी और ऑस्ट्रेलियन अंग्रेजी बोलने वालों को कुछ अक्षरों का उच्चारणकरने में काफी तकलीफ होती है— जैसे ‘त’ को वह ‘थ’ बोलते हैं. कभी कभी हमें ‘अ’ और‘आ’ का फर्क समझने में दिक्कत पेश आती है. ट-वर्ग (ट, ठ, ड, ढ) के अक्षर भी बहुतमुश्किल होते हैं. पर मैं अपने छात्रों को यह भी याद दिलाता हूं कि अगर वे हिंदी कोऑस्ट्रेलियन एक्सेंट से बोलें तो फिर भी भारत में लोग उन्हें समझ लेंगे और उनकीहिंदी सीखने की प्रेरणा को सराहेंगे.आपकी ब्लॉग पोस्ट में दिल्ली चुनाव नतीजों का जिक्र होता हैं. राजस्थान सरकार जबमुस्लिम किरदार वाली कहानियां स्कूल की टेक्स्ट बुक से हटाने का फैसला लेती है, तोआप उसके विरोध में रिट्वीट करते हैं. बिहार चुनाव की खबर शेयर करते हैं. जाहिर है,भारत की राजनीतिक खबरों पर भी आपकी नजर रहती है. भारत की पॉलिटिक्स को आप कैसेदेखते हैं?मैं भारतीय राजनीति पर अपनी टिपण्णियां वहां तक सीमित रखने की कोशिश करता हूं जहांतक भाषा और साहित्य के क्षेत्र शामिल होते हैं. जैसे कि आपने जो राजस्थान का उदाहरणदिया उससे स्कूलों में साहित्य की पढ़ाई शामिल है. जहां तक बिहार के चुनाव का सवालहै, मैंने बड़े चाव से उसका अनुसरण किया. ऐसा लगता है कि मैंने हफ्तों भर के लिएकिसी और चीज के बारे में नहीं सोचा. यह इसलिए क्योंकि मेरे कई खास मित्र बिहार मेंरहने हैं, जिनमें ऐसे दोस्त शामिल हैं जो बिहार की पार्टियों में सक्रिय हैं.पसंदीदा भारतीय मिठाई: खीर काफी साहित्य जो मैं पढ़ता हूं और जिस पर मैं शोध करताहूं, वह बिहार से है. बहुत सारा दिल्ली-केंद्रित रिपोर्टिंग का ध्यान राष्ट्रीयराजनीति के असर पर था− जैसे कि 'यह चुनाव मोदी और बीजेपी के लिए क्या मायने रखतेहैं?' पर मेरा इंटरेस्ट इसलिए था कि पटना से लेकर पूर्णिया तक मेरे बहुत दोस्त हैं.मैं जानता हूं कि यह चुनाव उनके लिए; उनकी भविष्य की आशाओं के लिए कितना महत्वपूर्णथा.आपने ट्वीट किया, 'सोशल मीडिया पर बढ़ती हुई असहिष्णुता के विरोध में ट्विटर नेस्टार बटन को बदलकर दिल कर दिया है.' भारत में असहिष्णुता और उसके विरोध मेंलेखकों-फिल्मकारों के अवॉर्ड लौटाने पर आप कोई टिप्पणी करना चाहेंगे?सोशल मीडिया पर भारत में असहिष्णुता के बारे में गरमा-गरम बहस होती है. जब ट्विटरने 'लाइक्स' और गुलाबी दिलों को शामिल करने के लिए अपना सिस्टम बदला तो मैंने यहट्वीट लिखा. उम्मीद है कि वह ट्वीट मजाक के तौर पर ही समझा गया होगा.मेरी पढ़ाई का क्षेत्र हिंदी साहित्य है इसलिए मैं भारतीय समाचार पर तब गौर करताहूं जब साहित्य के बारे में कुछ समाचार आते हैं. 30 अगस्त को कन्नड़ साहित्यकारएमएम कलबुर्गी की उनके घर में हत्या कर दी गई. ऐसा लगता है कि उनकी हत्या उनकेविचारों के लिए की गई. कोई भी हत्या अस्वीकार्य है; अपमानजनक है. और जब किसीविद्वान की हत्या उसके अकादमिक विचारों के लिए की जाती है तब उनके साथीदार अकादमिकऔर साहित्यकारों का हक बनता है कि वे अधिक सुरक्षा की मांग करें; कि वे लिखने काहक, और जीने का हक की मांग करें. इसी दिशा में कई लेखकों ने अपने साहित्य अकादमीपुरस्कार वापस किए हैं.ऑस्ट्रेलिया में छात्रों को हिंदी पढ़ाते इयानकई विरोध करने वाले लेखकों ने कहा है कि भारत में असहिष्णुता बढ़ती जा रही है.इसीलिए दादरी की भयानक हत्या और ऐसी घटनाएं बहस का हिस्सा बन चुकी हैं. मैं नहींजानता कि बढ़ती इनटॉलेरेंस की बात सही है या नहीं. मुझे लगता है कि ऐसी चीज़ कोनापना बहुत मुश्किल है. मगर मैं नहीं मानता कि आज के विरोध अमान्य हैं क्योंकि बीतेहुए समय में चीजें और भी बूढ़ी रही होंगी. इसलिए मेरे दिल में उन लेखकों के लिए'सॉफ्ट कॉर्नर' है जिन्होंने पुरस्कार वापस किए हैं.काश कि इन चर्चाओं में इन लेखकों की रचनाओं के बारे में ज्यादा बातें होतीं. उदाहरणके लिए 90 साल की कृषणा सोबती को ही लीजिए. उनकी ‘ए लड़की’ बीसवीं सदी की सबसे बड़ीसाहित्यिक रचनाओं में से एक है. इस लघु उपन्यास के विषय आज के चर्चाओं से सीधे-सीधेजुड़े हैं. उनके उपन्यास का रिश्ता जीने का हक, बूढ़ा होने का हक और अपने माता-पिताको बूढ़े होते देखने के हक के बारे में है. यह उपन्यास उस हक के बारे में है जोजिंदगी की खुशी या ग़म महसूस कर सकें. यह हक डॉ कलबुर्गी और उनकी परिवार से छीन लिएगए. मोहम्मद अखलाक और उनके परिवार से भी. अगर आम जनता को कृष्णा सोबती की रचनाओं कोपढ़ने और उन पर बहस करने का मौका मिलता तो शायद 'अवार्ड वापसी' की छवि कुछ और हीहोती.भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आने से और दुनिया के मंचों पर हिंदी में बोलनेसे क्या हिंदी भाषा को फायदा हो रहा है? आपकी नजर में. वह भारत के पहले प्रधानमंत्री हैं जिन्होंने हिंदी भाषा का अंतराष्ट्रीय स्तर पर इस हद तक प्रयोग किया है.उन्होंने याद दिलाया है कि हिंदी दुनिया में सबसे ज्यादा बोली जाने वाली भाषाओं मेंसे एक है, जो भारत के बाहर भी करोड़ों लोग समझते हैं. भारत में बीस प्रतिशत से कमलोग अच्छी अंग्रेजी बोल पाते हैं. जब मैं पूर्णिया में काम करता हूं तो कई दिनों तकअंग्रेजी का एक वाक्य तक नहीं सुनने को मिलता. पीएम मोदी के हिंदी के इस्तेमाल सेकई लोगों को उम्मीद बंधती है कि हिंदी भाषा और सफलता में रिश्ता कायम हो सके औरदुनिया में हिंदी भाषा की स्थिति ऊंची हो सके.अपने परिवार के बारे में बताएं. परिवार में कौन कौन है. बच्चों के नाम क्या हैं. वेआपके हिंदी प्रेम पर कैसी प्रतिक्रिया देते हैं? मेरी बीवी शैनन और मेरी दोबेटियां. ऐडी 9 और बिक्सी 7 साल की. दोनों यहां पर प्राइमरी स्कूल में हैं. शैनन लाट्रोब यूनिवर्सिटी में साइंटिस्ट हैं और बायोलॉजी के फील्ड में रिसर्च करती हैं. वहहिंदी नहीं बोलतीं, लेकिन भारत में प्रवास का आनंद ले चुकी हैं. मेरे बच्चे हिंदीसीखने में दिलचस्पी रखते हैं. खास तौर से बिक्सी, जो अगले साल विक्टोरिया स्कूल ऑफलैंग्वेजेस में हिंदी प्रोग्राम में एडमिशन लेना चाहती है.हमारे यहां हिंदी को बचाने को लेकर बहस चलती है. कुछ लोग मानते हैं कि हिंदी को अबबाजार के साथ थोड़े सरल रूप में आगे बढ़ना चाहिए. जबकि कुछ इसमें अंग्रेजी कीमिलावट के सख्त विरोधी हैं? आपकी राय क्या है, हिंदी किस रास्ते पर चलकर आगेबढ़ेगी? मैं अपने ऑस्ट्रेलियन छात्रों को बोल-चाल की हिंदी ही सिखाता हूं. अगरउन्हें सिर्फ शुद्ध या औपचारिक हिंदी सिखाऊं तो लोग उनका मजाक उड़ाएंगे कि वेरामानंद सागर के रामायण सीरियल के कलाकारों की तरह बात करते हैं.मैं रेणु का इसीलिए कायल हूं कि वे भाषा से खेलते हैं. रेणु के जमाने में हिंदी केकुछ विद्वानों ने कहा था कि रेणु ने उत्तर पूर्वी बिहार की हिंदी को अलग रीत से पेशकिया है. आज भी कुछ लोगों को उनके लिखने का अंदाज अजीब लगता है. रेणु समझ चुके थेकि भाषा के बदलाव के रास्ते में कुछ नहीं आ सकता. इस विवाद का कभी अंत नहीं आएगा किहिंदी को अन्य भाषाओं से शब्द उधार लेने चाहिए या नहीं. पर सच्चाई यही है कि भाषाकभी स्थित नहीं हो सकती. वह हमेशा बदलती रहेगी. वही भाषा बदलने से इनकार कर सकती हैजो मर चुकी हो.