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जर्मनी के इस नागरिक ने खुद को इंडियन बताकर तीन बार विधायकी के चुनाव जीत लिए

अब पता चला कि फर्जी दस्तावेज थे इनके पास. विधायकी भी गई.

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9 सितंबर 2017 (अपडेटेड: 9 सितंबर 2017, 11:40 AM IST)
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रमेश चेन्नामनेनी 1993 से ही जर्मनी के नागरिक हैं.
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अपने देश में एक आदमी है. रहने वाला जर्मनी का है. उसके पास पासपोर्ट भी जर्मनी का है. नाम है रमेश चेन्नामनेनी. मन में तो ये सवाल उठ ही रहा होगा कि एक जर्मन नागरिक के बारे में इतनी तफसील से क्यों बताया जा रहा है. आपको जवाब भी दे देते हैं. रमेश चेन्नामनेनी नाम का ये आदमी तीन बार विधायक रह चुका है. राज्य है तेलंगाना, विधानसभा क्षेत्र है करीमनगर जिले का वेमुलावाडा और पार्टी है तेलंगाना राष्ट्र समिति. अरे वही के. चंद्रशेखर राव की पार्टी टीआरएस. जब गृह मंत्रालय को पता चला कि राज्य का एक विधायक जर्मनी का नागरिक है, तो अब उसकी सदस्यता खत्म कर दी गई है.

फर्जी कागज लगाकर खुद को बता दिया था भारतीय!

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जर्मन नागरिकता की वजह से विधायकी गंवाने वाले चेन्नामनेनी रमेश 2008 में भारत लौटे थे.

रमेश से राजनैतिक रंजिश रखने वाले कांग्रेस पार्टी के ए श्रीनिवास ने बाद में बीजेपी जॉइन कर ली थी. श्रीनिवास ने 2009 में आरोप लगाया था कि रमेश ने फर्जी दस्तावेज के सहारे भारत की नागरिकता हासिल कर ली है. इसी आधार पर उन्होंने चुनाव के लिए नॉमिनेशन भी फाइल किया है. श्रीनिवास इस आरोप को लेकर हाई कोर्ट चले गए. हाई कोर्ट ने 13 अगस्त 2013 को आदेश दिया कि रमेश के पास दोहरी नागरिकता है, इस लिहाज से वो कोई भी चुनाव नहीं लड़ सकते हैं.

 संविधान कहता है- दोहरी नागरिकता हो तो नहीं लड़ सकते चुनाव

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दोहरी नागरिकता का मतलब है कि एक ही आदमी के पास दो देशों की नागरिकता है. हाई कोर्ट के आदेश के बाद साफ हो गया कि रमेश भारत और जर्मनी दोनों देशों के नागरिक हैं. भारतीय संविधान में नियम है कि अगर कोई भी आदमी दोहरी नागरिकता रखता है, तो वो भारत में चुनाव नहीं लड़ सकता है. चुनाव लड़ने के लिए उसे दूसरे देश की नागरिकता छोड़नी पड़ेगी.

सुप्रीम कोर्ट पहुंचा मामला

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सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले को गृह मंत्रालय को सौंप दिया था.

रमेश चेन्नामनेनी हाई कोर्ट के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट पहुंच गए. 11 अगस्त 2016 को सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट के फैसले पर रोक लगा दी. सुप्रीम कोर्ट ने गृहमंत्रालय को मामला को देखने और इस पर फैसला लेने का निर्देश दिया. हालांकि गृह मंत्रालय ने इस पर कोई फैसला नहीं लिया, जिसके बाद चेन्नामनेनी एपेक्स कोर्ट चले गए. यहां गृह मंत्रालय को एक हफ्ते में फैसला लेने का निर्देश दिया. 6 सितंबर 2017 को गृह मंत्रालय ने पाया कि रमेश के पास भारत की नहीं, जर्मनी की नागरिकता है. इसके बाद उनकी विधायकी खत्म करने का फैसला लिया.

1993 में ली थी जर्मनी की नागरिकता

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2010 में चेन्नामनेनी रमेश तेलंगाना राष्ट्र समिति के संस्थापक के चंद्रशेखर राव के साथ आ गए.

चेन्नामनेनी 1993 में भारत से जर्मनी चले गए थे. वहां उन्होंने जर्मन महिला से शादी कर ली और जर्मनी की नागरिकता ले ली. इसके बाद उन्होंने भारत की नागरिकता छोड़ दी. चुनाव लड़ने के लिए चेन्नामनेनी भारत आ गए. 31 मार्च 2008 को उन्होंने भारतीय नागरिकता के लिए अप्लाई किया. बकौल चेन्नामनेनी 23 फरवरी 2009 को उन्हें भारत की नागरिकता भी मिल गई. भारतीय संविधान के भाग 2 के अनुच्छेद 5 से 11 में भारत का नागरिक होने की शर्तें बताई गई हैं. अनुच्छेद 10 कहता है कि किसी आदमी को 365 दिन यानी एक साल तक भारत में रहना होता है, तभी उसे इस देश की नागरिकता मिलेगी. चेन्नामनेनी का कहना है कि वो भारतीय नागरिकता के लिए अप्लाई करने से पहले एक साल तक भारत में रह चुके थे. हालांकि उनकी नागरिकता को सुप्रीम कोर्ट में चैलेंज देने वाले श्रीनिवास ने कोर्ट को बताया कि रमेश भारत में सिर्फ 96 दिन ही रहे थे और उसके बाद नागरिकता के लिए अप्लाई कर दिया था. इस लिहाज से उन्हें भारत की नागरिकता नहीं मिल सकती है.

तेलुगू देशम पार्टी से लड़ा था पहला चुनाव

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भारत आने के बाद रमेश ने अपना पहला चुनाव चंद्रबाबू नायडू की पार्टी से लड़ा था.

चेन्नामनेनी ने अविभाजित आंध्र प्रदेश में 2009 का विधानसभा चुनाव तेलुगू देशम पार्टी से लड़ा था. एक साल बाद चेन्नामनेनी ने पार्टी छोड़ दी और विधानसभा से इस्तीफा दे दिया. तेलंगाना राष्ट्र समिति जॉइन करने के बाद चेन्नामनेनी पुरानी ही सीट से उपचुनाव में उतरे और जीत हासिल की. 2013 में आंध्र प्रदेश हाई कोर्ट ने चेन्नामनेनी का निर्वाचन रद कर दिया. चेन्नामनेनी एपेक्स कोर्ट पहुंचे और स्टे ले लिया. स्टे जारी करने के दौरान एपेक्स कोर्ट ने ये भी साफ कर दिया था कि चेन्नामनेनी विधानसभा चुनाव में वोट नहीं डाल सकते हैं. जब स्टे प्रभावी था, उसी दौरान 2014 में विधानसभा के चुनाव हुए और चेन्नामनेनी ने तीसरी बार चुनाव में जीत हासिल की.


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