बस इन दस वजहों से ही लिखने वालों को दुनिया रास नहीं आती
आप लिखते हैं. लोग आपको इरीटेट करते हैं और वजह समझ नहीं पाते, उन्हें ये पढ़ाइए.
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Source- Pose
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आप लिखते हैं. लिखने का कीड़ा है. लिखने में खुद के गर्त और श्रृंग पता हैं. आप जबरन नहीं लिखते. मन किया तो लिखे बिना रह नहीं पाते. माने राइटर हैं और आपको पता है. तो ये भी पता होगा कि एक अजीब किस्म की खुन्नस रहती है जमाने से. वजहें हजारों हैं. उनके तौर-तरीकों से लेकर उनकी रूढ़ियों और उनके फर्जीपने तक से. लेकिन यहां बात उन हरकतों की जिनसे वो हमें आए दिन परेशान करते हैं. इनमें से कुछ मजेदार भी हैं कुछ बेवकूफाना भी. ये और इरीटेटिंग हो जाती हैं क्योंकि ये अक्सर हम पर बीतती है.
काम क्या करते हो?
इस सवाल का जवाब माथे पर गुदवा लीजिए. ये सवाल हर राइटर से पूछा जाता है. आज से नहीं सालों से. जितने बड़े लेखक हुए हैं उनके किस्से पता कीजिए, हजारों यही वाकये मिलेंगे जब उनसे कहा गया कि 'लिखते तो हो, ठीक है! पर काम क्या करते हो?' ये पंच घिस चुका, ये बात घिस चुकी पर घिसने के बाद भी ये सवाल नहीं चुकता.
क्या लिख रहे हो?
ये वो लोग हैं जो लिखने के बीच में कूद पड़ते हैं. हर कोई अपने हिसाब से लिखता है और लिखने के बीच टोका-टाकी पसंद नहीं करता. वो किस्सा सुना है? जिसमें झिल्ली से निकलती तितली की मदद करने के लिए एक आदमी कांटे से परों के आसपास के रेशे हटा देता है. पर बाद में तितली उड़ नहीं पाती. कोई लिख रहा हो तो टोकना नहीं चाहिए. लिखा हुआ उड़ नहीं पाता. कोई काम हो तो पूछ भी लो लेकिन जो लिखा जा रहा है उसके बारे में तो हर्गिज नहीं पूछो.
जितना लिख लिया, उतना पढ़ा दो
ये अलग किस्म का चोमूपना है. आधा क्या पढ़ा दें? आप खाना बनाने वालों से कभी कहते हैं, अधकच्ची लौकी खिला दो. नहाते हुए से ये नहीं कहते कि अधनहाए ही ऑफिस निकल जाओ. घर बनवाते हुए कहते हैं, बिल्डिंग टांड़ तक बनाकर छोड़ दो. फिर आधा लिखा हुआ कैसे पढ़ा दें. वो लोग भी होते हैं जो लिखते वक्त पीछे आ खड़े होते हैं. और वहां से झांककर पढ़ते हैं. एक लिखने वाले की पीठ में छूरा भोंक दो वो उफ्फ नहीं करेगा . क्योंकि दर्द तो पीछे से आकर लिखते वक़्त पढने वाले देते हैं.
मेरे लिए लिख दोगे
हम लिखते हैं इसका मतलब ये नहीं कि आपके बच्चे के वार्षिकोत्सव की स्पीच लिख देंगे. हम कुछ भी लिख सकते हैं इसका मतलब ये नहीं कि आपकी बुआ के बेटे के संगीत में चिट्टियां कलाइयां बजने के पहले जो बोलना है वो लिख दें. एक बार एक ने मुझसे कहा मम्मी-पापा की शादी का 30वां साल है. कुछ लिख दीजिए. जब ये कहा मैं तो उनसे मिला तक नहीं हूं तो कहा गया, अपने मम्मी-पापा को ध्यान में रखकर लिख दीजिए. फिर बताना पड़ा मेरे मां-बाप मेरे ही जैसे हैं. उनको ध्यान में रखकर लिखा तो 30वें साल में जाकर तलाक झेलना पड़ जाएगा.
बाद में लिख लेना
तुमको हरी चटनी वाले मोमोज खाने हैं जाओ. आईपीएल का बकवास सा मैच देखना है. शनिवार को दारु पीनी है. लड़की के साथ क़ुतुबमीनार जाना है तो जाओ न. मंगल पर जाना है चले जाओ पर मुझे याद मत करो. चाहे जितना बड़ा काम रुक रहा हो. और किसी को ये क्यों लगता है कि लिखने के बजाय उठकर हम 12 बजे के पहले नहा लेंगे तो आसमान से देवता फूलों की बारिश करेंगे. कौन सा आसमान टूट पड़ेगा अगर हम एक घंटे बाद खाना खा लेंगे. कितनी छोटी सी बात होती है. लिखने की एक लिंक होती है, थॉट गुंथकर बाहर निकलते हैं. यहां कोई अपना कलेजा चीरकर लिख रहा हो और तुमको सूझती है कि डबल टोंड दूध और बचे खुल्ले से एक हाजमोला ले आना.
आपकी कोई किताब नहीं आई
ये किसने तय कर दिया कि जिसकी किताब आती है वही लेखक होता है. ये सवाल हम लोगों से अक्सर पूछा जाता है. आप कहां छपते हैं. या आपकी कोई किताब आई है. नहीं आई तो क्या किताब लिखना कोई पैमाना नहीं होता लेखक होने का. बाहर निकल कर देखिए. किताबें उठा लीजिए. एक से खच्चरों ने किताबें लिखी हैं. अच्छे-अच्छे पब्लिकेशन हाउस से ऐसी किताबें आईं हैं कि ज्यादा तेल वाला ब्रेड पकौड़ा रख दो तो लिखे हुए से उस बेचारे पकौड़े का पित्त खराब हो जाए.
बहुत छोटा लिखा है
हम बड़ा लिखें या छोटा लिखें ये हमारी कॉल होती है. क्या जरुरत है किसी को दस स्क्रॉल मरवाने की अगर आप दो लाइन में अपनी बात कह सकते हैं. और ये भी तो जरुरी नहीं कि सबकुछ छोटा-छोटा ही लिखें. इस दौर की सबसे बड़ी समस्या ये भी है कि लोग ज्यादा सिर्फ अन्तर्वासना पर पढ़ना चाहते हैं. सोचो कि किसी के किस्से में किसी का पालतू मर गया और तीन पेज में उसने दुःख लिखा है. तब आप ये थोड़े न कहोगे कि 'कुत्ता मर गया' लिखकर एक लाइन में बात खत्म करो. आप जो कहोगे वो उसका उल्टा करेंगे. इसीलिए तो वो लिखते हैं, इसी में मजा आता है.
कुछ नहीं करते, तो बिजी कहां रहते हो
सोचते हैं. जब लिखने वाले कुछ नहीं कर रहे होते उसी वक़्त वो सबसे ज्यादा कर रहे होते हैं. मैंने ऐसे-ऐसे लोग देखे हैं जो बड़ी-बड़ी चीजें तड़ातड़ लिख डालते हैं और फिर एक लाइन पर घंटों के लिए अटक जाते हैं. हम लिखते हैं. जब हम अचानक चुप हो जाएं. अकेले में भटकने लगें. दीवार पर फोकस करें. घंटों बैठकर कंघी करें या खुद की पिंडलियां सहलाएं. उस वक़्त हम सोच रहे होते हैं. ये भी उतना ही जरुरी होता है जैसे किसी दो दरवाजे वाले कमरे में बतक-बतककर बिना कम्प्यूटर के ब्रेनस्टॉर्मिंग सेशन करना. 'खोए-खोए से क्यों रहते हो' जैसे सवाल लिखने वालों से पूछने को नहीं बने हैं.
तुम तो पेड़ पर उल्टा लटककर लिखते होगे
ये सच है कि कुछ लोगों के लिखने के तरीके अजीब होते हैं. पर कोई स्टीरियोटाइप मत बनाइए. वो सौ लोगों के कमरे में बैठकर भी लिख सकते हैं. वो कुर्सी पर झूलते-झूलते आपसे बतियाते हुए भी लिख सकते हैं. उनका मजाक मत बनाइए. आप उनका मजाक बनायेंगे वो आपको अगले लिखे हुए में विलेन बना देंगे.
और अंत में एक प्रार्थना उन्हें बेवजह परेशान मत कीजिए. ज्यादा सोते, खाते, सोचते हैं तो करने दीजिए. किसी भी तरह की जबरदस्ती मत कीजिए. बेवजह उम्मीद मत कीजिए. वो वही करेंगे जो उनका मन करेगा. यहां दस पॉइंट होने थे. मैंने नौ ही लिखे क्योंकि मेरा मन किया.

